नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में पिछले कुछ दिनों से दिख रही अपेक्षाकृत शांति एक बार फिर टूट गई है। अमेरिका की ओर से हमला नहीं करने के दावों के बावजूद ईरान ने इस बार भरोसा नहीं जताया और अमेरिकी हितों को निशाना बनाते हुए सैन्य कार्रवाई कर दी। इसके जवाब में अमेरिका ने भी ईरान से जुड़े कई ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। दोनों देशों के बीच बढ़ते टकराव ने पूरे क्षेत्र में तनाव को फिर चरम पर पहुंचा दिया है और हालात गंभीर मोड़ लेते दिखाई दे रहे हैं।
क्या बदला, जिसने ईरान की रणनीति बदल दी?
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इस बार घटनाक्रम पहले से अलग रहा। पहले ईरान आमतौर पर अमेरिकी कार्रवाई के जवाब में सैन्य कदम उठाता था, लेकिन इस बार उसने पहले हमला किया। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि तेहरान ने यह रणनीति इसलिए अपनाई ताकि संघर्ष की दिशा अपने नियंत्रण में रखी जा सके।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की कार्रवाई पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस कदम की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी और अमेरिका पूरी ताकत से जवाब देगा।
युद्धविराम की बात के बाद फिर क्यों बढ़ा तनाव?
कुछ दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया था कि ईरान बातचीत चाहता है और तनाव कम करने का अनुरोध कर चुका है। हालांकि, ईरान ने सार्वजनिक तौर पर कभी इसकी पुष्टि नहीं की। ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने केवल इतना कहा था कि उसकी सेना ने फिलहाल सैन्य कार्रवाई रोकने का फैसला किया था।
ऐसे में अचानक फिर मिसाइल हमलों का शुरू होना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि तेहरान ने अपनी रणनीति बदल ली है और अब वह हालात को अलग तरीके से संभालने की तैयारी में है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों बना सबसे बड़ा विवाद?
ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने सरकारी टेलीविजन को दिए इंटरव्यू में कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान का प्रभाव उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि इस समुद्री मार्ग में ऐसी कोई वैकल्पिक व्यवस्था लागू की जाती है, जिससे ईरान की भूमिका कमजोर हो, तो तेहरान इसे स्वीकार नहीं करेगा।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि देश की संप्रभुता या रणनीतिक हितों को चुनौती मिली तो ईरान दोबारा सैन्य कार्रवाई करने से भी पीछे नहीं हटेगा।
विशेषज्ञों ने बताया रणनीति में बड़ा बदलाव
जर्मनी के इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स से जुड़े शोधकर्ता हमीद रजा अजीजी का मानना है कि ईरान अब पहले की तुलना में अधिक आक्रामक रणनीति अपना रहा है। उनके अनुसार, यदि तेहरान को किसी बड़े खतरे का आभास होता है तो वह पहले हमला करने की नीति भी अपना सकता है। विशेषज्ञ इसे ईरान की सैन्य सोच में महत्वपूर्ण बदलाव मान रहे हैं।
अमेरिका ने कई ठिकानों पर किया जवाबी हमला
ईरानी कार्रवाई के कुछ ही घंटों बाद अमेरिकी सेना ने जवाबी अभियान शुरू कर दिया। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के मुताबिक, रातभर चले अभियान में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से जुड़े कई ठिकानों को निशाना बनाया गया।
अमेरिका का कहना है कि यह कार्रवाई केवल हालिया हमले का जवाब नहीं थी, बल्कि पिछले कई दिनों से अमेरिकी ठिकानों और सहयोगी देशों के ऊर्जा ढांचे पर हो रहे ड्रोन हमलों को देखते हुए भी की गई।
नेतन्याहू-ट्रंप मुलाकात के बाद बढ़ा तनाव
ईरान की कार्रवाई ऐसे समय हुई जब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने वॉशिंगटन में राष्ट्रपति ट्रंप से मुलाकात की थी। बैठक के बाद नेतन्याहू ने इसे दोनों नेताओं के बीच हुई सबसे बेहतर बैठकों में से एक बताया।
इसी दौरान इजरायल के रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि इजरायल ईरान के ऊर्जा ढांचे पर हमला करना चाहता था, लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की ताजा कार्रवाई इस पूरे कूटनीतिक घटनाक्रम का भी संदेश हो सकती है।
इराक और जॉर्डन तक फैल गया तनाव
तनाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहा। जॉर्डन में हुई घटना के बाद अमेरिका और सऊदी अरब ने इराक में ईरान समर्थित मिलिशिया के ठिकानों पर संयुक्त कार्रवाई की।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, यह अभियान पिछले 72 घंटों में अमेरिकी ठिकानों और सऊदी ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हुए 30 से अधिक ड्रोन हमलों की पृष्ठभूमि में चलाया गया। इससे साफ है कि संघर्ष का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
सऊदी अरब पर तीन तरफ से बढ़ा दबाव
सऊदी अरब इस समय एक साथ कई मोर्चों पर दबाव का सामना कर रहा है। यमन में हूती विद्रोही, इराक में ईरान समर्थित संगठन और खुद ईरान से पैदा हो रहे खतरे ने उसकी सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है।
इजरायल के इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज के वरिष्ठ शोधकर्ता डैनी सिट्रिनोविच के मुताबिक, न तो ईरान और न ही उसके सहयोगी संगठन अपने रणनीतिक लक्ष्यों से पीछे हटने के संकेत दे रहे हैं। यही वजह है कि पूरे क्षेत्र में तनाव लगातार बना हुआ है।
हूती विद्रोहियों ने बढ़ाया समुद्री दबाव
ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ नया मोर्चा खोलते हुए बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य और लाल सागर के रास्ते आने-जाने वाले जहाजों पर दबाव बढ़ा दिया है। उन्होंने सऊदी अरब की समुद्री आपूर्ति प्रभावित करने की चेतावनी भी दी है।
हूतियों ने दावा किया है कि उन्होंने सऊदी अरब की पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन से जुड़े ऊर्जा प्रतिष्ठानों को भी निशाना बनाया। समुद्री सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, हालात बिगड़ने के बाद कई व्यापारिक जहाजों ने अपना मार्ग बदल लिया है और बाब-अल-मंदेब से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
इराक में ईरान समर्थित गुटों पर संयुक्त कार्रवाई
सऊदी अरब ने आरोप लगाया कि इराक में सक्रिय ईरान समर्थित मिलिशिया ने लगातार दो दिनों तक उसके तेल प्रतिष्ठानों को ड्रोन से निशाना बनाया। इसके बाद अमेरिका और सऊदी अरब ने संयुक्त हवाई कार्रवाई करते हुए इराक में कई ठिकानों पर बमबारी की।
बताया गया कि इस कार्रवाई में कई लड़ाके और ईरानी सलाहकार मारे गए। हालांकि, इराक सरकार ने इस सैन्य कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा कि जांच पूरी होने से पहले ही हमला कर दिया गया। लंबे समय से अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा इराक अब बेहद कठिन स्थिति में पहुंच गया है।
दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर दोनों क्षेत्रों में तनाव लगातार बना रहता है, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार, ऊर्जा कीमतों और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। इसी वजह से पूरी दुनिया की नजर अब अमेरिका और ईरान के अगले कदम पर टिकी हुई है।