रायबरेली: उत्तर प्रदेश के रायबरेली से इंसान और जानवर के बीच रिश्ते की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो भावुक कर देती है। राजेश श्रीवास्तव और शबिस्ता ने सामाजिक और पारिवारिक विरोध के बीच एक-दूसरे का साथ चुना, लेकिन बाद में अकेलापन उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया। इसी दौरान साल 2005 में उनकी जिंदगी में एक अनाथ बंदर आया, जिसका नाम उन्होंने चुनमुन रखा। महज 500 रुपये में लाए गए इस नन्हे बंदर को दंपती ने बेटे की तरह पाला। वक्त के साथ चुनमुन उनके लिए पालतू जानवर नहीं, बल्कि परिवार का सबसे खास सदस्य बन गया।
बिजली के झटके में मां की मौत, 500 रुपये में घर आया चुनमुन
राजेश हिंदू हैं, जबकि शबिस्ता मुस्लिम। साल 2015 में दोनों ने धर्म की दीवारें तोड़कर शादी की। हालांकि, इस रिश्ते को परिवार और समाज की तरफ से स्वीकार नहीं किया गया। सामाजिक बहिष्कार के चलते दोनों को लंबे समय तक अकेलेपन का सामना करना पड़ा।
साल 2005 में उनकी जिंदगी में चुनमुन आया। बिजली का झटका लगने से उसकी मां की मौत हो चुकी थी और वह अनाथ हो गया था। दंपती ने उसे 500 रुपये में अपने साथ ले लिया और फिर उसकी परवरिश अपने बच्चे की तरह की।
AC-हीटर वाला कमरा, नाश्ते में अनार और दूध
चुनमुन की जिंदगी किसी आम पालतू जानवर जैसी नहीं थी। उसके लिए घर में अलग कमरा था, जिसमें गर्मी से बचाने के लिए AC और सर्दियों में गर्म रखने के लिए हीटर लगाया गया था। सुबह उसे अनार के दाने और दूध दिए जाते थे।
दोपहर के खाने में दाल, रोटी, सब्जी और चटनी उसकी पसंद का हिस्सा थे। दंपती का लगाव इतना बढ़ गया कि साल 2010 में उन्होंने चुनमुन की शादी बिट्टी नाम की एक बंदरिया से करा दी। इसके बाद दोनों की शादी की सालगिरह भी हर साल पार्टी करके मनाई जाने लगी।
चुनमुन के आने के बाद कारोबार में बरकत का दावा
राजेश का मानना है कि चुनमुन के उनकी जिंदगी में आने के बाद उनके कारोबार में तरक्की हुई और घर में खुशहाली आई। इसी वजह से उन्होंने अपने घर का नाम भी ‘चुनमुन हाउस’ रख दिया।
एक बार डॉक्टर ने चुनमुन को घर में रखने को गैर-कानूनी बताया तो दंपती काफी भावुक हो गए। उनकी ममता देखकर डॉक्टर ने भी दखल देने के बजाय ऐसा रास्ता निकाला, जिससे चुनमुन उनके साथ रह सके। उसके दांत घिस दिए गए, ताकि वह किसी को काट न सके।
रिश्तेदारों के बजाय चुनमुन के नाम पूरी संपत्ति
अब इस दंपती ने अपनी जिंदगी से जुड़े इस रिश्ते को एक और बड़ा मुकाम दिया है। जिन रिश्तेदारों ने मुश्किल वक्त में उनका साथ नहीं दिया, उन्हें पीछे छोड़ते हुए राजेश और शबिस्ता ने अपनी पूरी संपत्ति चुनमुन के नाम करने की वसीयत तैयार की है।
उनके लिए चुनमुन सिर्फ एक बंदर नहीं, बल्कि वह सदस्य है जिसने उनके अकेलेपन में उनका साथ दिया। यही वजह है कि दंपती ने खून के रिश्तों से ऊपर उस ममता और वफादारी को जगह दी, जिसे उन्होंने वर्षों से चुनमुन के साथ महसूस किया है।