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जन्माष्टमी पर कान्हा की वो बांसुरी, जिसकी तान पर मिट गईं मजहब की दीवारें… रसखान से बिस्मिल्लाह खान तक हुए कृष्ण के दीवाने

vineet verma
Last updated: September 4, 2026 9:33 pm
vineet verma
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मथुरा: जन्माष्टमी के मौके पर देशभर में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की धूम है। मंदिरों से लेकर घरों तक कान्हा की पूजा-अर्चना हो रही है। लेकिन कृष्ण भक्ति की सबसे खास बात यह है कि उनका प्रेम किसी एक धर्म या संप्रदाय की सीमा में कभी बंधकर नहीं रहा। भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में कई मुस्लिम हस्तियां ऐसी रही हैं, जिन्होंने श्रीकृष्ण को अपना आराध्य माना और भक्ति, साहित्य तथा संगीत के जरिए उनके प्रति अपनी आस्था व्यक्त की।

Contents
रसखान के लिए कृष्ण ही सबकुछ बन गएकृष्ण की तलाश में दिल्ली छोड़ ब्रज आ गए रसखानब्रजभाषा में बह निकला कृष्ण प्रेममुस्लिम परिवार में जन्मे मोहम्मद जावेद बने कृष्णदासीयहूदी परिवार की महिला भी कृष्ण को मानती हैं अपना भगवानताज बीवी से बिस्मिल्लाह खान तक कृष्ण प्रेम की परंपराकृष्ण भक्ति ने सदियों से तोड़ी मजहब की सीमाएं

कृष्ण के इसी आकर्षण ने कभी रसखान जैसे कवि को ब्रज की गलियों तक खींच लिया तो कभी मोहम्मद जावेद को शीबू कृष्णदासी के रूप में पहचान दिलाई। ताज बीवी और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम भी इसी परंपरा से जुड़ता है। सवाल यही है कि आखिर कान्हा की भक्ति में ऐसा क्या था, जिसने सदियों से मजहब की सीमाओं को पीछे छोड़ दिया?

रसखान के लिए कृष्ण ही सबकुछ बन गए

कृष्ण भक्तों में सबसे चर्चित नाम रसखान का है। उनका वास्तविक नाम सैयद इब्राहिम खान था। 16वीं सदी में विट्ठलनाथ से दीक्षा लेने के बाद उन्होंने ब्रज को ही अपना ठिकाना बना लिया। कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि उन्होंने अपने सवैयों में अगला जन्म भी ब्रज में बिताने की इच्छा व्यक्त की।

रसखान ने लिखा था-

मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन।
जौ पसु हौं तौ कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मंझारन॥

इन पंक्तियों में रसखान की इच्छा साफ दिखाई देती है। वह कहते हैं कि यदि मनुष्य का जन्म मिले तो ब्रज और गोकुल के ग्वालों के बीच रहें। पशु बनें तो नंद बाबा की गायों के बीच चरें। पत्थर बनें तो गोवर्धन पर्वत का हिस्सा बनें और पक्षी का जन्म मिले तो यमुना किनारे कदंब की डालियों पर बसेरा हो।

कृष्ण की तलाश में दिल्ली छोड़ ब्रज आ गए रसखान

गोकुल के रेती रमण क्षेत्र में रसखान की समाधि आज भी उनके कृष्ण प्रेम की कहानी कहती है। कहा जाता है कि सैयद इब्राहिम खान एक पठान परिवार से थे, लेकिन कृष्ण की भक्ति में ऐसे रंगे कि उनकी पहचान ही रसखान के रूप में हो गई।

समय बदला, हुकूमतें बदलीं और कई सदियां गुजर गईं, लेकिन रसखान का कृष्ण प्रेम ब्रज की धरती पर आज भी उनकी रचनाओं और समाधि के जरिए दिखाई देता है।

डॉ. उमेश चंद्र शर्मा के मुताबिक, रसखान के भीतर कृष्ण के दर्शन की ऐसी तीव्र लालसा थी कि वह ब्रज में ही रम गए और पूरी तरह भगवान के हो गए। रसखान समाधि परिसर के इंचार्ज अनुपम कुमार के अनुसार, रसखान दिल्ली छोड़कर ब्रज आ गए थे। उनके मन में कृष्ण के बाल स्वरूप को देखने की ऐसी लालसा थी कि उन्होंने अपना जीवन इसी भक्ति को समर्पित कर दिया।

ब्रज के गायक मधुकर जी के मुताबिक, रसखान भगवान कृष्ण की एक तस्वीर देखकर उनके प्रति आकर्षित हुए थे। वह लोगों से तस्वीर दिखाकर पूछते फिरते थे कि यह कौन हैं और कहां रहते हैं। इसी तलाश के बाद उनकी कृष्ण भक्ति और गहरी होती चली गई।

ब्रजभाषा में बह निकला कृष्ण प्रेम

रसखान की खासियत सिर्फ उनकी भक्ति नहीं, बल्कि उनकी भाषा भी थी। फारसी और उर्दू के माहौल में पले-बढ़े रसखान ने ब्रजभाषा में कृष्ण प्रेम को जिस तरह शब्द दिए, वह आज भी हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर माना जाता है।

उनकी रचनाओं में दिखावटी आडंबर के बजाय कृष्ण के प्रति सीधा और गहरा प्रेम नजर आता है। इसी वजह से उन्हें ‘रस की खान’ कहा गया।

रसखान ने ‘सुजान-रसखान’, ‘प्रेमवाटिका’, ‘दानलीला’ और ‘अष्टयाम’ जैसी रचनाएं लिखीं। उनके सवैये और अन्य कृष्ण-काव्य आज भी साहित्य जगत में पढ़े जाते हैं और स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं।

ब्रज गायक मधुकर जी का कहना है कि जब किसी भक्त पर ठाकुर जी की कृपा होती है तो भाषा अपने आप उसके भावों को व्यक्त करने लगती है। डॉ. उमेश चंद्र शर्मा के अनुसार, रसखान ने सिर्फ कृष्ण को ही नहीं अपनाया, बल्कि ब्रज की भाषा और वहां की संस्कृति को भी पूरी तरह आत्मसात कर लिया।

मुस्लिम परिवार में जन्मे मोहम्मद जावेद बने कृष्णदासी

कृष्ण भक्ति की यही परंपरा आधुनिक समय में भी दिखाई देती है। बिहार के बेतिया में मुस्लिम परिवार में जन्मे मोहम्मद जावेद कृष्ण भक्ति की ओर ऐसे आकर्षित हुए कि बाद में उनकी पहचान शीबू कृष्णदासी के रूप में होने लगी।

कृष्ण के प्रति उनकी आस्था का अंदाजा उनके उस भाव से लगाया जा सकता है, जिसमें वह कहते हैं कि भूत के चिपक जाने का इलाज हो सकता है, लेकिन नंद के पुत्र कृष्ण का प्रेम लग जाए तो उसका कोई इलाज नहीं।

यहूदी परिवार की महिला भी कृष्ण को मानती हैं अपना भगवान

कृष्ण भक्ति की पहुंच सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। इस्कॉन के एक मंदिर में माला जपने वाली एक महिला ने बताया कि उनका जन्म यहूदी परिवार में हुआ था, लेकिन आज कृष्ण ही उनके भगवान हैं और वह खुद को उनकी सेवक मानती हैं।

उनका कहना है कि उनकी कोशिश रहती है कि इस जीवन में और अगले जीवन में भी राधा-कृष्ण की सेवा कर सकें।

इसी तरह रूस से आई एक युवती भी मंदिर में कृष्ण भजन में डूबी नजर आई। वह मंजीरा बजाते हुए भक्ति में लीन थी। उसने बताया कि उसके लिए कृष्ण मित्र भी हैं, भगवान भी हैं और सबकुछ भी।

ताज बीवी से बिस्मिल्लाह खान तक कृष्ण प्रेम की परंपरा

कृष्ण भक्ति से जुड़ी मुस्लिम हस्तियों की यह कहानी कई सदियों पुरानी है। 17वीं सदी की कवयित्री ताज बीवी का नाम भी इसी परंपरा में लिया जाता है। इतिहासकार डॉ. विजेंद्र के लेखन के मुताबिक, अकबर के समकालीन ताज बीवी कृष्ण के रूप से इतनी प्रभावित थीं कि उन्होंने अपनी रचना में कृष्ण से अपने प्रेम और समर्पण को व्यक्त किया।

20वीं सदी में यही भाव संगीत की दुनिया के महान शहनाई वादक और भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के रूप में नजर आता है। समाचार पत्रों, दूरदर्शन पर प्रसारित कार्यक्रमों और सरकारी अभिलेखागारों में दर्ज साक्षात्कारों के मुताबिक, वह काशी विश्वनाथ मंदिर और संकटमोचन में शहनाई बजाते थे। कृष्ण भजनों के प्रति भी उनकी गहरी आस्था थी।

कृष्ण भक्ति ने सदियों से तोड़ी मजहब की सीमाएं

रसखान से लेकर ताज बीवी, मोहम्मद जावेद और बिस्मिल्लाह खान तक की कहानियां कृष्ण भक्ति के उस स्वरूप को सामने लाती हैं, जिसमें धर्म और जाति की सीमाएं पीछे छूट जाती हैं।

कृष्ण के प्रति इन हस्तियों का प्रेम सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं रहा। किसी ने ब्रजभाषा में काव्य रचा, किसी ने संगीत के जरिए भक्ति को स्वर दिया और किसी ने अपना पूरा जीवन कृष्ण की सेवा में समर्पित कर दिया। यही वजह है कि कृष्ण की बांसुरी और उनकी भक्ति भारतीय संस्कृति में आज भी ऐसी साझा विरासत के रूप में देखी जाती है, जो लोगों को जोड़ती है।

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