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ट्रम्प ने यूक्रेन को ‘ 28 सूत्री शांति योजना’ थमाकर चौंकाया ! यूरोप ने कहा—ये ‘शांति’ नहीं, सरेंडर प्लान है

news desk
Last updated: November 22, 2025 3:54 pm
news desk
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ट्रंप 28 सूत्री शांति योजना विवाद
ट्रंप 28 सूत्री शांति योजना विवाद
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अमेरिका और यूरोप में इन दिनों सबसे गर्म बहस जिस चीज़ पर हो रही है, वह है डोनाल्ड ट्रंप की 21 नवंबर 2025 को जारी की गई 28-सूत्री “शांति योजना”—जो कागज़ पर तो रूस-यूक्रेन युद्ध का समाधान बताती है, लेकिन दुनिया के ज्यादातर विशेषज्ञ इसे “शांति योजना” नहीं, बल्कि “यूक्रेन से सरेंडर की डील” बता रहे हैं.

विश्लेषकों और यूरोपीय नेताओं का कहना है कि यह पूरी स्कीम रूस के हितों पर टिकी हुई है और यूक्रेन की संप्रभुता, लोकतंत्र और ज़मीन—तीनों को दांव पर लगा देती है. कई शोध ये भी दिखाते हैं कि यह प्लान अमेरिका-रूस की बैकडोर डील और ट्रंप की “नोबेल प्राइज पाने की इच्छा” से प्रेरित लगती है. इसलिए सवाल उठना लाज़मी है.

क्या ट्रंप सच में यूक्रेन को धोखा दे रहे हैं?

ट्रंप की योजना में यूक्रेन को क्रीमिया, लुहांस्क और डोनेट्स्क को रूस को सौंपना होगा, खेरसॉन और ज़ापोरिज्जिया की युद्धविराम लाइन को स्थायी मानना होगा, अपनी सेना एक-तिहाई तक घटानी होगी, संविधान में लिखना होगा कि वह कभी नाटो में नहीं जाएगा और 100 दिनों के अंदर चुनाव भी कराने होंगे.

इसके बदले क्या मिलता है? रूस पर लगे प्रतिबंध हटाने, G8 में पुतिन की वापसी, और फ्रोज़न रूसी संपत्तियों से मिलने वाले रिकंस्ट्रक्शन फंड का वादा—जिसमें से 50 % अमेरिका खुद रखेगा.


ट्रंप ने अल्टीमेटम देते हुए कहा है, 27 नवंबर तक यूक्रेन मान इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दे, नहीं तो हथियार और खुफिया मदद बंद कर दी जाएगी. कहना गलत नहीं होगा कि कीव में इसे ‘शांति’ से ज़्यादा ‘अपमान’ के रूप में देखा गया.
ज़ेलेंस्की ने इसे साफ-साफ “संप्रभुता का विश्वासघात” कहा और फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के साथ मिलकर एक नया वैकल्पिक प्रस्ताव तैयार कर रहे हैं—जो यूरोप इस समय ट्रंप की प्लान का सीधा विकल्प मान रहा है.
इसी के साथ एक और बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ—क्या ट्रंप पुतिन के इन्फ्लुएंस में हैं?
Politico की रिपोर्ट कहती है कि यह पूरी योजना रूस के करीबी कारोबारी किरिल दिमित्रीव और ट्रंप के करीबी स्टीव विटकॉफ की बातचीत के बाद तैयार हुई. रॉयटर्स के मुताबिक पुतिन ने खुद कहा—“यह शांति योजना का बेस बन सकती है.” यानी रूस को यह सबसे ज्यादा पसंद आ रही है.

अमेरिका और नाटो का हित कहाँ गया?

ट्रंप प्रशासन कहता है कि यह दोनों देशों के लिए ‘अच्छी डील’ है, लेकिन सच्चाई इसकी उलट तस्वीर दिखाती है. यह प्लान यूक्रेन को कमज़ोर करता है, रूस को मजबूत, और नाटो को साइडलाइन कर देता है—जो अमेरिका के लिए भी लंबे समय में अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है.
फ्रांस के मैक्रॉन, ब्रिटेन के स्टार्मर, और जर्मनी के मर्ज़—तीनों ने इसे खुलेआम खारिज कर दिया. युद्ध के बाद पहली बार यूरोप और अमेरिका के बीच इतना बड़ा मतभेद दिखाई दिया है।
सबसे विवादित पॉइंट यह है कि फ्रोज़न रूसी संपत्तियों से मिलने वाले फंड का 50% हिस्सा अमेरिका खुद लेगा—जो इस ‘शांति’ को सीधी “वसूली” जैसा दिखाता है. क्रिटिक्स कह रहे हैं कि इससे अमेरिका की नैतिक नेतृत्व क्षमता पर बुरा असर पड़ेगा.

क्या यह योजना रूस को और आक्रामक बनाएगी?

कई एक्सपर्ट्स इसे 1938 के म्यूनिख समझौते जैसा बता रहे हैं—जहां शांति के नाम पर एक छोटे देश को तानाशाह के हवाले कर दिया गया था, और परिणाम हुआ बड़ा युद्ध.
यूक्रेन की जनता भी इसे मंज़ूर करने के मूड में नहीं है. शोध दिखाते हैं कि 70% से ज्यादा यूक्रेनियन किसी भी ऐसी डील को मानने को तैयार नहीं, जिसमें रूस की शर्तें चल रही हों.
ज़ेलेंस्की का इसे रिजेक्ट करना इसलिए भी ज़रूरी था—यह ‘शांति’ नहीं, बल्कि ‘अधीनता’ की शुरुआत होती.

ट्रंप की 28-सूत्री योजना एक नज़र में भले “युद्ध खत्म करने” की कोशिश लगती हो, लेकिन असल में यह रूस को फायदा पहुंचाती है. यूक्रेन को कमजोर करती है, नाटो को पीछे धकेलती है और अमेरिका के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों को भी चोट पहुँचाती है. शांति वही होती है जो किसी देश की संप्रभुता और सम्मान को बचाए—न कि उसे समझौते के नाम पर गिरवी रख दे.

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