नई दिल्ली: सऊदी अरब के पास अमेरिका से मिले पैट्रियट और THAAD जैसे अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद हैं, लेकिन इसके बावजूद यमन से संचालित हूती विद्रोही लगातार सऊदी की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। कम लागत वाले ड्रोन और मिसाइलों के जरिए हूती अब रियाद, जेद्दा और देश के दूसरे अहम ठिकानों तक हमले पहुंचाने में सफल हो रहे हैं।
यमन के सादा इलाके से करीब 910 किलोमीटर दूर स्थित रियाद और लगभग 715 किलोमीटर दूर जेद्दा तक हूती हमलों का पहुंचना इस बात का संकेत है कि संघर्ष अब सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं रह गया है। हाल के हमलों में रियाद के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को निशाना बनाया गया, जबकि जेद्दा में भी मिसाइल हमले को लेकर अलर्ट जारी करना पड़ा।
इन हमलों में बड़ी संख्या में लोगों के हताहत होने की जानकारी सामने आई है। रियाद एयरपोर्ट पर हुए हमले के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर आधुनिक अमेरिकी रक्षा प्रणालियां हूती ड्रोन और मिसाइलों को पूरी तरह रोकने में क्यों नाकाम साबित हो रही हैं।
पैट्रियट और THAAD के बावजूद कैसे पहुंच रहे हमले?
सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा मजबूत करने के लिए अमेरिका से पैट्रियट और THAAD जैसे अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम खरीदे हैं। इनका उद्देश्य दुश्मन की मिसाइलों और हवाई हमलों को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही नष्ट करना है।
इसके बावजूद हूती विद्रोही बार-बार सऊदी के भीतर तक हमले करने में कामयाब हो रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसकी एक बड़ी वजह हूतियों की अलग-अलग क्षमता वाले हथियारों का इस्तेमाल है, जिनमें ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल हैं।
10 अक्टूबर को हुआ हमला पिछले एक दशक से अधिक समय में सऊदी अरब पर हुए सबसे गंभीर हमलों में से एक माना जा रहा है। इससे पहले तक संघर्ष मुख्य रूप से यमन सीमा के आसपास केंद्रित था, लेकिन अब इसकी पहुंच राजधानी रियाद तक हो चुकी है।
दक्षिणी सीमा से शुरू हुआ खतरा अब पूरे सऊदी तक फैला
यमन से लगी सऊदी अरब की दक्षिणी सीमा लंबे समय से हूती हमलों का केंद्र रही है। जिजान, नजरान और असीर जैसे इलाकों में पहले भी कई हमले हो चुके हैं।
एक अध्ययन के अनुसार, सऊदी अरब में हुए हूती हमलों का बड़ा हिस्सा इन्हीं दक्षिणी क्षेत्रों में हुआ था। इसकी वजह यमन से इन इलाकों की कम दूरी है, जिससे एयर डिफेंस सिस्टम को प्रतिक्रिया देने के लिए कम समय मिलता है।
हालांकि अब खतरा केवल दक्षिणी इलाकों तक सीमित नहीं है। ताइफ, यानबू, रियाद और दम्माम जैसे महत्वपूर्ण शहर भी हूती हमलों की जद में आ चुके हैं। यानबू लाल सागर के किनारे स्थित एक महत्वपूर्ण तेल निर्यात केंद्र है, जबकि दम्माम देश के पूर्वी हिस्से का प्रमुख शहर है।
हूतियों के हथियारों का बढ़ता नेटवर्क बना चुनौती
हूती विद्रोहियों के पास कई तरह के ड्रोन और मिसाइल सिस्टम मौजूद हैं। इनमें बैलिस्टिक मिसाइल, एंटी-शिप मिसाइल, क्रूज मिसाइल और लंबी दूरी तक हमला करने वाले ड्रोन शामिल हैं।
इन हथियारों में जुल्फिकार बैलिस्टिक मिसाइल, अल-मंदब-2 क्रूज मिसाइल, समद-3 और शिहाब ड्रोन जैसे हथियारों का नाम सामने आता रहा है।
रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, अलग-अलग गति और ऊंचाई पर उड़ने वाले इन हथियारों का एक साथ इस्तेमाल किसी भी एयर डिफेंस सिस्टम के लिए बड़ी चुनौती पैदा कर सकता है। कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन और क्रूज मिसाइलों का पता लगाना मुश्किल होता है, क्योंकि उन्हें रोकने के लिए प्रतिक्रिया का समय काफी कम रह जाता है।
करोड़ों की रक्षा प्रणाली बनाम सस्ते ड्रोन की रणनीति
हूती हमलों की सबसे बड़ी चुनौती हथियारों की कीमत में भारी अंतर है। एक तरफ सऊदी अरब को दुश्मन की मिसाइलों को रोकने के लिए बेहद महंगे इंटरसेप्टर इस्तेमाल करने पड़ते हैं, वहीं दूसरी ओर हूती कम लागत वाले ड्रोन के जरिए लगातार हमले करने में सक्षम हैं।
अनुमानों के मुताबिक, पैट्रियट सिस्टम की एक इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत 10 लाख डॉलर से अधिक हो सकती है, जबकि हूती विद्रोहियों के कई ड्रोन कुछ सौ डॉलर में तैयार किए जा सकते हैं।
यही अंतर आधुनिक युद्ध की नई चुनौती बन गया है। एयर डिफेंस सिस्टम भले ही ज्यादातर हमलों को रोकने में सफल रहे, लेकिन एक भी ड्रोन या मिसाइल सुरक्षा घेरे को पार कर जाए तो एयरपोर्ट, तेल ठिकानों और आम नागरिकों को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है।
सऊदी अरब के सामने अब चुनौती केवल हमले रोकने की नहीं, बल्कि कम लागत वाले हथियारों के खिलाफ लंबे समय तक प्रभावी और किफायती सुरक्षा व्यवस्था तैयार करने की भी है।