- दोषी: पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन, नजीम, कासिम, अनस और जावेद।
- सजा: सभी 5 दोषियों को आजीवन कारावास। (13 जुलाई 2026 को कोर्ट ने इन्हें दोषी ठहराया था)।
- अदालत की टिप्पणी: “अपराध का तरीका अत्यंत क्रूर था, जिसने समाज की आत्मा को झकझोर दिया।”
- पुलिस की मांग: दिल्ली पुलिस ने इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ (दुर्लभ से दुर्लभतम) मामला बताते हुए फांसी की मांग की थी।
नई दिल्ली। फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के युवा अधिकारी अंकित शर्मा की बर्बर हत्या के मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने शुक्रवार (31 जुलाई 2026) को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने मुख्य साजिशकर्ता और आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत सभी 5 दोषियों को उम्रकैद (आजीवन कारावास) की सजा सुनाई है।
दिल्ली पुलिस और पीड़ित परिवार ने दोषियों को फांसी (मृत्युदंड) देने की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने मृत्युदंड न देकर आजीवन कारावास की सजा सुनाते हुए अपराध की क्रूरता पर बेहद तल्ख टिप्पणी की।
“जानवर की तरह नाले में फेंकी लाश”— जज की रोंगटे खड़े करने वाली टिप्पणी
सजा का ऐलान करने से पहले विशेष जज ने वारदात की बर्बरता पर कहा:
“यह एक बेहद गंभीर और वीभत्स घटना थी। जिस तरह से अंकित शर्मा की हत्या की गई और हत्या के बाद उनके शव को घसीटकर चांद बाग के नाले में एक जानवर की तरह फेंक दिया गया, उसने पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है।”
51 घाव और 16 बार धारदार हथियार से हमला: पुलिस ने मांगी थी फांसी
अदालत में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने दलील दी कि अंकित शर्मा पर किया गया हमला योजनाबद्ध और बेहद बर्बर था:
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट के खुलासे: अंकित शर्मा के शरीर पर 51 गंभीर घाव पाए गए थे, जिनमें से 7 घाव जानलेवा थे।
- धारदार हथियारों का इस्तेमाल: कम से कम 16 वार धारदार हथियारों से किए गए थे।
- मौत के बाद भी दरिंदगी: पुलिस के मुताबिक, अंकित की मौत हो जाने के बाद भी उपद्रवियों ने उनके शव को भारी नुकसान पहुंचाया और नाले में बहा दिया।
बचाव पक्ष का तर्क: ‘सिर्फ जख्मों के आधार पर फांसी नहीं दी जा सकती’
दूसरी ओर, ताहिर हुसैन के वकील ने दिल्ली पुलिस की मौत की सजा (फांसी) की मांग का कड़ा विरोध किया। बचाव पक्ष ने दलील दी कि दंगे के दिन ताहिर हुसैन ने खुद स्थिति नियंत्रण में लाने के लिए पुलिस को फोन किया था। वकील ने कहा कि केवल शरीर पर लगे जख्मों की संख्या के आधार पर किसी मामले को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मानकर फांसी की सजा नहीं दी जा सकती।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने ताहिर हुसैन, नजीम, कासिम, अनस और जावेद को जीवन की अंतिम सांस तक जेल में रखने (उम्रकैद) का फैसला सुनाया।