काठमांडू: नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ को पांच दिन बीत चुके हैं, लेकिन लापता लोगों की तलाश अभी भी जारी है। हजारों सुरक्षाकर्मी लगातार खोज और बचाव अभियान में जुटे हैं, तो दूसरी ओर परिवार वाले भी अपने स्तर पर अपनों को ढूंढने के लिए पहाड़ी घाटियों, गांवों, राहत शिविरों और अस्पतालों के चक्कर लगा रहे हैं। हर गुजरता दिन उनके लिए उम्मीद और डर के बीच बीत रहा है।
43 वर्षीय लेखनाथ अधिकारी अपने चाचा की बाइक लेकर सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय कर चुके हैं। वह बेत्रावती गांव के आसपास और नदी के बहाव की दिशा में मौजूद लगभग हर राहत एवं खोज शिविर, अस्पताल और इलाके में जा रहे हैं। बेत्रावती काठमांडू के उत्तर में नुवाकोट जिले में स्थित है और रसुवा जिले की सीमा के करीब है। सामान्य दिनों में यहां पहुंचने में करीब दो घंटे लगते हैं, लेकिन बाढ़ के बाद यह सफर करीब चार घंटे का हो गया है।
बुधवार को भोटेकोशी नदी में अचानक आई बाढ़ ने बेत्रावती को अपनी चपेट में ले लिया। लेखनाथ अधिकारी की पत्नी, बेटा और बेटी किसी तरह उफनते पानी से बचकर ऊंची जगह पर पहुंच गए, लेकिन उनके बुजुर्ग माता-पिता पानी के तेज बहाव से नहीं बच सके।
अधिकारी की तरह हजारों लोग हिमालय की खड़ी घाटियों और आसपास के गांवों में अपने परिजनों का सुराग तलाश रहे हैं। किसी को जिंदा मिलने की उम्मीद है तो कोई कम से कम शव मिलने का इंतजार कर रहा है, ताकि अंतिम संस्कार किया जा सके।
कुछ दिन पहले गांव में एक इमारत की छत पर तीन शव मिलने की खबर फैली। यह सुनते ही अधिकारी की उम्मीद जगी। वह साइकिल और पैदल जंगल के रास्ते घटनास्थल तक पहुंचे, लेकिन वहां मिले शव उनके माता-पिता के नहीं थे।
सूर्यगढ़ी राहत शिविर में बैठे लेखनाथ अधिकारी की आंखें लाल थीं। उन्होंने कहा कि वह अपने माता-पिता के शव ढूंढना चाहते हैं, ताकि उनका अंतिम संस्कार कर सकें और उन्हें शांतिपूर्ण विदाई दे सकें।
उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों को काठमांडू में रिश्तेदारों के पास भेज दिया है। अधिकारी का कहना है कि वह इतनी जल्दी तलाश बंद नहीं करेंगे। वह कम से कम दो सप्ताह और अपने माता-पिता को खोजने की कोशिश करेंगे। अगर इसके बाद भी शव नहीं मिले तो वह अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू करेंगे।
नवीन तमांग जानते हैं कि समय बीतने के साथ उनकी पत्नी और दो बेटियों के मिलने की उम्मीद लगातार कम हो रही है। घाटी में भीषण गर्मी है और तापमान 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। इसके बावजूद वह तलाश रोक नहीं पा रहे हैं।
तमांग ने कहा कि उन्हें लगता है कि अब शायद वह अपनी पत्नी और दोनों बेटियों को कभी नहीं ढूंढ पाएंगे, लेकिन उनके मन का एक छोटा हिस्सा अभी भी यह मानने को तैयार नहीं है। उन्हें अब भी लगता है कि शायद वे जिंदा हों और कहीं फंसी हुई हों।
ताशबीर तमांग कंधे पर जरूरी सामान का एक छोटा थैला और हाथ में छड़ी लेकर खड़ी पहाड़ी ढलानों पर एक के बाद एक गांव जा रहे हैं। उनकी तलाश अपनी बहन और उनकी बेटियों मोनिका और मनीषा के लिए है।
उन्होंने बताया कि कुछ पड़ोसियों से उन्हें जानकारी मिली थी कि शायद वे बाढ़ से बच गई हों। इसके बाद वह अलग-अलग राहत शिविरों में गए और सेना के रजिस्टरों में उनकी जानकारी दर्ज कराई, लेकिन अभी तक कोई सुराग नहीं मिला है।
जब भी कहीं कोई शव मिलने की खबर आती है, ताशबीर मलबे की तरफ दौड़ पड़ते हैं। उनके पैरों पर लगी कीचड़ इस तलाश की मुश्किलों को बयां करती है। हर बार उनके मन में एक ही उम्मीद और डर होता है कि कहीं मिला शव उनके अपनों का तो नहीं।
इस त्रासदी के बीच कुछ परिवार ऐसे भी हैं जिन्होंने शव नहीं मिलने के बावजूद अपने प्रियजनों को मृत मानकर अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
उमरकोट के भैंसी बाजार में वासुदेव और अर्जुन प्याकुरियाल ने अपनी मां की तलाश के तीन दिन बाद अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू की। बाढ़ से बचने के लिए भागते समय वासुदेव ने अपनी मां का हाथ पकड़ रखा था, लेकिन अचानक उनका हाथ छूट गया और वह तेज पानी में बह गईं। तीन दिनों तक तलाश के बाद दोनों भाइयों ने इस भयावह सच्चाई को स्वीकार करने का फैसला किया।
मक्के की फसल के बीच खेत के पश्चिमी हिस्से में एक पुराने साल के पेड़ के नीचे दोनों भाइयों ने ‘क्रिया कुटी’ बनाई है। पारंपरिक 13 दिनों की अंत्येष्टि प्रक्रिया के दौरान यह शोक मनाने वालों के लिए पवित्र और एकांत स्थान होता है। सफेद कपड़ों में ढके दोनों भाई कर्म, जीवन और शोक पर बात करते हुए इस त्रासदी के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहरा रहे हैं।
बेत्रावती में तबाही के बाद जैसे समय थम गया है। गांव की ज्यादातर इमारतें बाढ़ में बह गईं, लेकिन घंटाघर अब भी खड़ा है। उसकी घड़ी की सुइयां सुबह 9:30 बजे पर थमी हुई हैं।
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