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भारत का ‘पावर मूव’: ईरान के मुद्दे पर UN में लिया चौंकाने वाला फैसला, क्या पश्चिमी देशों से बढ़ेगा तनाव?

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मैदान में भारत ने एक ऐसी ‘गुगली’ फेंकी है जिसने वाशिंगटन से लेकर लंदन तक सबको हैरान कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र (UN) में ईरान के खिलाफ आए एक निंदा प्रस्ताव पर भारत ने ‘ना’ कहकर सबको ये संदेश दे दिया है कि भारत की विदेश नीति अब किसी के दबाव में नहीं, बल्कि अपने ‘स्वार्थ और सिद्धांतों’ पर चलेगी।

क्या था पूरा मामला?
ईरान में मानवाधिकारों की स्थिति और वहां चल रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर पश्चिमी देशों ने एक प्रस्ताव पेश किया था। इसका मकसद ईरान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घेरना था। आमतौर पर भारत ऐसे मौकों पर ‘न्यूट्रल’ रहता है, लेकिन इस बार भारत ने खुलकर विरोध में वोट दिया।

रूस और चीन के साथ भारत
इस वोटिंग के बाद वैश्विक गलियारों में चर्चा तेज है क्योंकि भारत के सुर इस बार अमेरिका से नहीं, बल्कि रूस और चीन से मिले हैं। पश्चिमी देश इस बात से परेशान हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मानवाधिकारों के मुद्दे पर उनके साथ क्यों नहीं खड़ा हुआ।

वो वजहें, जिन्होंने भारत को ना कहने पर मजबूर किया:
• ईरान का चाबहार पोर्ट भारत के लिए मध्य एशिया का दरवाजा है। पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान तक पहुँचने के लिए ईरान हमारा सबसे भरोसेमंद साथी है। इस रिश्ते में खटास भारत को भारी पड़ सकती थी।

• भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। ईरान के साथ तनाव का मतलब है तेल की कीमतों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर सीधा असर।

• भारत हमेशा से मानता आया है कि हर देश की अपनी ‘आजादी’ या ‘स्वतंत्रता’ होती है। मानवाधिकार के नाम पर किसी देश के घरेलू मामलों में दखल देना भारत को ‘राजनीति’ ज्यादा और ‘इंसाफ’ कम लगता है।

भारतअब ‘मल्टी-एलाइनमेंट’ यानि (सबके साथ, लेकिन अपने हितों के साथ) के रास्ते पर है। भारत ने ये जता दिया है कि वो अमेरिका के साथ रक्षा सौदे भी करेगा और ज़रूरत पड़ने पर ईरान जैसे पुराने दोस्तों का साथ भी देगा।

news desk

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