लखनऊ: आज के दौर में फ्रिज हर घर की जरूरत बन चुका है। ठंडा पानी, दूध, सब्जियां और बचा हुआ भोजन सुरक्षित रखने के लिए इसका इस्तेमाल आम बात है। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब लोगों के पास खाद्य पदार्थों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का कोई आधुनिक साधन नहीं था। ऐसे में सवाल उठता है कि दुनिया का पहला फ्रिज कब बना, वह कैसा दिखता था और भारत में इसकी शुरुआत कब हुई?
फ्रिज के आविष्कार से पहले दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोग प्राकृतिक तरीकों से ठंडक बनाए रखते थे। प्राचीन चीन में झीलों और नदियों से बर्फ काटकर भूमिगत गड्ढों में संग्रहित की जाती थी। ईरान में विशेष गुंबदनुमा संरचनाएं बनाई जाती थीं, जबकि यूरोप में आइस हाउस का उपयोग होता था। भारत में सदियों तक मिट्टी के मटके को प्राकृतिक रेफ्रिजरेटर के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में मिले मिट्टी के बर्तनों को इसका प्रमाण माना जाता है।
18वीं सदी में वैज्ञानिकों ने कृत्रिम रूप से ठंडक पैदा करने की दिशा में प्रयोग शुरू किए। वर्ष 1755 में स्कॉटलैंड के प्रोफेसर विलियम कुलेन ने एक ऐसी मशीन बनाई, जो आसपास की गर्मी को सोखकर बर्फ तैयार कर सकती थी। हालांकि यह प्रयोगशाला तक ही सीमित रही।
इसके बाद 1805 में अमेरिकी आविष्कारक ओलिवर इवांस ने बर्फ बनाने वाली मशीन की अवधारणा पेश की। लेकिन आधुनिक रेफ्रिजरेशन तकनीक की वास्तविक नींव 1834 में अमेरिकी इंजीनियर जैकब पर्किंस ने रखी। उन्होंने पहली व्यावहारिक रेफ्रिजरेशन मशीन विकसित की और उसका पेटेंट भी कराया। इसी वजह से उन्हें “फादर ऑफ द रेफ्रिजरेटर” कहा जाता है।
दुनिया का पहला फ्रिज आज के आधुनिक रेफ्रिजरेटर जैसा बिल्कुल नहीं था। यह लकड़ी और धातु से तैयार एक विशाल मशीन थी, जिसमें पाइप, कंप्रेसर और विशेष गैसों का इस्तेमाल किया जाता था।
उस दौर में यह बिजली से नहीं, बल्कि भाप इंजन से संचालित होता था। आकार इतना बड़ा था कि इसे घरों में रखना संभव नहीं था। इसके अलावा इसमें इस्तेमाल होने वाली गैसें ज्वलनशील और जहरीली थीं। यही कारण था कि शुरुआती वर्षों में इसका उपयोग मुख्य रूप से उद्योगों और व्यावसायिक संस्थानों तक सीमित रहा।
19वीं सदी के मध्य और बाद के वर्षों में कई वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने रेफ्रिजरेशन तकनीक में लगातार सुधार किए। अमेरिकी चिकित्सक जॉन गौरी ने मरीजों के लिए ठंडी हवा उपलब्ध कराने वाली मशीन विकसित की, जबकि जर्मन इंजीनियर कार्ल वॉन लिंडे ने 1870 के दशक में उन्नत रेफ्रिजरेशन प्रणाली तैयार की।
इस तकनीक ने खाद्य भंडारण, मांस उद्योग और पेय पदार्थ उद्योग में बड़ा बदलाव ला दिया। धीरे-धीरे रेफ्रिजरेशन सिस्टम अधिक सुरक्षित, किफायती और प्रभावी होते गए।
घरेलू उपयोग के लिए पहला इलेक्ट्रिक फ्रिज वर्ष 1913 में बाजार में उतरा। इसके बाद अमेरिका और यूरोप में इसकी मांग तेजी से बढ़ने लगी। 1920 और 1930 के दशक तक मध्यम वर्गीय परिवारों में भी फ्रिज पहुंचने लगे।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आर्थिक विकास के साथ फ्रिज घरेलू जीवन का अहम हिस्सा बन गया। 1950 के दशक तक अमेरिका के अधिकांश शहरी घरों में रेफ्रिजरेटर मौजूद थे और यूरोप में भी इसका तेजी से विस्तार हुआ।
भारत में फ्रिज का इस्तेमाल पहली बार वर्ष 1928 में शुरू हुआ। उस समय रेफ्रिजरेटर अमेरिका और ब्रिटेन से आयात किए जाते थे और केवल संपन्न परिवार ही इन्हें खरीद पाते थे। उस दौर में फ्रिज लग्जरी उत्पाद माना जाता था।
स्वतंत्रता के बाद देश में घरेलू उपकरणों का बाजार विकसित होना शुरू हुआ और 1 जुलाई 1958 को भारत का पहला स्वदेशी रेफ्रिजरेटर लॉन्च किया गया। यह उपलब्धि भारतीय उद्योग जगत के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुई।
1950 और 1960 के दशक में फ्रिज मुख्य रूप से बड़े शहरों के संपन्न परिवारों तक सीमित था। लेकिन 1970 और 1980 के दशक में यह भारतीय मध्यम वर्ग की पहुंच में आने लगा। इसके बाद घरेलू उपकरण कंपनियों ने बड़े पैमाने पर रेफ्रिजरेटर का उत्पादन शुरू किया और धीरे-धीरे यह हर घर की जरूरत बन गया।
आज फ्रिज सिर्फ भोजन को सुरक्षित रखने का साधन नहीं, बल्कि आधुनिक जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। तकनीक के विकास ने इसे अधिक ऊर्जा-कुशल, सुरक्षित और सुविधाजनक बना दिया है।
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