नई दिल्ली: मिडिल-ईस्ट में 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल की ईरान पर संयुक्त एयरस्ट्राइक के बाद शुरू हुआ तनाव अब एक नए मोर्चे पर पहुंच गया है। ईरान और अमेरिका के बीच टकराव के बीच यमन में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच संघर्ष तेज हो रहा है। इस टकराव का असर सिर्फ यमन और सऊदी अरब तक सीमित नहीं है, बल्कि समुद्री व्यापार के अहम रास्तों पर भी खतरा बढ़ गया है।
ईरान के स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद रखने के बीच अब बाब अल-मन्दब जलडमरूमध्य में हूतियों का नियंत्रण बढ़ने की बात सामने आई है। यह समुद्री रास्ता हिंद महासागर को लाल सागर और आगे स्वेज नहर से जोड़ता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि ईरान-अमेरिका के बीच शुरू हुआ संघर्ष यमन और सऊदी अरब तक कैसे पहुंचा और इसमें हूती विद्रोहियों की भूमिका क्या है?
यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से तनाव रहा है। लेकिन बीते 3 जुलाई को सना एयरपोर्ट पर हुई एक घटना ने हालात को और बिगाड़ दिया। ईरान से आ रहे हूती प्रतिनिधिमंडल के विमान को निशाना बनाया गया था।
यह हमला यमन की सऊदी अरब समर्थित सरकार ने किया था। सरकार का आरोप था कि विमान ने यमन की संप्रभुता का उल्लंघन किया। यमनी सरकार पहले भी आरोप लगाती रही है कि ऐसे विमानों के जरिए ईरान हूतियों तक हथियार पहुंचाता है।
विमान पर हमले के बाद हूती विद्रोहियों ने तीखी प्रतिक्रिया दी और ‘आंख के बदले आंख’ की चेतावनी दी। हूती प्रवक्ता याह्या सरी ने कहा था कि इस हमले से यमन में तनाव कम करने का दौर खत्म हो गया है।
सना एयरपोर्ट की घटना के बाद हूतियों ने ऐलान किया कि जिस तरह उनके विमान को रोका और निशाना बनाया गया, उसी तरह वे सऊदी अरब के रास्तों को भी बाधित करेंगे।
उन्होंने सऊदी अरब के जहाजों और उड़ानों को निशाना बनाने की चेतावनी दी। इसके बाद हूतियों ने सऊदी अरब के जहाजों और अलग-अलग शहरों पर हमले किए। साथ ही यमन के भीतर भी जमीनी लड़ाई तेज हो गई।
संघर्ष के दौरान हूती विद्रोहियों ने यमन में रणनीतिक रूप से अहम मोखा पोर्ट सिटी को यमनी सरकार से छीन लिया। इसके अलावा बाब अल-मन्दब जलडमरूमध्य में मौजूद कई द्वीपों पर भी उनका कब्जा होने की बात कही गई है। इनमें मयून द्वीप भी शामिल है।
बाब अल-मन्दब समुद्री व्यापार के लिहाज से अहम रास्ता है। यहां हूतियों का प्रभाव बढ़ने से लाल सागर और स्वेज नहर के जरिए होने वाले समुद्री आवागमन पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
सऊदी अरब सुन्नी बहुल देश है, जबकि हूती आंदोलन शिया इस्लाम की जैदी शाखा से जुड़ा है। दोनों के बीच मतभेदों की जड़ें धार्मिक पहचान के साथ-साथ क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा से भी जुड़ी हैं।
हूतियों को ईरान से सैन्य और आर्थिक समर्थन मिलता है। वहीं ईरान और सऊदी अरब लंबे समय से मिडिल-ईस्ट में क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने के लिए प्रतिस्पर्धा करते रहे हैं। इसी वजह से यमन दोनों देशों के बीच परोक्ष संघर्ष का अहम मैदान बन गया।
साल 2014 में हूती विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था और अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था। सऊदी अरब अपनी दक्षिणी सीमा के पास हूतियों की बढ़ती ताकत को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता है।
हूती आंदोलन की शुरुआत 1990 के दशक में शिया धर्मगुरु हुसैन बदरुद्दीन अल-हूती ने की थी। इसी वजह से इस समूह को हूती कहा जाता है।
शुरुआत में यह आंदोलन यमन की सरकार में कथित भ्रष्टाचार और अमेरिका-इजरायल के साथ उसके करीबी संबंधों के विरोध में उभरा था। समय के साथ हूती एक सशस्त्र राजनीतिक ताकत के रूप में सामने आए।
2014-2015 में हूतियों ने राजधानी सना समेत यमन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। इसके बाद देश में गृहयुद्ध और गहरा गया। मौजूदा संघर्ष में सऊदी अरब और हूतियों के बीच टकराव इसी लंबे राजनीतिक, सैन्य और क्षेत्रीय विवाद की अगली कड़ी है।
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