काठमांडू: नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने सैकड़ों परिवारों को ऐसी त्रासदी के बीच खड़ा कर दिया है, जहां अपनों की जिंदगी और मौत के बीच कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा। राष्ट्रीय आपदा प्राधिकरण के अनुसार, रविवार शाम तक बाढ़ के बाद 788 शव बरामद किए जा चुके थे, जबकि 2,500 से अधिक लोग अब भी लापता हैं। इनमें 933 हाइड्रोपावर परियोजनाओं के कर्मचारी शामिल हैं। इस बीच, लापता लोगों के परिजन अस्पतालों, राहत शिविरों और प्रभावित इलाकों में अपने प्रियजनों को खोजने के लिए भटक रहे हैं।
बांके के रहने वाले तिलक घर्ती मगर की 28 वर्षीय बेटी जानकी भी बाढ़ के बाद से लापता है। बेटी की तलाश में निकलने के लिए तिलक को 30 हजार रुपये उधार लेने पड़े। वह कई अस्पतालों में जाकर बेटी के बारे में जानकारी जुटा चुके हैं, लेकिन अब तक उसका कोई सुराग नहीं मिला है।
द काठमांडू पोस्ट के अनुसार, जानकी करीब छह सप्ताह पहले रसुवा के एक होटल में काम करने गई थी। तिलक ने बताया कि बेटी विदेश जाने की तैयारी कर रही थी, लेकिन जिस प्रक्रिया के लिए उसने एक दलाल को पैसे दिए थे, वह रकम दलाल ने हड़प ली। इसके बाद कर्ज चुकाने के लिए जानकी काम करने रसुवा चली गई थी।
बेटी के लापता होने की खबर मिलने के बाद तिलक खुद उसकी तलाश में निकल पड़े। उन्होंने चितवन जाकर अधिकारियों को जानकी का नाम और फोटो भी दिया। लेकिन बाढ़ के खतरे और रास्ते बंद होने के कारण अब उनके लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो गया है।
रिश्तेदारों ने भी उन्हें घर लौटने की सलाह दी है। तिलक का कहना है कि बेटी के गायब होने के बाद उनका मन घर पर बैठने को नहीं कर रहा था। अब हालात ऐसे हैं कि शायद उनके पास वापस लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।
बाढ़ के बाद कई दूसरे परिवार भी इसी तरह अपनों की तलाश में जुटे हैं। सरिता चौधरी अपने लापता पति सुनील तिमुरे की तलाश में अस्पतालों के चक्कर लगा रही हैं। सुनील अपर त्रिशूली-1 परियोजना में मिस्त्री के तौर पर काम करते थे।
बाढ़ से एक दिन पहले सुनील ने फोन पर पत्नी से कहा था कि काम मुश्किल है और उन्हें नदियों से डर लगता है। सरिता ने उन्हें पैसे भेजकर घर लौट आने के लिए कहा था। इसके जवाब में सुनील ने कहा था कि बच्चों के कपड़े खरीद लो, वह बाद में घर आएंगे। अब उनके 16 और 10 साल के बच्चे बार-बार अपनी मां से पूछ रहे हैं कि उनके पिता कहां हैं।
रौतहट की 60 वर्षीय बिरसिमाया भी अपने बेटे शेर बहादुर माझी की तलाश में भरतपुर पहुंची हैं। शेर बहादुर रसुवा कस्टम के पास काम करता था। अस्पताल में लगी स्क्रीन पर वह लापता लोगों की तस्वीरें देखती रहीं, लेकिन उन्हें बेटे का कोई पता नहीं मिला।
बिरसिमाया का एक बेटा पहले ही विदेश में काम करने के दौरान अपनी जान गंवा चुका है। इस त्रासदी के बीच भी उन्हें उम्मीद है कि शेर बहादुर जिंदा होगा। उनका कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ उन्हें बुरी खबरें ही मिलती रही हैं, लेकिन बेटे के लिए उम्मीद अभी बाकी है।
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