आज के डिजिटल दौर में बच्चों से लेकर बड़ों तक के हाथ में स्मार्टफोन आम बात हो गई है। ऑनलाइन गेमिंग के बढ़ते क्रेज में बच्चे इस कदर डूब चुके हैं कि टास्क पूरे करने का दबाव उनकी मानसिक स्थिति पर भारी पड़ने लगा है। कई मामलों में यह लत इस हद तक खतरनाक हो जाती है कि बच्चों का व्यवहार असामान्य होने लगता है। ऐसे में पेरेंट्स के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि ई-गेमिंग बच्चों के स्वास्थ्य को किस तरह खोखला कर रही है और इससे कैसे निपटा जाए।
वर्चुअल दुनिया का जाल और खतरनाक मामले
आज की युवा पीढ़ी और छोटे बच्चों में घंटों ऑनलाइन गेम खेलने की आदत आम हो गई है। इससे शारीरिक समस्याएं जैसे खराब पोस्चर और मसल्स पेन तो होते ही हैं, साथ ही बच्चे वर्चुअल दुनिया में पूरी तरह खो जाते हैं। नोएडा एक्सटेंशन के यथार्थ सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. सारस प्रसाद ने एक हैरान करने वाला मामला साझा किया।
उन्होंने बताया कि उनके पास 13 साल का एक ऐसा बच्चा आया जो रोजाना 10 से 12 घंटे गेम खेलता था। धीरे-धीरे उसने लोगों से मिलना-जुलना बंद कर दिया और उसे यह वहम होने लगा कि दूसरे लोग उसे नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। हालत ज्यादा बिगड़ने पर उसे अस्पताल में भर्ती कर दवाओं और काउंसलिंग के जरिए ठीक करना पड़ा।
कैसे करें बच्चों को हैंडल
एक्सपर्ट्स का मानना है कि बच्चों को सिर्फ गेम खेलने से रोकने या डांटने से वे आक्रामक हो सकते हैं। माता-पिता को चाहिए कि वे गुस्से की बजाय प्यार से बात करें और समझें कि बच्चा गेम में इतना वक्त क्यों बिता रहा है।
- बच्चों के डेली रूटीन पर खास नजर रखें।
- उन्हें स्क्रीन से दूर रखने के लिए खेलकूद और दूसरी फिजिकल एक्टिविटीज के लिए प्रेरित करें।
- जब बच्चे का मन दूसरी रचनात्मक चीजों में लगेगा, तो वह खुद-ब-खुद स्क्रीन की तरफ कम आकर्षित होगा।
कब लें डॉक्टर की सलाह?
यदि आपको बच्चे के व्यवहार में लगातार बदलाव दिखने लगे—जैसे वह अचानक बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा होने लगा हो, अकेले रहना पसंद करता हो या छोटी-छोटी बातों पर आक्रामक हो जाता हो—तो तुरंत किसी विशेषज्ञ या साइकियाट्रिस्ट की मदद लें। सही समय पर मिला सही मार्गदर्शन और इलाज आपके बच्चे को एक सामान्य और खुशहाल जिंदगी में वापस लौटने में मदद कर सकता है।
ऑनलाइन गेमिंग का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल बच्चों की शारीरिक और मानसिक सेहत पर असर डाल सकता है। ऐसे में माता-पिता को बच्चों की स्क्रीन टाइम पर नजर रखने के साथ उनके व्यवहार में होने वाले बदलावों को भी समझना चाहिए। उन्हें डांटने के बजाय प्यार से बात करें, खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करें। यदि बच्चा लगातार अकेला रहने लगे, ज्यादा चिड़चिड़ा हो या उसके व्यवहार में असामान्य बदलाव दिखें, तो विशेषज्ञ से सलाह लें। समय पर सही मार्गदर्शन और सहयोग बच्चों को स्वस्थ डिजिटल आदतें अपनाने में मदद कर सकता है।