नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल सहित असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में चुनावी रणभेरी शांत होने के बाद अब सबकी नजरें नतीजों पर टिकी हैं। एग्जिट पोल के आंकड़ों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है, विशेषकर पश्चिम बंगाल को लेकर जहां पी-मार्क (P-MARQ) जैसे सर्वे भाजपा को 150-175 सीटें देकर बहुमत के आंकड़े (148) से ऊपर दिखा रहे हैं। लेकिन क्या इन आंकड़ों को अंतिम सच मान लेना चाहिए? 2021 का अनुभव कुछ और ही कहानी कहता है।
2021 के विधानसभा चुनाव एग्जिट पोल की विश्वसनीयता के लिए एक बड़ा सबक साबित हुए थे। उस समय अधिकांश सर्वेक्षणों ने बंगाल में ‘कमल खिलने’ या भाजपा और टीएमसी के बीच बेहद करीबी मुकाबले का दावा किया था।
बंगाल के विपरीत, अन्य राज्यों में 2021 के दौरान एग्जिट पोल के अनुमान काफी हद तक हकीकत के करीब रहे थे:
मौजूदा एग्जिट पोल भले ही भाजपा को बंगाल में बढ़त दिखा रहे हैं और टीएमसी को पिछड़ता हुआ, लेकिन 2021 का बंगाल मॉडल यह याद दिलाता है कि राजनीतिक माहौल और ‘साइलेंट वोटर’ कभी भी पासा पलट सकते हैं।
: एग्जिट पोल केवल एक दिशात्मक संकेत (Indicator) होते हैं, अंतिम फैसला नहीं। बंगाल जैसे जटिल चुनावी राज्य में सटीक भविष्यवाणी करना हमेशा से एक चुनौती रही है, इसलिए 2026 के असली नतीजों के लिए आधिकारिक काउंटिंग का इंतजार करना ही सबसे बेहतर विकल्प है।
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