नई दिल्ली: देश की राजधानी का जंतर-मंतर सिर्फ एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि दशकों से जनता की आवाज, विरोध और लोकतांत्रिक संघर्षों का सबसे बड़ा मंच रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन से लेकर निर्भया कांड के बाद उमड़े जनआक्रोश, तमिलनाडु के किसानों के प्रदर्शन और पहलवानों के धरने तक, इस जगह ने देश के कई बड़े आंदोलनों को अपनी आंखों के सामने देखा है।
यह वही स्थान है जहां आम लोगों ने सरकार तक अपनी बात पहुंचाने, न्याय की मांग करने और सत्ता से जवाब मांगने के लिए आवाज बुलंद की। हालांकि, अब दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर को निर्धारित विरोध स्थल की सूची से हटाए जाने के बाद यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या देश के सबसे चर्चित प्रदर्शन स्थल की भूमिका बदलने जा रही है?
समय मापने वाले यंत्रों से लोकतंत्र की आवाज तक बना सफर
जंतर-मंतर की पहचान शुरुआत में खगोलीय घटनाओं और समय की गणना करने वाले विशाल यंत्रों के लिए थी, लेकिन समय के साथ इसकी भूमिका बदलती गई। यह जगह धीरे-धीरे देश के सामाजिक, राजनीतिक और जन मुद्दों पर विरोध दर्ज कराने का प्रमुख केंद्र बन गई।
यहां भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, किसानों की समस्याओं, शिक्षा व्यवस्था, भेदभाव और सरकारी नीतियों के खिलाफ लोग जुटते रहे। जंतर-मंतर की खासियत यह रही कि यहां आने वाले लोग सिर्फ प्रदर्शन नहीं करते थे, बल्कि देश और सरकार का ध्यान उन मुद्दों की ओर खींचने की कोशिश करते थे, जिन्हें वे लंबे समय से अनसुना महसूस कर रहे थे।
1993 में आर्थिक नीतियों के विरोध से शुरू हुई बड़ी प्रदर्शनों की कहानी
जंतर-मंतर पर हुए बड़े प्रदर्शनों में वर्ष 1993 का आंदोलन भी महत्वपूर्ण माना जाता है। उस समय 33 संगठनों ने सरकार की आर्थिक नीतियों और सांप्रदायिकता के विरोध में ‘जेल भरो’ प्रदर्शन किया था।
इस आंदोलन में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया था। संसद में भी इस प्रदर्शन का उल्लेख हुआ, जहां एक सांसद ने इसमें करीब 25 हजार लोगों के शामिल होने का दावा किया था। इस घटना ने साबित कर दिया था कि जंतर-मंतर आम लोगों और संगठनों के लिए अपनी नाराजगी दर्ज कराने का प्रभावी मंच बन चुका है।
अन्ना आंदोलन ने जंतर-मंतर को बनाया राष्ट्रीय पहचान का केंद्र
साल 2011 में जंतर-मंतर एक बार फिर देशभर की सुर्खियों में आया, जब सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा आंदोलन शुरू किया।
5 अप्रैल 2011 को अन्ना हजारे ने मजबूत जन लोकपाल कानून की मांग को लेकर पांच दिन की भूख हड़ताल शुरू की थी। इस आंदोलन को देश के अलग-अलग हिस्सों से भारी जनसमर्थन मिला।
बढ़ते दबाव के बाद सरकार ने मंत्रियों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए संयुक्त मसौदा समिति बनाने पर सहमति जताई। 9 अप्रैल को अन्ना हजारे ने अपना अनशन खत्म किया। इस आंदोलन के बाद जंतर-मंतर देश में सरकार से जवाबदेही मांगने वाले आंदोलनों का प्रमुख चेहरा बन गया।
निर्भया कांड के बाद यहीं से उठी महिला सुरक्षा की सबसे बड़ी आवाज
दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया कांड ने पूरे देश को झकझोर दिया था। चलती बस में युवती के साथ हुई बर्बर घटना के बाद देशभर में गुस्सा फैल गया।
न्याय की मांग और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर हजारों लोग सड़कों पर उतरे। जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में लगातार प्रदर्शन हुए। युवाओं से लेकर आम नागरिकों तक ने सरकार से सख्त कानून और सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव की मांग की।
दिल्ली के रहने वाले डॉ. प्रणव राज सिंह ने बताया था कि उस समय वह किशोर थे और घटना ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया था। उन्होंने अपने दोस्तों के साथ जंतर-मंतर पहुंचकर प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। उनके लिए यह जगह नागरिकों के अधिकार और जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगने का प्रतीक बन गई।
नीडो तानिया मामले में पूर्वोत्तर की आवाज भी बनी पहचान
साल 2014 में अरुणाचल प्रदेश के छात्र नीडो तानिया की मौत के बाद भी जंतर-मंतर पर बड़े प्रदर्शन हुए थे।
दक्षिण-पूर्वी दिल्ली में कथित मारपीट के बाद हुई उनकी मौत ने पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव और हिंसा के मुद्दे को राष्ट्रीय बहस में ला दिया। प्रदर्शनकारियों ने न्याय की मांग के साथ ऐसे मामलों को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने की अपील की।
41 दिनों तक किसानों के संघर्ष का गवाह बना जंतर-मंतर
साल 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने जंतर-मंतर पर 41 दिनों तक प्रदर्शन किया था। किसानों ने कर्ज, सूखे और कृषि संकट से जुड़ी समस्याओं को लेकर सरकार का ध्यान खींचने की कोशिश की।
यह आंदोलन इस बात का उदाहरण बना कि देश के दूर-दराज इलाकों में रहने वाले किसान भी अपनी आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के लिए जंतर-मंतर को भरोसेमंद मंच मानते रहे हैं।
पहलवानों के धरने से NEET विवाद तक जारी रहा विरोध का सिलसिला
साल 2023 में जंतर-मंतर एक बार फिर बड़े विवाद का केंद्र बना, जब ओलंपिक पदक विजेताओं समेत कई पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ धरना दिया।
पहलवानों ने महिला खिलाड़ियों के यौन उत्पीड़न के आरोप लगाते हुए कार्रवाई और गिरफ्तारी की मांग की। इस प्रदर्शन ने खेल प्रशासन, महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा और न्याय प्रक्रिया को लेकर देशभर में बहस छेड़ दी।
इसके बाद साल 2024 में NEET-UG परीक्षा में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं के खिलाफ भी छात्रों ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग उठाई।
साल 2026 में NEET-UG पेपर लीक विवाद फिर चर्चा में आया। छात्रों और अन्य लोगों का आक्रोश जंतर-मंतर तक पहुंचा और इस मुद्दे पर केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ा। इसी दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी उठी।
विरोध स्थल की सूची से हटने के बाद क्यों छिड़ी नई बहस?
दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर को निर्धारित विरोध स्थल की सूची से हटाने के फैसले ने एक नई बहस शुरू कर दी है। कई लोगों का मानना है कि इस फैसले से नागरिकों के लिए अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखने के विकल्प सीमित हो सकते हैं।
अन्ना हजारे आंदोलन से जुड़ी रहीं रानी शर्मा ने कहा कि जंतर-मंतर की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यह सत्ता के प्रमुख केंद्रों के करीब है। ऐसे में यहां प्रदर्शन करने वाले लोगों को उम्मीद रहती है कि उनकी आवाज उन संस्थानों तक पहुंचेगी, जिनसे वे जवाब चाहते हैं।
उनके मुताबिक, जंतर-मंतर को निर्धारित विरोध स्थल की सूची से हटाना शांतिपूर्ण विरोध की परंपरा और असहमति दर्ज कराने के अधिकार को लेकर सवाल खड़े करता है।
सिर्फ प्रदर्शन की जगह नहीं, उम्मीदों का प्रतीक है जंतर-मंतर
जंतर-मंतर की पहचान सिर्फ बड़े आंदोलनों से नहीं बनी है। समय-समय पर देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपनी शिकायतें और मांगें लेकर यहां पहुंचते रहे हैं।
कई लोगों के लिए यह जगह ऐसी उम्मीद रही है, जहां वे अपनी अनसुनी आवाज को सामने रख सकते हैं। यहां जुटने वाली भीड़ भले ही हर बार अलग रही हो, लेकिन लोकतंत्र में जनता की भागीदारी और जवाबदेही की मांग के प्रतीक के रूप में जंतर-मंतर की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है।