नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit 2026) में हिस्सा लेने पहुंचे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच एक बेहद अहम द्विपक्षीय बैठक हुई। इस बैठक में रक्षा और व्यापार जैसे पारंपरिक मुद्दों के साथ-साथ ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ (INSTC) सबसे प्रमुख एजेंडा रहा।
रूसी राष्ट्रपति पुतिन एक ऐसे मास्टरप्लान को साकार करने के विजन के साथ दिल्ली पहुंचे हैं, जो रूस को पटरियों, सड़कों और समुद्री मार्गों के जरिए सीधे भारत से जोड़ देगा।
क्या है पुतिन का ‘INSTC’ मास्टरप्लान?
रूस की मंशा मॉस्को से मुंबई तक के व्यापारिक सफर को तेज और सुरक्षित बनाना है। रूसी नेतृत्व INSTC को पूर्ण रूप से चालू करने के लिए प्रतिबद्ध है। यदि इस मेगा प्रोजेक्ट को भारत का पूरा समर्थन मिलता है, तो आने वाले समय में दोनों देशों के बीच मालगाड़ियों की सीधी आवाजाही वैश्विक अर्थव्यवस्था का परिदृश्य बदल सकती है।
- हिंद महासागर तक सीधी ट्रेन कनेक्टिविटी: रूस के उप-प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने TASS को दिए इंटरव्यू में पुष्टि की कि रूस भारत और हिंद महासागर तक पहुंचने के लिए सीधे रेलवे लिंक की संभावनाएं तलाश रहा है।
- संभावित रूट विकल्प: इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान या पाकिस्तान के रास्तों का उपयोग करके कनेक्टिविटी स्थापित करने पर विचार किया जा रहा है।
भारत के लिए क्यों खास है यह प्रोजेक्ट?
- कम लागत और कम समय: INSTC के चालू होने से भारत और रूस के बीच माल परिवहन का समय और लागत (Freight Cost) दोनों में भारी कमी आएगी।
- स्वेज नहर पर निर्भरता खत्म: यह मार्ग स्वेज नहर वाले पारंपरिक और लंबे समुद्री रास्ते का एक सशक्त विकल्प बनेगा।
- मध्य एशिया में रणनीतिक पहुंच: इस कॉरिडोर के माध्यम से भारत को मध्य एशियाई देशों तक सीधी पहुंच हासिल होगी।
क्या है 7,200 किलोमीटर लंबा INSTC कॉरिडोर? इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) भारत, रूस और ईरान द्वारा 2002 में शुरू की गई एक महत्वाकांक्षी मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट परियोजना है। 7,200 किलोमीटर लंबा यह नेटवर्क जहाजों, सड़कों और रेलवे लाइनों के एक एकीकृत तंत्र पर काम करता है।
- रूट का खाका: भारत के मुंबई पोर्ट से माल जहाजों के जरिए ईरान के बंदर अब्बास या चाबहार पोर्ट पहुंचता है। वहां से सड़क और रेल मार्ग द्वारा अजरबैजान व मध्य एशियाई देशों से होते हुए सामान रूस के अस्त्रखान और अंततः मॉस्को तक पहुंचाया जाता है।
- समय और लागत में भारी बचत: पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग की तुलना में यह कॉरिडोर परिवहन समय को 40-45 दिनों से घटाकर 18-25 दिन कर देता है। इसके अतिरिक्त, प्रति 15 टन माल पर लगभग $2,500 (तकरीबन 2 लाख रुपये) की सीधी बचत होती है।
वैश्विक संकट के बीच क्यों अनिवार्य बना जमीनी रास्ता?
वर्तमान में मध्य पूर्व में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे संवेदनशील समुद्री मार्गों पर खतरा गहरा गया है—जहां से दुनिया का 20% तेल और LPG गुजरता है। इसके साथ ही लाल सागर और बोस्फोरस जलडमरूमध्य में भी व्यापारिक जहाजों पर जहाजरानी जोखिम और पाबंदियों का डर बना हुआ है।
इन समुद्री संकटों से बेअसर सुरक्षित व्यापार सुनिश्चित करने के लिए पुतिन सरकार जमीन और रेल आधारित इस कॉरिडोर को जल्द से जल्द पूरी तरह सक्रिय करने पर जोर दे रही है, ताकि किसी तीसरे देश या समुद्री नाकेबंदी का असर भारत-रूस के अरबों डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार पर न पड़े।