उस अविस्मरणीय पल को याद कीजिए, जब आपने पहली बार आपने रेडियो देखा और उसका डायल घुमाकर या बटन दबाकर किसी कार्यक्रम को सुना था। उस रोमांच की क्या आज भी अनुभूति होती है जब उन मधुर गीतों, स्वरों, शब्दों और ध्वनियों ने आपको कल्पनाओं से निर्मित एक अद्भुत संसार में सरलता से पहुँचा दिया था। यही तो रेडियो की कला है, शक्ति है, जादू है-वह डर और एकाकीपन को दूर कर संगीत और ध्वनियों की मधुर लहरियों के माध्यम से श्रोता के मन को भाव विभोर कर आनंद, अपनत्व और उल्लास से भर देता है।
रेडियो की शक्ति
आज विकसित और विकासशील—दोनों प्रकार के देशों में रेडियो का स्थान अत्यंत विशिष्ट, प्रभावशाली और महत्त्वपूर्ण है। यह केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति का संवाहक तथा हमारी सांस्कृतिक विरासत का सशक्त संरक्षक भी है। हर्ट्ज़, मैक्सवेल, फैराडे और मार्कोनी जैसे महान वैज्ञानिकों के अद्भुत आविष्कारों एवं अनुसंधानों ने उस वैज्ञानिक आधारशिला का निर्माण किया, जिसके परिणामस्वरूप रेडियो का जन्म हुआ। आज सम्पूर्ण वैश्विक संचार व्यवस्था का आधार ही रेडियो तरंगें हैं।
1920 में पीट्सबर्ग में विश्व के प्रथम व्यावसायिक रेडियो स्टेशन की स्थापना के साथ संगठित रेडियो प्रसारण का नया युग प्रारंभ हुआ। भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत बॉम्बे रेडियो क्लब के प्रयासों से हुई। वर्ष 1927 में मुंबई में देश का पहला रेडियो स्टेशन स्थापित हुआ, जिसे 1936 में ‘ऑल इंडिया रेडियो’ के नाम से जाना जाने लगा।
भारत मूलतः ‘श्रुति’ की संस्कृति का देश है। यही समृद्ध श्रवण परंपरा भारतीय आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन में सुनने की महत्ता को अत्यंत गहराई से स्थापित करती है। रेडियो मानव की इसी जन्मजात श्रवण क्षमता का एक अद्भुत विस्तार है। यह ध्वनि को ज्ञान, संवेदना, कल्पना और प्रेरणा में रूपांतरित कर देता है।
रेडियो की शैली
रेडियो केवल मधुर गीतों के प्रसारण या मनोरंजक वार्तालापों तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक स्वरूप भारतीय दर्शन के उस महान आदर्श में निहित है- “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय”। शब्दों, संगीत, मौन और ध्वनि-प्रभावों के अद्भुत समन्वय के माध्यम से रेडियो इस महान उद्देश्य को साकार करता है और जन-जन के जीवन को समृद्ध बनाता है।
रेडियो का परिवर्तित स्वरूप
रेडियो ने अपनी विकास-यात्रा में अनेक तकनीकी परिवर्तनों और नवाचारों के अद्भुत पड़ाव पार किए हैं। एक समय था जब बड़े-बड़े वाल्वयुक्त मर्फ़ी रेडियो प्रत्येक घर के बैठक-कक्ष की शान हुआ करते थे। समय के साथ इन विशाल उपकरणों का स्थान ट्रांजिस्टर रेडियो ने लिया। आज रेडियो मोबाइल फ़ोन, इंटरनेट और डिजिटल एप्लिकेशनों के माध्यम से हमारी जेब तक पहुँच चुका है। इसकी पहुँच अब किसी भौगोलिक सीमा में बंधी नहीं रही।
आकाशवाणी अपने विविधतापूर्ण कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग और प्रत्येक आयु समूह तक पहुँचती है। विश्व के बहुत कम प्रसारण संस्थानों के पास साहित्य, संस्कृति, संगीत और इतिहास से संबंधित इतना विशाल एवं बहुमूल्य ध्वनि-संग्रह उपलब्ध है। आकाशवाणी का यह अमूल्य अभिलेखागार भारत की सांस्कृतिक, साहित्यिक और ऐतिहासिक विरासत का अनुपम राष्ट्रीय खजाना है।
रेडियो और ग्रामीण विकास
अनेक विकासशील देशों में रेडियो सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त उत्प्रेरक सिद्ध हुआ है। यह ग्रामीण समुदायों को समयानुकूल, प्रासंगिक और उपयोगी जानकारी प्रदान कर उन्हें सशक्त करता है। रेडियो के माध्यम से किसानों को उन्नत कृषि तकनीकों, उच्च उत्पादकता वाले बीजों, फसल प्रबंधन, कृषि विपणन, पशुओं के स्वास्थ्य और उत्पादन वृद्धि के उपायों की जानकारी सरल एवं व्यवहारिक रूप में उपलब्ध कराई जा सकती है।
रेडियो एक लोकतांत्रिक मंच भी प्रदान करता है, जहाँ ग्रामीण समुदाय अपनी राय, आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को खुलकर व्यक्त कर सकते हैं तथा दूसरों की बात भी सुन सकते हैं। यह आधुनिक युग की चौपाल के रूप में कार्य करता है। रेडियो दूरस्थ क्षेत्रों में बोली जाने वाली विलुप्तप्राय भाषाओं और बोलियों के संरक्षण तथा संवर्धन में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
रेडियो के सफ़र में 12 मील के पत्थर
23 जुलाई 1927: इंडियन ब्रॉडकास्ट कंपनी द्वारा भारत के पहले रेडियो स्टेशन का बॉम्बे में उद्घाटन।
8 जून 1936: नाम बदलकर ‘आल इंडिया रेडियो’ (1956 में ‘आकाशवाणी’) किया गया।
12 नवम्बर 1947: महात्मा गांधी का आकाशवाणी से पहला व अंतिम सजीव प्रसारण।
3 अक्तूबर 1957: स्वस्थ मनोरंजन के लिए ‘विविध भारती’ सेवा का आरम्भ।
23 जुलाई 1977: पहली बार ऍफ़ एम् तकनीक का प्रयोग मद्रास से हुआ।
30 अक्तूबर 1984: तमिलनाडु के नागरकोइल से पहला स्थानीय रेडियो स्टेशन अस्तित्व में आया।
1985: आल इंडिया रेडियो को सॅटॅलाइट इनसेट से जोड़ा गया।
10 जनवरी 1993: द्विपक्षीय संचार हेतु ‘फ़ोन इन’ कार्यक्रमों का आगाज़।
23 नवम्बर 1997: स्वायत्त संस्था के रूप में प्रसार भारती का गठन।
3 जुलाई 2001: रेडियो सिटी ने बंगलोर में पहले प्राइवेट एफएम स्टेशन की स्थापना की।
1 फ़रवरी 2004: अन्ना रेडियो चेन्नई से सामुदायिक (कम्युनिटी) रेडियो की शुरुआत।
3 अक्तूबर 2014: आकाशवाणी से ‘मन की बात’ कार्यक्रम का सूत्रपात।
मन की बात’ से जन की बात
3 अक्तूबर 2014 को प्रारम्भ हुआ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ भारत में विकासात्मक प्रसारण को एक नई दिशा, नई ऊर्जा और नया उद्देश्य प्रदान करने वाला ऐतिहासिक संचार अभियान सिद्ध हुआ है। ‘मन की बात’ ने भारत में रेडियो के पुनर्जागरण का सूत्रपात किया है। प्रेरित करने, समाज को जोड़ने, राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने और राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया को सशक्त बनाने में रेडियो आज भी उतना ही प्रभावशाली है जितना अपने स्वर्णिम काल में था।
(लेखक के निजी विचार हैं )
सुरेश वर्मा वरिष्ठ स० प्रोफेसर ( रेडियो )
जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
