नई दिल्ली: दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत ढहने के बाद अब सिर्फ रेस्क्यू ऑपरेशन ही नहीं, बल्कि बिल्डिंग की सुरक्षा व्यवस्था और वहां चल रहे पीजी को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हादसे में छह छात्रों की मौत बताई जा रही है, जबकि 11 लोगों को मलबे से बाहर निकाला जा चुका है। पुलिस और प्रशासन की जांच में यह देखा जा रहा है कि इमारत में मरम्मत का काम किस अनुमति के तहत चल रहा था और क्या बिल्डिंग सुरक्षा मानकों पर खरी उतरती थी।
बताया जा रहा है कि इमारत के बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर पर रिपेयर का काम चल रहा था। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, यह काम कथित तौर पर बिना अनुमति कराया जा रहा था। इसके अलावा बिल्डिंग में किसी तरह का सेफ्टी चेक हुआ था या नहीं और आपात स्थिति में बाहर निकलने के लिए वैकल्पिक रास्ता मौजूद था या नहीं, इन पहलुओं की भी जांच की जा रही है।
करीब 15 साल में चौथी बड़ी घटना का दावा
स्थानीय लोगों के मुताबिक, 299 घरों वाली इस रिसेटलमेंट कॉलोनी में करीब 15 साल के दौरान इस तरह की यह चौथी घटना है। इससे पहले 2022 में एक निर्माणाधीन तीन मंजिला मकान की छत गिरने से दो लोगों की मौत हुई थी।
मौजूदा इमारत 1990 के दशक के आखिर में बनाई गई थी। करीब 55 वर्ग गज में बनी इस संपत्ति को समय के साथ पीजी में तब्दील कर दिया गया। पुलिस अब यह भी पता लगा रही है कि पीजी के रूप में इसका संचालन नियमों के मुताबिक हो रहा था या नहीं।
हादसे से पहले दीवारों पर थीं दरारें?
स्थानीय निवासियों का दावा है कि इमारत में गिरने से पहले ही दरारें दिखाई देने लगी थीं। हालांकि, दिल्ली नगर निगम का कहना है कि इस इमारत को लेकर उसके पास पहले कभी कोई आधिकारिक शिकायत दर्ज नहीं हुई थी।
MCD के रिकॉर्ड में इस इमारत को P-14 के तौर पर चिह्नित किया गया था। इसमें बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर के अलावा चार मंजिलें थीं। स्थानीय लोगों का दावा है कि करीब दो साल पहले इमारत में दो और मंजिलें जोड़ी गई थीं। अब जांच का अहम हिस्सा यह होगा कि ये अतिरिक्त मंजिलें कब और किस प्रक्रिया के तहत बनाई गईं और इनके लिए जरूरी अनुमति ली गई थी या नहीं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, सत्य निकेतन पहले रिसेटलमेंट कॉलोनी थी और यहां बड़ी संख्या में छात्र रहने लगे। साउथ कैंपस के कई कॉलेज आसपास होने के कारण कई मकानों को बहुमंजिला इमारतों में बदलकर छात्रों को किराए पर दिया जाने लगा।
हर मंजिल पर चार कमरे, बेड के हिसाब से किराया
बताया जा रहा है कि इस इमारत की प्रत्येक मंजिल पर चार कमरे थे और कमरों में मौजूद बेड के आधार पर किराया लिया जाता था। अलग-अलग मंजिलों पर किराए की दर भी अलग थी।
जानकारी के मुताबिक, ग्राउंड फ्लोर पर एक कमरे में प्रति बेड करीब 18 हजार रुपये किराया लिया जा रहा था। तीसरी मंजिल पर यह रकम करीब 16 हजार रुपये और चौथी मंजिल पर करीब 14 हजार रुपये प्रति बेड बताई गई है। दूसरी मंजिल के कमरे किराए पर नहीं दिए गए थे।
स्थानीय निवासियों का यह भी कहना है कि आपात स्थिति में बाहर निकलने के लिए इमारत में कोई दूसरा रास्ता नहीं था। बताया गया है कि संपत्ति को ‘हॉस्टल डेज’ नाम की कंपनी को लीज पर देने के बाद पीजी के तौर पर चलाया जा रहा था।
लीज और पीजी संचालन की अनुमति भी जांच के घेरे में
सूत्रों के मुताबिक, इमारत गुड़गांव के तीन भाइयों हरि राम बंसल, आनंद बंसल और आजाद बंसल की थी। इसे पिछले साल ‘हॉस्टल डेज’ को लीज पर दिए जाने की जानकारी सामने आई है।
अब पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि लीज की वास्तविक व्यवस्था क्या थी, पीजी चलाने के लिए जरूरी अनुमति ली गई थी या नहीं और इमारत में रहने वाले छात्रों की सुरक्षा के लिए निर्धारित नियमों का पालन किया जा रहा था या नहीं।
क्या मरम्मत के दौरान बदला गया था कोई लोड-बेयरिंग हिस्सा?
स्थानीय लोगों के अनुसार, इमारत गिरने से करीब एक सप्ताह पहले वहां मरम्मत का काम चल रहा था। इमारत में नमी, दरार और पानी जमा होने की बात भी सामने आई है। हालांकि, हादसे की वास्तविक वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि अगर इमारत में संरचनात्मक या पानी से जुड़ी कोई समस्या दिखाई दे रही थी, तो मरम्मत शुरू करने से पहले उसकी मजबूती का आकलन कराया गया था या नहीं।
जांच में यह भी देखा जाएगा कि मरम्मत के दौरान इमारत के किसी भार उठाने वाले हिस्से में बदलाव किया गया था या नहीं और क्या उस काम का इमारत गिरने से कोई संबंध था।
सत्य निकेतन की पुरानी इमारतों और पीजी पर बढ़ी चिंता
इस हादसे ने सत्य निकेतन में पुरानी इमारतों और पीजी में रह रहे छात्रों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। साउथ कैंपस के आसपास बड़ी संख्या में छात्र किराए के मकानों और पीजी में रहते हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि इन इमारतों की संरचनात्मक मजबूती, अग्नि सुरक्षा और आपातकालीन निकास की व्यवस्था की नियमित जांच होती है या नहीं। सत्य निकेतन हादसे की जांच में इन्हीं सवालों के जवाब सामने आने की उम्मीद है।