7 सितंबर को सऊदी अरब पर हूतियों के हमले के बाद मिडिल ईस्ट में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। लेकिन इस बार कहानी सिर्फ हूती हमलों तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या सऊदी अरब इस बढ़ते खतरे के बीच अपने ही सहयोगियों के बीच अकेला पड़ता जा रहा है? रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी ने हूतियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अमेरिका समेत अपने सहयोगियों से मदद की उम्मीद की थी। खासतौर पर क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान यानी MBS ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सैन्य कार्रवाई की मांग की, लेकिन वॉशिंगटन ने सीधे हवाई हमले करने से इनकार कर दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका सऊदी की मदद के लिए सीधे मैदान में उतरने से क्यों बच रहा है?
अमेरिका ने सीधे सैन्य कार्रवाई से किया इनकार
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान यानी MBS ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से दो बार फोन पर बात कर हूती ठिकानों के खिलाफ अमेरिकी हवाई हमले की मांग की थी।
हालांकि, ट्रंप ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, फिलहाल अमेरिका हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य अभियान में शामिल होने की योजना नहीं बना रहा है।
इसके पीछे बड़ी वजह यह बताई जा रही है कि अमेरिका पहले से ही मिडिल ईस्ट के दूसरे मोर्चों पर अपना सैन्य फोकस बनाए हुए है और वह हूतियों के खिलाफ एक नया सीधा मोर्चा खोलने से बचना चाहता है।
अमेरिका ने हाथ खींचे, लेकिन सऊदी को पूरी तरह नहीं छोड़ा
हालांकि, कहानी का दूसरा पहलू भी है। अमेरिका ने सऊदी अरब को पूरी तरह अकेला नहीं छोड़ा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने सीधे हवाई हमलों से इनकार कर दिया हो, लेकिन उसने सऊदी अरब को इंटेलिजेंस यानी खुफिया जानकारी और टारगेटिंग सपोर्ट देने की बात कही है।
इसी सिलसिले में अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने रियाद का दौरा भी किया है। यानी अमेरिका सीधे युद्ध में उतरने से दूरी बना रहा है, लेकिन पर्दे के पीछे सऊदी की सुरक्षा क्षमता मजबूत करने में सहयोग कर रहा है।
पाकिस्तान ने भी सऊदी को दिया बड़ा झटका
पाकिस्तान ने मक्का पैक्ट के बावजूद सऊदी की मदद के लिए तत्काल सैन्य कार्रवाई से दूरी बना ली है। पाकिस्तान ने गुरुवार को कहा कि सऊदी अरब पर हूती हमलों के जवाब में मक्का समझौते के तहत इस्लामाबाद की ओर से किसी सैन्य कार्रवाई पर फिलहाल कोई चर्चा नहीं हुई है।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा कि अभी ऐसी किसी कार्रवाई पर चर्चा नहीं हो रही है और सही समय आने पर समझौते के तहत कदम उठाया जाएगा।
वहीं, तुर्की भी सऊदी की मदद के लिए यमन में सैन्य दखल देने से इनकार कर चुका है। ऐसे में सऊदी अरब के सामने सवाल सिर्फ हूती हमलों का नहीं, बल्कि अपने सहयोगियों से मिलने वाली सैन्य मदद का भी है।
यानी सऊदी अरब पर हूती हमलों के बाद MBS के सामने चुनौती लगातार बढ़ती दिख रही है। अमेरिका ने सीधे हवाई हमलों से इनकार किया है, लेकिन इंटेलिजेंस और टारगेटिंग सपोर्ट के जरिए सऊदी का साथ दे रहा है। पाकिस्तान और तुर्की भी तत्काल सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बना रहे हैं। ऐसे में सऊदी को खुद अपनी सुरक्षा रणनीति मजबूत करनी पड़ सकती है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच MBS कितनी मजबूती से इस चुनौती का सामना कर पाते हैं