हाजीपुर/वैशाली। बिहार के वैशाली जिले के राघोपुर में गंगा नदी में हुए नाव हादसे ने कई परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया है। इस दुर्घटना में 14 बच्चों की मौत की खबर सामने आई है। बताया जा रहा है कि मृतकों में एक ही परिवार के 13 बच्चे शामिल हैं। हादसे के बाद पूरे इलाके में मातम पसरा है। वहीं, दुर्घटना में इस्तेमाल नाव की जर्जर स्थिति और बच्चों के नाव चलाने के दावों ने नदी पार करने वाले बाढ़ प्रभावित इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के मुताबिक, बच्चे पास के गांव में श्राद्ध का भोज खाने गए थे। लौटते समय गंगा नदी में उनकी नाव पलट गई। हादसे के बाद राहत और बचाव अभियान चलाया गया। बचाव दल ने नदी से पलटी नाव को बाहर निकाला, जिसके एक हिस्से में बड़ा छेद दिखाई दिया। स्थानीय लोगों ने नाव पुरानी और जर्जर होने का दावा किया है। हालांकि, दुर्घटना की वास्तविक वजह की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
श्राद्ध का भोज खाने गए थे बच्चे, लौटते समय पलटी नाव
स्थानीय जानकारी के अनुसार, बच्चे नाव से पास के गांव में श्राद्ध का भोज खाने गए थे। वापसी के दौरान गंगा नदी में नाव पलट गई और बच्चे हादसे की चपेट में आ गए।
प्रत्यक्षदर्शी रवि यादव के मुताबिक, नाव पर बच्चे सवार थे और उसे भी बच्चे ही चला रहे थे। उनके इस दावे के बाद यह सवाल उठ रहा है कि बच्चों को नाव चलाने की जिम्मेदारी कैसे मिली और यात्रा के दौरान सुरक्षा के क्या इंतजाम थे।
हादसे की परिस्थितियों और नाव पर सवार लोगों की संख्या को लेकर आधिकारिक जांच महत्वपूर्ण है। यह भी पता लगाया जाना जरूरी है कि नाव में सुरक्षा उपकरण उपलब्ध थे या नहीं और यात्रा के दौरान किसी नियम का उल्लंघन हुआ था या नहीं।
नाव में मिला बड़ा छेद, जर्जर हालत की जांच जरूरी
हादसे के बाद SDRF की टीम ने नदी में पलटी नाव को बाहर निकाला। जांच के दौरान नाव के एक हिस्से में बड़ा छेद दिखाई दिया। स्थानीय लोगों ने दावा किया कि नाव काफी पुरानी थी और उसकी हालत ठीक नहीं थी।
राघोपुर के पूर्व विधायक और भाजपा नेता सतीश राय ने भी नाव की जर्जर स्थिति का जिक्र किया। उनके मुताबिक, बाढ़ प्रभावित क्षेत्र होने के कारण यहां नाव लोगों के आवागमन का अहम साधन है और गांव में उपलब्ध कराई गई नाव कई साल पुरानी थी।
यदि नाव की स्थिति को लेकर किए गए दावे जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह पता लगाना जरूरी होगा कि उसका रखरखाव और सुरक्षा जांच समय पर हुई थी या नहीं। हालांकि, केवल नाव में छेद मिलने से हादसे की पूरी वजह तय नहीं की जा सकती। इसके लिए तकनीकी जांच और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों का मिलान जरूरी होगा।
बाढ़ प्रभावित राघोपुर में नाव ही आवागमन का सहारा
राघोपुर जैसे बाढ़ प्रभावित इलाकों में नदी पार करने के लिए नावों पर निर्भरता बनी रहती है। कई जगह सड़क संपर्क बाधित होने या लंबा रास्ता होने के कारण नाव लोगों के रोजमर्रा के आवागमन का जरूरी साधन बन जाती है।
ऐसे क्षेत्रों में नाव की फिटनेस, उसकी क्षमता के अनुसार यात्रियों की संख्या, प्रशिक्षित नाव चालक और लाइफ जैकेट जैसे सुरक्षा इंतजाम बेहद अहम हैं। इस हादसे ने इन व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी की जरूरत फिर सामने ला दी है।
अब प्रशासनिक जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि नाव किसके जिम्मे थी, उसकी हालत की आखिरी बार जांच कब हुई थी और हादसे के समय सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम मौजूद थे।
बच्चों को खोने के बाद मां का दर्द देख भावुक हुए लोग
हादसे के बाद प्रभावित परिवारों में शोक का माहौल है। खबर के मुताबिक, अपने बच्चों को खोने वाली एक मां जिलाधिकारी वर्षा सिंह से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ी। यह दृश्य हादसे से प्रभावित परिवारों के असहनीय दुख को सामने लाता है।
एक साथ कई बच्चों की मौत ने पूरे इलाके को झकझोर दिया है। जिन परिवारों के घरों में बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब मातम पसरा है। स्थानीय लोगों के लिए यह घटना लंबे समय तक न भूल पाने वाला दुख बन गई है।
मुख्यमंत्री ने 4-4 लाख रुपये सहायता देने की घोषणा की
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हादसे पर दुख जताते हुए मृतकों के परिजनों को चार-चार लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। उन्होंने प्रशासन को राहत और बचाव कार्य तेजी से पूरा कराने तथा घायलों का बेहतर इलाज सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
हालांकि, आर्थिक सहायता से प्रभावित परिवारों को तत्काल राहत मिल सकती है, लेकिन इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा भी जरूरी है। जांच के बाद यह स्पष्ट होना चाहिए कि नाव हादसा किन परिस्थितियों में हुआ और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।
राघोपुर की इस त्रासदी ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में लोगों की आवाजाही के लिए इस्तेमाल होने वाली नावों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है और इसकी निगरानी कितनी नियमित रूप से की जाती है।