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दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट क्यों कटा? भाजपा के फैसले के पीछे सामने आईं कई बड़ी वजहें

भोपाल: मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व गृह मंत्री और वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा को उम्मीदवार नहीं बनाया। उनकी जगह संगठन से जुड़े नए चेहरे आशुतोष तिवारी पर दांव लगाया गया। पार्टी के इस फैसले के बाद दतिया में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जो कई जगह हिंसक हो गए। अब सवाल उठ रहा है कि लंबे समय तक पार्टी के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे नरोत्तम मिश्रा को आखिर इस बार टिकट क्यों नहीं मिला।

दतिया से वापसी की तैयारी में थे नरोत्तम मिश्रा

30 जुलाई को होने वाले दतिया विधानसभा उपचुनाव के लिए नरोत्तम मिश्रा लंबे समय से सक्रिय थे। बताया जा रहा है कि उन्होंने नाराज नेताओं से मुलाकात की, विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधियों के साथ बैठकें कीं और पार्टी नेतृत्व से लगातार संपर्क बनाए रखा। उनका प्रयास था कि इस चुनाव के जरिए प्रदेश की सक्रिय राजनीति में वापसी की जाए।

2023 की हार के बाद बदले राजनीतिक समीकरण

नरोत्तम मिश्रा छह बार विधायक रह चुके हैं और 2008 के बाद लगातार तीन बार दतिया सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। हालांकि 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्हें कांग्रेस के राजेंद्र भारती के हाथों हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद पार्टी ने इस बार नए चेहरे को मौका देने का फैसला किया।

टिकट कटते ही भड़का विरोध

आशुतोष तिवारी के नाम की घोषणा होते ही दतिया में पार्टी कार्यकर्ताओं के एक वर्ग ने खुलकर नाराजगी जताई। मंडल और बूथ स्तर के कई पदाधिकारियों ने इस्तीफे दिए। इसके बाद नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने ग्वालियर-झांसी हाईवे पर जाम लगा दिया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई, जिसमें आठ पुलिसकर्मी घायल हुए। कई वाहनों को भी नुकसान पहुंचा।

नरोत्तम मिश्रा ने समर्थकों से की शांति बनाए रखने की अपील

स्थिति बिगड़ने पर नरोत्तम मिश्रा शनिवार को सामने आए और समर्थकों से संयम बरतने की अपील की। उन्होंने कहा कि उम्मीदवार तय करना पार्टी का फैसला है और कार्यकर्ताओं को किसी भी तरह की हिंसक गतिविधि से दूर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपनी बात पार्टी के मंच पर लोकतांत्रिक तरीके से रखी जा सकती है।

टिकट कटने के पीछे क्या मानी जा रही हैं वजहें?

भाजपा के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार इस फैसले के पीछे केवल स्थानीय चुनावी समीकरण नहीं, बल्कि कई राजनीतिक कारण भी रहे। नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों का दावा है कि उन्हें प्रदेश नेतृत्व से सकारात्मक संकेत मिले थे और मुख्यमंत्री मोहन यादव भी उनके नाम पर सहमत थे। बताया जाता है कि वे नामांकन की तैयारी भी कर चुके थे।

हालांकि, पार्टी के केंद्रीय स्तर पर मिले फीडबैक में दतिया में उनकी स्थिति अपेक्षा से कमजोर बताई गई। सूत्रों के मुताबिक स्थानीय स्तर पर उनके खिलाफ नाराजगी और एंटी-इनकंबेंसी को भी गंभीरता से लिया गया।

परिवार से जुड़े मुद्दे भी बने चर्चा का विषय

सूत्रों का कहना है कि पिछले चुनाव के दौरान उनके बेटे सुकर्ण मिश्रा और परिवार से जुड़े कुछ राजनीतिक विवादों का असर भी पार्टी के आकलन में शामिल रहा। माना गया कि इन घटनाओं के कारण स्थानीय स्तर पर असंतोष अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

प्रदेश भाजपा की अंदरूनी राजनीति भी बनी अहम कारण

पार्टी के जानकारों का मानना है कि प्रदेश भाजपा में नेतृत्व को लेकर भी अलग-अलग स्तर पर समीकरण बदल रहे हैं। शिवराज सिंह चौहान सरकार के दौरान नरोत्तम मिश्रा को संगठन और सरकार में बेहद प्रभावशाली नेता माना जाता था। ऐसे में यदि वे उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचते, तो उनके दोबारा मंत्रिमंडल में शामिल होने की संभावना भी बन सकती थी।

सूत्रों के अनुसार मौजूदा नेतृत्व फिलहाल नए शक्ति संतुलन के साथ आगे बढ़ना चाहता है। ऐसे में पार्टी ने संगठन और सरकार दोनों के लिहाज से अलग रणनीति अपनाने का फैसला किया।

आशुतोष तिवारी पर क्यों जताया भरोसा?

भाजपा सूत्रों के मुताबिक आशुतोष तिवारी लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं। उन्हें स्थानीय गुटबाजी से दूर और संगठन का कार्यकर्ता माना जाता है। साथ ही दतिया के जातीय समीकरणों, विशेषकर ब्राह्मण वोटों के संदर्भ में भी उन्हें उपयुक्त उम्मीदवार माना गया।

भाजपा के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

दतिया में नरोत्तम मिश्रा का मजबूत संगठनात्मक आधार भाजपा के लिए चुनौती बना हुआ है। वर्षों में उन्होंने मंडल, जिला और बूथ स्तर तक समर्थकों का व्यापक नेटवर्क तैयार किया है। ऐसे में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती नाराज कार्यकर्ताओं को मनाने और चुनाव में एकजुटता बनाए रखने की होगी।

सूत्रों के मुताबिक भाजपा नेतृत्व अब नरोत्तम मिश्रा को चुनाव प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए मनाने की कोशिश करेगा। साथ ही नाराज पदाधिकारियों से संवाद स्थापित कर संगठन के भीतर असंतोष कम करने की रणनीति पर भी काम किया जा रहा है।

 

vineet verma

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