Trending News

Super El Nino Alert: मानसून की विदाई के बीच ‘सुपर अल नीनो’ का खतरा, 180 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी

भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून की विदाई शुरू हो चुकी है, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों की नजर अब प्रशांत महासागर पर टिक गई है। 180 से ज्यादा वैज्ञानिकों और इकोलॉजिस्ट ने संभावित बेहद मजबूत अल नीनो को लेकर चेतावनी जारी की है। वैज्ञानिकों ने रिसर्च, निगरानी और प्राकृतिक तंत्रों की सुरक्षा के लिए अभी से तैयारी बढ़ाने की अपील की है।

विश्व मौसम संगठन यानी WMO ने भी सितंबर में कहा था कि अल नीनो पहले से स्थापित है और आने वाले महीनों में इसके और मजबूत होने की संभावना है। संगठन के मुताबिक इसके फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना करीब 100 फीसदी है। हालांकि किसी क्षेत्र पर इसका असर एक जैसा नहीं होगा और स्थानीय मौसम को दूसरे जलवायु कारक भी प्रभावित करेंगे।

मानसून की विदाई शुरू, बारिश में 15 फीसदी कमी

भारत में 19 सितंबर से दक्षिण-पश्चिम मानसून की विदाई शुरू हो गई है। IMD के मुताबिक मानसून पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों से पीछे हट चुका है।

इस बीच इस मानसून सीजन में 19 सितंबर तक देश में कुल बारिश सामान्य से करीब 15 फीसदी कम रही। यानी मानसून की वापसी ऐसे समय हो रही है जब देश पहले ही बारिश की कमी से जूझ रहा है।

यही वजह है कि मजबूत अल नीनो को लेकर वैज्ञानिकों की चेतावनी भारत के लिए खास महत्व रखती है।

क्या है अल नीनो और क्यों है चिंता?

अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के असामान्य रूप से बढ़ने से जुड़ी जलवायु घटना है। इसका असर सिर्फ प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश, तापमान और वायुमंडलीय गतिविधियों के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है।

WMO के मुताबिक मौजूदा अल नीनो आने वाले महीनों में बहुत मजबूत हो सकता है और इससे दुनिया के कई हिस्सों में अत्यधिक गर्मी, सूखा और बारिश के पैटर्न में बदलाव का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि किसी खास देश में प्रभाव कितना होगा, यह केवल अल नीनो की ताकत से तय नहीं होता।

भारत में किन चीजों पर पड़ सकता है असर?

वैज्ञानिकों की अपील में मजबूत अल नीनो से जुड़े संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई गई है। इनमें सूखा, अत्यधिक गर्मी और जंगलों में आग का बढ़ता खतरा शामिल है। ऐसे हालात खेती, जल संसाधनों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बारिश और तापमान में बड़ा बदलाव खेती के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। पहले से बारिश की कमी वाले क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता और फसलों पर दबाव बढ़ने की आशंका भी वैज्ञानिक निगरानी का विषय है।

जंगलों और समुद्री जीवन पर भी खतरा

मजबूत अल नीनो का असर जमीन के साथ समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ सकता है। समुद्र के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी से समुद्री गर्मी की घटनाएं बढ़ सकती हैं और कोरल रीफ तथा मछलियों की आबादी पर दबाव पड़ सकता है।

भारत के समुद्री क्षेत्र में भी अल नीनो और हिंद महासागर की बदलती परिस्थितियों पर नजर रखी जा रही है। भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र यानी INCOIS ने भी इस साल के अपने विशेष अल नीनो बुलेटिन में समुद्री गर्मी, कोरल रीफ और मत्स्य संसाधनों पर संभावित प्रभावों को लेकर निगरानी की जरूरत बताई थी।

प्रशांत के साथ हिंद महासागर पर भी नजर

भारत के लिए मामला सिर्फ प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक हिंद महासागर की स्थिति को भी लगातार मॉनिटर कर रहे हैं। Nature की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिक अल नीनो और इंडियन ओशन डाइपोल यानी IOD के संभावित संयुक्त प्रभावों पर भी नजर रख रहे हैं। दोनों जलवायु कारकों की परस्पर स्थिति क्षेत्रीय मौसम को प्रभावित कर सकती है।

यानी आने वाले महीनों में भारत के मौसम को समझने के लिए प्रशांत और हिंद महासागर दोनों की गतिविधियां अहम रहेंगी।

2027 की शुरुआत तक रह सकता है असर

WMO के सितंबर अपडेट के मुताबिक अल नीनो के फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना करीब 100 फीसदी है। संगठन ने कहा है कि यह घटना आने वाले महीनों में और मजबूत हो सकती है और साल के अंत के आसपास इसकी तीव्रता चरम पर पहुंच सकती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में निश्चित रूप से सूखा या भीषण गर्मी आएगी। WMO ने भी स्पष्ट किया है कि अल नीनो की ताकत अकेले किसी देश के मौसम पर प्रभाव की गंभीरता तय नहीं करती। स्थानीय और क्षेत्रीय जलवायु परिस्थितियां भी अहम भूमिका निभाती हैं।

वैज्ञानिकों की अपील- अभी से तैयारी जरूरी

180 से ज्यादा वैज्ञानिकों और इकोलॉजिस्ट की अपील का मुख्य जोर तैयारी और निगरानी पर है। वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक तंत्रों में होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड करने, संवेदनशील इलाकों की पहचान करने और पहले से मौजूद पर्यावरणीय दबाव को कम करने की जरूरत बताई है।

भारत में मानसून की वापसी शुरू हो चुकी है और बारिश का मौजूदा आंकड़ा भी सामान्य से नीचे है। ऐसे में आने वाले महीनों में तापमान, बारिश, समुद्री परिस्थितियों और प्राकृतिक तंत्रों में होने वाले बदलावों पर नजर रखना बेहद महत्वपूर्ण होगा।

news desk

Recent Posts

विटामिन लेने का सही वक्त कौन सा? B12 से D3 और कैल्शियम तक, कहीं गलत समय पर तो नहीं ले रहे ये सप्लीमेंट

नई दिल्ली: शरीर में विटामिन और मिनरल की कमी होने पर डॉक्टर जांच के बाद…

1 hour ago

परिवर्तिनी एकादशी पर क्यों खास है भगवान विष्णु का करवट बदलना? धन-संकट से जुड़े ये 5 उपाय माने जाते हैं शुभ

नई दिल्ली: भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इसे पद्मा…

1 hour ago

‘दायरा’ पर फिर भारी पड़ी ‘वाइब’, दूसरे दिन भी कुणाल खेमू की फिल्म ने मारी बाजी; जानें दोनों का कलेक्शन

मुंबई: बॉक्स ऑफिस पर कुणाल खेमू की ‘वाइब’ और करीना कपूर खान-पृथ्वीराज सुकुमारन की ‘दायरा’…

1 hour ago

ग्रीनलैंड पर ट्रंप का नया दांव, अमेरिका को मिला स्थायी सुरक्षा अधिकार? चीन-रूस को रोकने की क्यों बढ़ी तैयारी

वॉशिंगटन: ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच महीनों से जारी तनाव के बीच…

1 hour ago

मिडिल ईस्ट में बिगड़ सकते हैं हालात? अमेरिका ने जारी किया बड़ा सिक्योरिटी अलर्ट, नागरिकों को यात्रा से बचने की सलाह

नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिका ने अपने नागरिकों के…

1 hour ago