नई दिल्ली: मृत्यु के बाद इंसान के साथ क्या होता है? क्या शरीर छूट जाने के बाद भी भूख-प्यास का अनुभव होता है? हिंदू धर्म में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसी परंपराएं इन्हीं सवालों से जुड़ी मानी जाती हैं। गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु और गरुड़ के संवाद के जरिए मृत्यु के बाद की यात्रा और पितृ कर्मों से जुड़ी कई बातें बताई गई हैं। इसी में पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण के पीछे की वजह भी बताई गई है।
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद जीव शरीर छोड़कर यममार्ग की कठिन यात्रा पर निकलता है। इस दौरान उसे भूख-प्यास लगती है और इस यात्रा को पूरा करने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है। मान्यता के अनुसार, यह ऊर्जा परिजनों की ओर से किए गए पिंडदान से मिलती है। यही वजह है कि मृत्यु के बाद शुरुआती दिनों में किए जाने वाले पिंडदान और अन्य अनुष्ठानों को महत्वपूर्ण माना गया है।
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद जीव को यमलोक तक की कठिन यात्रा करनी होती है। इस यात्रा के दौरान लगने वाली भूख-प्यास को शांत करने और आगे बढ़ने के लिए पिंडदान को महत्वपूर्ण बताया गया है।
मृत्यु के बाद 10 दिनों तक दिए जाने वाले पिंड आत्मा को यमलोक तक की यात्रा के लिए शक्ति प्रदान करते हैं, ऐसी मान्यता गरुड़ पुराण में बताई गई है। इसी कारण मृत्यु के बाद 13 दिनों तक परिजनों की ओर से अलग-अलग अनुष्ठान किए जाते हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार, 13वीं के बाद भी पितृलोक पहुंचे पितरों को तृप्ति की आवश्यकता होती है। इसलिए पितृ पक्ष के दौरान भी परिजन अपने पूर्वजों के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करते हैं।
मान्यता के अनुसार, इन अनुष्ठानों का उद्देश्य पितरों की आत्मा की शांति के साथ उनका ऋण चुकाना और उनकी आगे की यात्रा को आसान बनाना है। इसी वजह से पितृ पक्ष में पूर्वजों के लिए किए जाने वाले कर्मकांड को विशेष महत्व दिया जाता है।
‘श्राद्ध’ शब्द ‘श्रद्धा’ से बना है। इसका अर्थ पूर्वजों के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करना माना जाता है। गरुड़ पुराण में दिए गए वर्णन के अनुसार, श्राद्ध के जरिए पितरों के लिए निकाला गया भोजन या अन्न सूक्ष्म रूप में पूर्वजों को पूरे साल तृप्त करता रहता है।
मान्यता है कि इससे प्रसन्न होकर पितर परिवार को सुख, शांति, समृद्धि और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
तर्पण भी पितरों की तृप्ति के लिए किया जाने वाला कर्म माना जाता है। इसमें कुश, काले तिल और जौ को हाथों में लेकर पितरों के नाम से जल अर्पित किया जाता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार, इस तरह अर्पित किया गया जल पितरों की प्यास बुझाता है। इसी मान्यता के चलते पितृ पक्ष के दौरान तर्पण को महत्वपूर्ण माना जाता है।
पिंडदान आत्मा की मोक्ष प्राप्ति या उसकी आगे की यात्रा को आसान बनाने के उद्देश्य से किया जाता है। गया, हरिद्वार और प्रयाग जैसे तीर्थों पर जाकर पिंडदान करने की परंपरा भी बताई गई है।
मान्यता के अनुसार, पिंडदान का उद्देश्य मृत आत्मा को भौतिक बंधनों और मोह से मुक्त कराना है। कई जगहों पर यह भी मान्यता है कि जिस पूर्वज या मृतक का पिंडदान हो जाता है, उसके लिए दोबारा श्राद्ध और तर्पण करने की आवश्यकता नहीं रहती।
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