नई दिल्ली। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा कक्षा 12वीं के परिणाम घोषित होने के बाद, इस साल लागू की गई नई डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली यानी ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) विवादों के घेरे में आ गई है।
फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी और मैथ्स जैसे मुख्य विषयों में उम्मीद से 10 से 20 प्रतिशत तक कम अंक मिलने के दावों के बाद सोशल मीडिया पर छात्रों और अभिभावकों का गुस्सा फूट पड़ा है।
बढ़ते विवाद के बीच, सीबीएसई के परीक्षा नियंत्रक संयम भारद्वाज ने स्पष्ट किया है कि 1.25 करोड़ से अधिक कॉपियों की जांच के दौरान मूल्यांकन में छोटी-मोटी मानवीय गलतियां होना संभव है।
इस साल सीबीएसई ने कक्षा 12वीं की पारंपरिक कॉपियों की जगह डिजिटल जांच प्रणाली (OSM) लागू की है। इसके तहत छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन करके शिक्षकों को ऑनलाइन कंप्यूटर पर जांच के लिए भेजा जाता है।
अंकों में भारी गिरावट: छात्रों का दावा है कि उन्हें उम्मीद से काफी कम नंबर मिले हैं। कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिन्होंने JEE Main जैसी कठिन परीक्षा तो क्वालीफाई कर ली, लेकिन बोर्ड परीक्षा में वे फेल हो गए या बेहद कम अंक मिले।
तकनीकी गड़बड़ी की आशंका: छात्रों को डर है कि स्कैनिंग के दौरान उत्तर पुस्तिका के कुछ पेज या पूरे उत्तर छूट तो नहीं गए।
पारदर्शिता का अभाव: डिजिटल माध्यम से चेकिंग के तरीके को लेकर छात्र और अभिभावक पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं।
सोशल मीडिया पर बोर्ड के खिलाफ सबसे बड़ा गुस्सा उत्तर पुस्तिका की स्कैन कॉपी देखने की फीस को लेकर है अभिभावकों की मांग: यदि सीबीएसई अपनी नई डिजिटल प्रणाली को पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी मानता है, तो छात्रों को उनकी स्कैन की गई कॉपियां मुफ्त या न्यूनतम शुल्क पर क्यों नहीं दी जा रही हैं? कॉपियां देखने के लिए करीब 700 रुपये का शुल्क लेना मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ डाल रहा है।
विवाद बढ़ता देख सीबीएसई ने 15 मई को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर एक नोटिस जारी कर स्थिति स्पष्ट की। बोर्ड का कहना है कि OSM प्रणाली पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और समान मूल्यांकन प्रक्रिया पर आधारित है।
इस डिजिटल सिस्टम में सभी छात्रों को एक समान और चरणबद्ध (Step-wise) तरीके से अंक दिए जाते हैं। जो छात्र अपने रिजल्ट से खुश नहीं हैं, वे बोर्ड के नियमों के तहत पुनर्मूल्यांकन (Re-evaluation) के लिए आवेदन कर सकते हैं।
इस साल के नतीजों ने डिजिटल मूल्यांकन के असर को साफ कर दिया है। सीबीएसई 12वीं परीक्षा 2026 में कुल पास प्रतिशत गिरकर 85.2% पर आ गया है, जबकि पिछले साल (2025) यह आंकड़ा 88.39% था। यानी इस साल पास होने वाले छात्रों की संख्या में 3.19 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
एक तरफ जहाँ छात्र सड़कों और सोशल मीडिया पर हैं, वहीं दूसरी तरफ देशभर के कई शिक्षक इस नई व्यवस्था के समर्थन में उतर आए हैं। शिक्षकों का मानना है कि: कंप्यूटर पर अंक अपलोड करने में होने वाली मानवीय त्रुटियां (टोटलिंग मिस्टेक) अब खत्म हो गई हैं। शुरुआती ट्रेनिंग के बाद यह सिस्टम काफी तेज, जवाबदेह और यूजर-फ्रेंडली साबित हुआ है।
कॉपियों का बंडल न ढोना पड़ने और पेपरलेस वर्क होने के कारण यह पर्यावरण के अनुकूल भी है। न्यूज़ रूम टेक: तकनीक के इस दौर में ऑन-स्क्रीन मार्किंग शिक्षा को आधुनिक बनाने का बड़ा कदम है, लेकिन जब तक री-चेकिंग की फीस कम नहीं होती और तकनीकी पारदर्शिता पर छात्रों का भरोसा बहाल नहीं होता, तब तक सीबीएसई के इस ‘डिजिटल प्रयोग’ पर सवाल उठते रहेंगे।
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