नई दिल्ली: हरतालिका तीज पर भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा का विधान है। इस दिन सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर मिट्टी या रेत से पार्थिव शिवलिंग बनाती हैं और विधि-विधान से उसकी पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस पूजा के जरिए महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य जीवन की कामना करती हैं। इस साल हरतालिका तीज 14 सितंबर को मनाई जाएगी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पर्व पर मिट्टी या रेत से शिवलिंग बनाने की परंपरा आखिर क्यों है और पूजा पूरी होने के बाद इस पार्थिव शिवलिंग का क्या किया जाता है?
मां पार्वती की तपस्या से जुड़ी है पार्थिव शिवलिंग की परंपरा
हरतालिका तीज पर मिट्टी या रेत से शिवलिंग बनाकर पूजा करने की परंपरा काफी पुरानी मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए वन में रहकर कठोर तपस्या की थी। इसी दौरान उन्होंने अपने हाथों से मिट्टी या रेत का शिवलिंग बनाया और पूरी श्रद्धा के साथ उसकी उपासना की।
कहा जाता है कि माता पार्वती की कठिन साधना और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें विवाह का वरदान दिया। इसी मान्यता के चलते हरतालिका तीज पर महिलाएं मिट्टी या बालू से पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की पूजा करती हैं। इसे मां पार्वती की तपस्या की स्मृति से जोड़कर देखा जाता है।
मिट्टी के शिवलिंग का क्या है आध्यात्मिक महत्व?
पार्थिव शिवलिंग के निर्माण को केवल पूजा की परंपरा ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संदेश से भी जोड़कर देखा जाता है। मिट्टी को पृथ्वी तत्व का प्रतीक माना जाता है, जबकि मानव शरीर भी पंचतत्वों से बना माना गया है।
ऐसे में मिट्टी से शिवलिंग बनाकर पूजा करने का भाव यह बताया जाता है कि ईश्वर की आराधना के लिए भौतिक वैभव जरूरी नहीं है। श्रद्धा, भक्ति और संकल्प को ही पूजा का आधार माना गया है। मिट्टी से बना शिवलिंग यह भी स्मरण कराता है कि संसार की भौतिक वस्तुएं स्थायी नहीं हैं।
पूजा के बाद पार्थिव शिवलिंग का क्या करें?
हरतालिका तीज की पूजा पूरी होने के बाद मिट्टी या रेत से बनाए गए पार्थिव शिवलिंग का विसर्जन किया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, व्रत के अगले दिन सुबह पूजा संपन्न करने के बाद पार्थिव शिवलिंग को नदी में विसर्जित किया जाता है।
इस विसर्जन को जीवन की नश्वरता और भौतिक संसार की अस्थायी प्रकृति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जिस तरह मिट्टी से बनी प्रतिमा अंत में प्रकृति में विलीन हो जाती है, उसी तरह संसार की सभी भौतिक वस्तुएं भी एक दिन प्रकृति में समा जाती हैं। पार्थिव शिवलिंग के विसर्जन के बाद ही हरतालिका तीज व्रत का पारण करने का विधान बताया गया है।