वॉशिंगटन: ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच महीनों से जारी तनाव के बीच एक अहम समझौता सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि इस समझौते से अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा से जुड़े मामलों में स्थायी भूमिका मिलेगी और चीन-रूस समेत अमेरिकी विरोधी देशों को वहां सैन्य मौजूदगी बनाने से रोका जा सकेगा। हालांकि, डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने साफ किया है कि समझौता उनकी संप्रभुता और ग्रीनलैंड के आत्मनिर्णय के अधिकार को प्रभावित नहीं करता।
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर कहा कि उनके निर्देश पर अमेरिका ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया है कि अमेरिका के पास ग्रीनलैंड और अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने की क्षमता हमेशा बनी रहे। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी विरोधी देश बिना अमेरिकी मंजूरी के ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डा या सैन्य मौजूदगी नहीं बना सकेंगे।
ट्रंप के मुताबिक, इस समझौते के तहत अमेरिका ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर लंबे समय तक अपनी भूमिका बनाए रख सकेगा। साथ ही ग्रीनलैंड के संवेदनशील क्षेत्रों में ऐसे निवेश पर रोक लगाने की बात कही गई है, जिन्हें अमेरिका अपनी सुरक्षा के लिए जोखिम मानता है।
ट्रंप ने यह भी कहा है कि समझौते के तहत अमेरिका ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की योजना पर काम शुरू करेगा। हालांकि, समझौते का आधिकारिक पूरा टेक्स्ट अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है और इसके कई विवरण स्पष्ट होना बाकी हैं।
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप और डेनमार्क के बीच लंबे समय से तनाव रहा है। ट्रंप पहले भी ग्रीनलैंड को अमेरिका के नियंत्रण में लेने या खरीदने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं। साल 2019 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी उन्होंने ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन डेनमार्क ने इसे खारिज करते हुए कहा था कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है।
नए समझौते को लेकर डेनमार्क और ग्रीनलैंड की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि इससे क्षेत्र की संप्रभुता या ग्रीनलैंड के आत्मनिर्णय के अधिकार में कोई बदलाव नहीं होगा। समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर के बाद इसे संबंधित संसदीय प्रक्रियाओं से भी गुजरना होगा।
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और उत्तरी अमेरिका तथा आर्कटिक क्षेत्र के बीच इसकी भौगोलिक स्थिति रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। अमेरिका के पास पहले से ही ग्रीनलैंड में पिटुफिक स्पेस बेस मौजूद है।
1951 के रक्षा समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकाने और अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखने के व्यापक अधिकार मिले थे। बाद में इस व्यवस्था में बदलाव भी किए गए। नए समझौते का एक प्रमुख पहलू अमेरिका की सैन्य मौजूदगी को भविष्य के लिए और मजबूत करना बताया जा रहा है।
आर्कटिक क्षेत्र में चीन और रूस की गतिविधियां अमेरिका के लिए रणनीतिक चिंता का विषय रही हैं। ऐसे में वॉशिंगटन चाहता है कि ग्रीनलैंड में अमेरिकी विरोधी देशों को सैन्य अड्डे बनाने या संवेदनशील बुनियादी ढांचे में पैर जमाने का मौका न मिले।
ट्रंप ने अपने बयान में कहा है कि कोई भी अमेरिकी विरोधी देश बिना अमेरिकी मंजूरी के ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डा या सैन्य मौजूदगी नहीं बना सकेगा और संवेदनशील निवेश भी नहीं कर सकेगा। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी कहा है कि समझौता ग्रीनलैंड को उत्तर अमेरिका के रणनीतिक रक्षा क्षेत्र का हिस्सा बनाए रखने और किसी विरोधी को वहां पैर जमाने से रोकने से जुड़ा है।
नहीं। सामने आई जानकारी के मुताबिक यह समझौता ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने या डेनमार्क से खरीदने का समझौता नहीं है। इसका केंद्र सुरक्षा, अमेरिकी सैन्य मौजूदगी और क्षेत्र में अन्य देशों की सैन्य या संवेदनशील गतिविधियों को सीमित करना है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने इस बात पर जोर दिया है कि समझौता उनकी संप्रभुता और ग्रीनलैंड के आत्मनिर्णय के अधिकार को बरकरार रखता है। इसलिए ट्रंप की ओर से बताए गए ‘स्थायी सुरक्षा नियंत्रण’ और डेनमार्क-ग्रीनलैंड की संप्रभुता संबंधी स्थिति के बीच अंतर को समझना जरूरी है।
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