उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर सियासी बिसात तेजी से बिछ रही है। बीजेपी, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी जहां अपने-अपने संगठन को मजबूत करने में जुटी हैं, वहीं आरएलडी, सुभासपा और निषाद पार्टी जैसे क्षेत्रीय दल भी गठबंधन में अपनी ताकत और हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
इन छोटे दलों की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती यही है कि उनके पास बड़े दलों जैसी मजबूत संगठनात्मक मशीनरी और हर सीट पर मजबूत उम्मीदवारों का नेटवर्क नहीं है। ऐसे में गठबंधन के दौरान ज्यादा सीटों की मांग और उन सीटों पर मजबूत प्रत्याशी उतारना इनके लिए सबसे अहम मुद्दा बन जाता है।
‘सिंबल आपका, नेता हमारा’ क्यों बन रहा है चर्चा का विषय?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन के दौरान एक ऐसा फॉर्मूला चर्चा में रहा है, जिसमें सीट और चुनाव चिह्न छोटे दल के पास रहता है, लेकिन उम्मीदवार बड़े दल की पसंद का होता है।
इसका मकसद दोनों पक्षों के लिए अलग-अलग हो सकता है। बड़े दल को अपने भरोसेमंद नेता को चुनाव लड़ाने का मौका मिलता है, जबकि छोटे दल को ज्यादा सीटों पर अपना चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने और विधानसभा में अपनी संख्या बढ़ाने का अवसर मिल जाता है।
लेकिन चुनाव के बाद यही फॉर्मूला छोटे दलों के लिए राजनीतिक चुनौती भी बन सकता है।
83 सीटों की मांग कर रहे ओपी राजभर
2027 के चुनाव को लेकर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी यानी सुभासपा के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर लगातार अपनी राजनीतिक ताकत के मुताबिक ज्यादा सीटों की दावेदारी की बात कर रहे हैं।
राजभर की ओर से गठबंधन में 83 सीटों की मांग का दावा सामने आया है। वहीं आरएलडी की ओर से भी पिछली बार के मुकाबले ज्यादा सीटों की मांग की चर्चा है।
निषाद पार्टी भी पिछली बार के मुकाबले ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है। पार्टी अध्यक्ष संजय निषाद का कहना है कि बीजेपी के साथ सीट बंटवारे पर अभी औपचारिक बातचीत नहीं हुई है, लेकिन पार्टी को पिछली बार से ज्यादा सीटें चाहिए।
निषाद पार्टी के सामने अपने विधायकों का सवाल
निषाद पार्टी के पास मौजूदा विधानसभा में छह विधायक होने का दावा किया जाता है। लेकिन पार्टी के भीतर विधायकों की राजनीतिक गतिविधियों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
दूसरी तरफ, अगर गठबंधन के लिहाज से देखें तो बीजेपी और निषाद पार्टी के बीच राजनीतिक साझेदारी पहले से मौजूद है। ऐसे में सीट शेयरिंग में निषाद पार्टी अपनी राजनीतिक पकड़ को ज्यादा सीटों में बदलने की कोशिश कर रही है।
सुभासपा में भी सामने आई ऐसी ही चुनौती
सुभासपा को लेकर भी यही सवाल उठता है। पार्टी के छह विधायकों में से कुछ के समाजवादी पार्टी के करीब दिखाई देने के दावे सामने आते रहे हैं।
यही वजह है कि छोटी पार्टियों के सामने सिर्फ ज्यादा सीटें हासिल करने की चुनौती नहीं है, बल्कि चुनाव के बाद अपने विधायकों को एकजुट रखने की भी चुनौती है।
बिहार का VIP मॉडल क्यों महत्वपूर्ण है?
इस बहस को समझने के लिए बिहार की विकासशील इंसान पार्टी यानी VIP का उदाहरण भी दिया जाता है।
मुकेश सहनी की पार्टी के विधायक चुनाव के दौरान उसके चुनाव चिह्न पर जीते थे, लेकिन बाद में पार्टी के सभी विधायक बीजेपी में चले गए थे। इससे यह सवाल उठा कि गठबंधन में बड़े दलों के प्रभावशाली नेताओं को छोटे दलों के चुनाव चिह्न पर उतारने की रणनीति आखिर किसके लिए ज्यादा फायदेमंद होती है।
बड़ी पार्टियों के लिए क्यों फायदेमंद है यह फॉर्मूला?
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, गठबंधन में छोटी पार्टियों को साथ रखने के पीछे सामाजिक समीकरण और वोट ट्रांसफर की राजनीति भी अहम होती है।
बड़ा दल छोटे सहयोगी को सीटें देकर उसके सामाजिक आधार को अपने गठबंधन में बनाए रखना चाहता है। वहीं छोटा दल ज्यादा सीटों पर अपना सिंबल इस्तेमाल करके विधानसभा में अपनी संख्या बढ़ाने की कोशिश करता है।
यही वजह है कि सीट शेयरिंग की बातचीत में अक्सर “कितनी सीटें?” के साथ-साथ “किसका उम्मीदवार?” और “किसके सिंबल पर?” जैसे सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
कांग्रेस की चुनौती भी अलग नहीं
कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पार्टी है, लेकिन उत्तर प्रदेश में उसका संगठन लंबे समय से कमजोर माना जाता रहा है। ऐसे में समाजवादी पार्टी के साथ संभावित सीट बंटवारे में कांग्रेस ज्यादा सीटों की दावेदारी करती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती उन सीटों पर मजबूत उम्मीदवार खड़े करने की होगी।
यहीं पर ‘सिंबल आपका, नेता हमारा’ जैसा फॉर्मूला कांग्रेस के लिए भी राजनीतिक तौर पर चर्चा का विषय बन सकता है।
2027 में असली खेल सीटों का नहीं, उम्मीदवारों का होगा?
उत्तर प्रदेश में 2027 की लड़ाई जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, गठबंधन की तस्वीर भी साफ होती जाएगी।
छोटी पार्टियां ज्यादा सीटें मांग रही हैं, बड़े दल अपने राजनीतिक समीकरण साध रहे हैं और सबसे बड़ा सवाल यही है कि गठबंधन में मिलने वाली सीटों पर आखिर उम्मीदवार किसका होगा।
क्योंकि चुनाव में सिर्फ सीटों की संख्या मायने नहीं रखती—उम्मीदवार, संगठन, चुनाव चिह्न और चुनाव के बाद विधायकों को साथ रखने की क्षमता भी सत्ता के समीकरण तय करती है।
यही वजह है कि यूपी चुनाव 2027 में असली मुकाबला सिर्फ “कौन कितनी सीटें पाएगा?” का नहीं, बल्कि “किस सीट पर किसके चेहरे को किस सिंबल से मैदान में उतारा जाएगा?” का भी होगा।