नई दिल्ली: देशभर में लोग भीषण गर्मी से राहत का इंतजार कर रहे हैं और निगाहें मॉनसून पर टिकी हैं। हर साल की तरह इस बार भी मॉनसून के आगमन को लेकर उत्सुकता बनी हुई है। भारतीय मौसम विभाग ने 4 जून 2026 को केरल में मॉनसून पहुंचने की संभावना जताई है। मॉनसून केवल मौसम का बदलाव नहीं है, बल्कि भारत की कृषि, अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की आजीविका से सीधा जुड़ा हुआ है।
भारत में सबसे पहले दक्षिण-पश्चिम मॉनसून केरल के तट पर दस्तक देता है। इसके बाद यह धीरे-धीरे पूरे देश में फैलता है और कई महीनों तक बारिश का सिलसिला जारी रहता है। लेकिन आखिर मॉनसून क्या है, यह कैसे बनता है, क्यों अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश की मात्रा अलग होती है और मौसम विभाग इसकी घोषणा कैसे करता है, आइए विस्तार से समझते हैं।
मॉनसून शब्द का क्या मतलब है?
मॉनसून शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ से हुई है, जिसका अर्थ है मौसम या मौसमी हवाएं। समय के साथ इस शब्द का इस्तेमाल उन हवाओं के लिए होने लगा जो मौसम के अनुसार अपनी दिशा बदलती हैं और बड़े पैमाने पर वर्षा का कारण बनती हैं।
मौसमी बदलाव के साथ चलने वाली इन हवाओं का प्रभाव दक्षिण एशिया के देशों पर सबसे अधिक पड़ता है और यही वजह है कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में मॉनसून जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
क्या होता है मॉनसून?
मॉनसून एक मौसमी वायुप्रणाली है, जो समुद्र से नमी लेकर भूमि की ओर बढ़ती है और व्यापक वर्षा कराती है। गर्मियों के दौरान समुद्र की ओर से आने वाली नमीयुक्त हवाएं भारत के दक्षिण-पश्चिमी तट से टकराती हैं और बारिश का सिलसिला शुरू हो जाता है।
ये हवाएं समुद्र से जलवाष्प लेकर आती हैं। जब ये भूमि क्षेत्र में पहुंचकर ऊपर उठती हैं तो ठंडी होकर बादलों में बदल जाती हैं और फिर वर्षा होती है। यही प्रक्रिया जून से सितंबर तक देश के अधिकांश हिस्सों में बारिश का आधार बनती है।
क्या होती है प्री-मॉनसून बारिश?
मॉनसून के आगमन से पहले मार्च से मई के बीच होने वाली बारिश को प्री-मॉनसून वर्षा कहा जाता है। इसे कई क्षेत्रों में मैंगो शावर के नाम से भी जाना जाता है।
इस दौरान तापमान तेजी से बढ़ता है और वातावरण में नमी बढ़ने लगती है। यही परिस्थितियां बाद में मॉनसून के विकास में मदद करती हैं।
भारत में कितने प्रकार के मॉनसून होते हैं?
भारत में मुख्य रूप से दो प्रकार के मॉनसून देखे जाते हैं। पहला दक्षिण-पश्चिम मॉनसून, जो जून से सितंबर तक सक्रिय रहता है और देश की अधिकांश वार्षिक वर्षा का कारण बनता है।
दूसरा उत्तर-पूर्व मॉनसून है, जो अक्टूबर से दिसंबर के बीच सक्रिय होता है। इसका प्रभाव विशेष रूप से तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और दक्षिण भारत के कुछ अन्य हिस्सों में दिखाई देता है।
दो हिस्सों में क्यों बंट जाती हैं मॉनसूनी हवाएं?
भारत पहुंचने के बाद मॉनसूनी हवाएं दो प्रमुख शाखाओं में विभाजित हो जाती हैं। एक शाखा अरब सागर से होकर पश्चिमी तट, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान की ओर बढ़ती है।
दूसरी शाखा बंगाल की खाड़ी से पश्चिम बंगाल, पूर्वोत्तर भारत, बिहार और पूर्वी राज्यों की ओर बढ़ती है। हिमालय से टकराने के बाद यह पश्चिम दिशा की ओर मुड़ती है और उत्तर भारत में वर्षा कराती है।
मॉनसून के दौरान बारिश कैसे होती है?
गर्मी के मौसम में समुद्र और जमीन के तापमान में बड़ा अंतर पैदा हो जाता है। जमीन समुद्र की तुलना में अधिक गर्म हो जाती है, जिससे कम दबाव का क्षेत्र बनता है।
इस कम दबाव को भरने के लिए समुद्र से नमी वाली हवाएं भूमि की ओर बढ़ती हैं। रास्ते में ये भारी मात्रा में जलवाष्प लेकर आती हैं। ऊंचाई पर पहुंचने के बाद जलवाष्प संघनित होकर बादलों में बदलती है और फिर बारिश के रूप में धरती पर गिरती है।
IMD कैसे तय करता है कि मॉनसून आ गया है?
मौसम विभाग केवल बारिश देखकर मॉनसून की घोषणा नहीं करता। इसके लिए कई वैज्ञानिक मानकों का अध्ययन किया जाता है, जिनमें हवाओं की दिशा, वातावरण में नमी, बादलों की स्थिति और वर्षा की मात्रा शामिल होती है।
जब केरल, लक्षद्वीप और कर्नाटक क्षेत्र के निर्धारित आठ मौसम केंद्रों में लगातार दो दिनों तक कम से कम 2.5 मिलीमीटर वर्षा दर्ज होती है और अन्य मौसम संबंधी मानक भी पूरे हो जाते हैं, तब भारतीय मौसम विभाग आधिकारिक रूप से मॉनसून के आगमन की घोषणा करता है।
कितनी बारिश को सामान्य माना जाता है?
मौसम विभाग वर्षा का आकलन लॉन्ग पीरियड एवरेज यानी एलपीए के आधार पर करता है।
यदि बारिश एलपीए के 96 से 104 प्रतिशत के बीच रहती है तो उसे सामान्य माना जाता है। 90 से 95 प्रतिशत के बीच रहने पर सामान्य से कम वर्षा की श्रेणी में रखा जाता है। वहीं 104 से 110 प्रतिशत के बीच बारिश सामान्य से अधिक और 110 प्रतिशत से ऊपर होने पर अत्यधिक वर्षा मानी जाती है।
अगर वर्षा 90 प्रतिशत से कम रह जाए तो उसे सूखे जैसी स्थिति माना जाता है।
केरल से पूरे देश में कैसे फैलता है मॉनसून?
मॉनसून सबसे पहले केरल तट पर पहुंचता है और इसके बाद तेजी से दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों में फैलता है। अगले कुछ दिनों में यह कर्नाटक, तमिलनाडु और पूर्वोत्तर भारत तक पहुंच जाता है।
आमतौर पर जून के दूसरे सप्ताह तक मॉनसून महाराष्ट्र, गोवा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में सक्रिय हो जाता है। मध्य जून तक यह मध्य भारत के बड़े हिस्से को कवर करता है।
इसके बाद जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के पहले सप्ताह तक दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तराखंड में इसकी दस्तक होती है। जुलाई के मध्य तक मॉनसून देश के लगभग सभी हिस्सों में फैल जाता है।
क्यों हर जगह एक जैसी बारिश नहीं होती?
मॉनसून की बारिश कई कारकों पर निर्भर करती है। समुद्र से दूरी, पर्वतीय क्षेत्र, हवाओं की दिशा, नमी की उपलब्धता और स्थानीय मौसम प्रणालियां वर्षा की मात्रा को प्रभावित करती हैं।
यही वजह है कि कुछ क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है, जबकि कुछ इलाकों में सामान्य से कम बारिश दर्ज होती है। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली शाखाओं की सक्रियता भी अलग-अलग राज्यों में वर्षा के स्तर को प्रभावित करती है।
भारत में सालभर होने वाली कुल बारिश का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान ही होता है, इसलिए इसकी प्रगति पर पूरे देश की नजर रहती है।
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