नई दिल्ली: एक समय था जब घड़ी, रुमाल और छोटी कंघी कई पुरुषों की रोजमर्रा की जरूरी चीजों में शामिल हुआ करती थी। समय बदला तो घड़ी की जगह मोबाइल ने ले ली और रुमाल की जगह कई लोग टिशू रखने लगे, लेकिन छोटी कंघी आज भी कुछ पुरुषों की जेब में नजर आ जाती है। खासकर किसी मीटिंग या लोगों के बीच जाने से पहले बालों को ठीक करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। देखने में यह एक मामूली आदत लग सकती है, लेकिन मनोविज्ञान के नजरिए से इसके पीछे ग्रूमिंग, अपनी छवि और दूसरों पर पड़ने वाले प्रभाव से जुड़े कुछ पहलू हो सकते हैं।
हालांकि, सिर्फ जेब में कंघी रखने की आदत के आधार पर किसी व्यक्ति की पूरी शख्सियत तय नहीं की जा सकती। फिर भी मनोविज्ञान की कुछ अवधारणाएं यह समझने में मदद करती हैं कि छोटी-छोटी ग्रूमिंग आदतें किस तरह व्यक्ति के व्यवहार और सामाजिक छवि से जुड़ सकती हैं।
दूसरे लोग कैसे देखते हैं, इसकी चिंता से जुड़ सकती है आदत
मनोविज्ञान की कुछ थ्योरी के मुताबिक, जो लोग हमेशा कंघी अपने साथ रखते हैं, वे अपने लुक और इस बात को लेकर सजग हो सकते हैं कि दूसरे लोग उन्हें किस तरह देखते हैं। ऑफिस, मीटिंग या किसी सामाजिक कार्यक्रम में जाने से पहले खुद को सलीके से तैयार रखना इसी सोच का हिस्सा हो सकता है।
कंघी रखना सिर्फ बालों को व्यवस्थित करने तक सीमित नहीं है। यह ग्रूमिंग, खुद को प्रस्तुत करने की इच्छा और अपने लुक पर नियंत्रण रखने की आदत से भी जुड़ा हो सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि कंघी रखने वाला हर व्यक्ति अपनी शक्ल-सूरत को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंतित है।
सेल्फ प्रिजेंटेशन थ्योरी क्या कहती है?
इस व्यवहार को समझने के लिए सेल्फ प्रिजेंटेशन थ्योरी का भी इस्तेमाल किया जाता है। इरविंग गोफमैन और मार्क लैरी जैसे शोधकर्ताओं ने सामाजिक परिस्थितियों में लोग खुद को दूसरों के सामने किस तरह पेश करते हैं, इस विषय पर चर्चा की है।
इस नजरिए के अनुसार, लोग अक्सर इस बात को लेकर सजग रहते हैं कि सामने वाले पर उनकी कैसी छवि बन रही है। इसी वजह से कुछ लोग अपने कपड़ों, बालों और पूरे लुक को लेकर ज्यादा सतर्क रहते हैं। ऐसे में कंघी एक आसान ग्रूमिंग टूल बन जाती है, जिसे जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल किया जा सकता है।
अच्छा दिखने से खुद के बारे में भी बेहतर महसूस हो सकता है
अपीयरेंस से जुड़ी एक रिसर्च में यह देखा गया है कि लोग अपने पहनावे और प्रस्तुति के जरिए दूसरों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर प्रेरित हो सकते हैं। मनोवैज्ञानिक जॉन नेजलेक के एक अध्ययन में रोजाना पहने जाने वाले कपड़ों और लोगों के सामने अच्छा दिखने की प्रेरणा के बीच संबंध देखा गया था।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जब लोग अपने कपड़ों और लुक से संतुष्ट होते हैं तो वे अपने बारे में बेहतर महसूस कर सकते हैं। यह शोध सीधे जेब में कंघी रखने की आदत पर आधारित नहीं है, लेकिन इससे यह समझने में मदद मिलती है कि छोटी-छोटी ग्रूमिंग आदतों का व्यक्ति के मनोविज्ञान में एक अर्थ हो सकता है।
कंघी रखने से मिल सकता है ‘कंट्रोल’ का एहसास
जेब में कंघी रखने की आदत को नियंत्रित व्यवहार से भी जोड़कर देखा जा सकता है। मान लीजिए कोई व्यक्ति जरूरी मीटिंग के लिए घर से निकला। रास्ते में ट्रैफिक, मौसम, तेज हवा या पसीने जैसी कई चीजों पर उसका नियंत्रण नहीं है। लेकिन मीटिंग में पहुंचने के बाद अपने बालों को दोबारा व्यवस्थित करना उसके हाथ में है।
ऐसे में कंघी सिर्फ बाल संवारने का सामान नहीं रहती, बल्कि व्यक्ति को यह एहसास भी दे सकती है कि अगर लुक बिगड़ा तो वह उसे तुरंत ठीक कर सकता है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि कंघी रखने वाला हर व्यक्ति इसे इसी नजरिए से देखता हो।
‘मैं तैयार हूं’ वाली भावना से भी जुड़ी हो सकती है आदत
मनोविज्ञान के नजरिए से कंघी अपने साथ रखने से व्यक्ति में तैयार रहने की भावना पैदा हो सकती है। जेब में कंघी होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति अपने लुक को लेकर असामान्य रूप से चिंतित है। यह उसकी रोजमर्रा की तैयारी और ग्रूमिंग रूटीन का सामान्य हिस्सा भी हो सकता है।
पुरुषों की ग्रूमिंग शैली पर हुए एक मिश्रित अध्ययन में भी यह देखा गया कि पुरुषों के लिए उनका लुक सिर्फ चिंता का विषय नहीं होता, बल्कि आकर्षण और सामाजिक स्थिति जैसे पहलुओं से भी जुड़ सकता है। इसलिए जेब में रखी एक छोटी कंघी बाहर से भले ही मामूली चीज लगे, लेकिन किसी व्यक्ति की ग्रूमिंग आदतों और सामाजिक व्यवहार के बड़े पैटर्न का हिस्सा हो सकती है।