नई दिल्ली/रियाद। अरब देशों के सामने जलवायु परिवर्तन का खतरा अब सिर्फ बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं है। पानी की लगातार कम होती उपलब्धता, खेती पर बढ़ता दबाव और खाद्य पदार्थों की महंगाई ने इस पूरे क्षेत्र के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते तैयारी नहीं की गई तो आने वाले वर्षों में पानी और भोजन की सुरक्षा दोनों गंभीर संकट में फंस सकती हैं।
अरब क्षेत्र दुनिया के सबसे अधिक जल-संकट वाले इलाकों में शामिल है। यहां प्रति व्यक्ति मीठे पानी की उपलब्धता वैश्विक औसत की तुलना में बेहद कम है। इसके साथ ही पूरे क्षेत्र में खेती योग्य जमीन भी 5 प्रतिशत से कम है। बढ़ते तापमान और रेगिस्तान के विस्तार ने स्थिति को और मुश्किल बना दिया है।
पानी की कमी का सबसे बड़ा असर खेती पर
अरब देशों में उपलब्ध मीठे पानी का बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल होता है। ऐसे में पानी की उपलब्धता कम होने का सीधा असर किसानों और खाद्य उत्पादन पर पड़ता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे और गर्मी की घटनाएं बढ़ने से फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। इसका असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य पदार्थों की कीमतों और आम लोगों की भोजन तक पहुंच पर भी पड़ेगा।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के GCC देशों के कोऑर्डिनेटर अहमद मुख्तार के मुताबिक अरब क्षेत्र में पानी की कमी पहले से ही गंभीर है और जलवायु परिवर्तन इस चुनौती को और बढ़ा रहा है।
खाने के लिए दूसरे देशों पर बढ़ेगी निर्भरता
अरब देशों की एक बड़ी समस्या यह भी है कि क्षेत्र के कई देश अपनी खाद्य जरूरतों के लिए आयात पर काफी निर्भर हैं।
FAO के अनुमान के अनुसार 2031 तक अरब क्षेत्र में कुल खाद्य खपत का करीब दो-तिहाई हिस्सा आयात के जरिए पूरा हो सकता है। वहीं कुछ खाड़ी देश अपनी खाद्य जरूरतों का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात से पूरा करते हैं।
यानी अगर जलवायु परिवर्तन के कारण उन देशों में भी फसल उत्पादन प्रभावित होता है, जहां से अरब देश खाद्य पदार्थ खरीदते हैं, तो इसका सीधा असर सप्लाई और कीमतों पर पड़ सकता है।
जलवायु संकट से महंगा हो सकता है खाना
विशेषज्ञों के मुताबिक जलवायु से जुड़े झटके दुनिया के बड़े खाद्य उत्पादक देशों को प्रभावित कर सकते हैं। अगर किसी बड़े कृषि उत्पादक देश में सूखा, अत्यधिक गर्मी या अन्य मौसम संबंधी घटनाओं के कारण उत्पादन घटता है, तो वैश्विक बाजार में खाद्य पदार्थों की सप्लाई कम हो सकती है।
इसका परिणाम कीमतों में बढ़ोतरी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुकावट के रूप में सामने आ सकता है।
विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) की क्षेत्रीय निदेशक समर अब्देलजाबेर ने बताया कि जलवायु संबंधी झटकों की वजह से फसल उत्पादन और लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है। खाद्य पदार्थ महंगे होने से कमजोर परिवारों के लिए पौष्टिक भोजन हासिल करना और मुश्किल हो सकता है। संघर्ष प्रभावित इलाकों में इसका असर और गंभीर हो सकता है।
सूखा बढ़ा तो खेती और पशुपालन दोनों प्रभावित
जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा खतरा सूखे के रूप में सामने आ सकता है। लंबे समय तक बारिश नहीं होने पर खेती का उत्पादन घट सकता है। पानी की कमी से पशुपालन भी प्रभावित हो सकता है और मवेशियों की मौत तक की स्थिति पैदा हो सकती है।
UNICEF के WASH मामलों के वरिष्ठ सलाहकार उमर अल-हत्ताब के मुताबिक ऐसे संकटों से निपटने के लिए पहले से जरूरी सामान की व्यवस्था, समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणाली और स्थानीय स्तर पर आपदा से निपटने की क्षमता मजबूत करना जरूरी है।
क्या अरब देश खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर हो सकते हैं?
पानी की कमी के बीच अरब देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे खाद्य सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करें। विशेषज्ञों का मानना है कि पूरी तरह खाद्य आत्मनिर्भरता हासिल करना हर देश के लिए व्यावहारिक विकल्प नहीं हो सकता।
इसके बजाय बेहतर जल प्रबंधन, जलवायु-अनुकूल खेती, खराब हो चुकी जमीन की बहाली और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने पर जोर देना होगा।
तकनीक से निकल सकता है रास्ता
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए आज तकनीक और कई व्यावहारिक समाधान उपलब्ध हैं।
बेहतर सिंचाई व्यवस्था, पानी की बचत, सूखे की शुरुआती चेतावनी, जल संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन और मौसम के अनुरूप खेती जैसे कदम अरब देशों को आने वाले संकट से बचाने में मदद कर सकते हैं।
यानी अरब देशों के सामने चुनौती सिर्फ पानी बचाने की नहीं, बल्कि पानी के साथ-साथ खेती, खाद्य आपूर्ति और आम लोगों की आजीविका को सुरक्षित रखने की है। समय रहते तैयारी की गई तो जलवायु परिवर्तन के असर को कम किया जा सकता है, लेकिन लापरवाही की स्थिति में पानी की कमी से शुरू हुआ संकट खाद्य सुरक्षा और मानवीय संकट का रूप ले सकता है।