20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित संसद मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प हो गई। इस घटना के बाद सुरक्षाबलों की कार्रवाई को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पेलेट गन (Pellet Gun) और शॉक बैटन (Shock Baton) का इस्तेमाल किया गया, जबकि दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
‘द हिंदू’ की रिपोर्ट का दावा: पेलेट गन से घायल हुए प्रदर्शनकारी
‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, 20 जुलाई को हुई झड़प और लाठीचार्ज में करीब 80 प्रदर्शनकारी और 118 पुलिसकर्मी घायल हुए।
- पेलेट गन से चोटें: लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया कि मध्य प्रदेश के जबलपुर निवासी 25 वर्षीय प्रदर्शनकारी शेख इरशाद मंसूरी के शरीर के ऊपरी हिस्से में छर्रे (पेलेट्स) लगे हैं।
- सर्जरी की स्थिति: मंसूरी के चेहरे और शरीर पर करीब 30-40 घाव पाए गए हैं। उनकी आंखों के नीचे से छर्रे निकाल दिए गए हैं, हालांकि गर्दन की खून की नली के पास फंसे एक छर्रे को निकालने के लिए दूसरी सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है।
- शॉक बैटन का इस्तेमाल: सोशल मीडिया पर 21 जुलाई को एक वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें कथित तौर पर एक महिला को शॉक बैटन के जरिए बिजली का हल्का झटका देकर अचेत होते देखा गया।
- सुरक्षाबलों की तैनाती: जंतर-मंतर पर दिल्ली पुलिस के साथ रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की तैनाती की गई थी, जिसके गियर में पेलेट गन और शॉक बैटन शामिल होते हैं।
स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने अस्पताल पहुंचकर घायलों का जाना हाल
घटना की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने 21 जुलाई को अस्पताल का दौरा किया और घायल प्रदर्शनकारी इरशाद मंसूरी से मुलाकात की।
अस्पताल में नड्डा द्वारा पूछे जाने पर मंसूरी ने बताया कि वे शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त समस्याओं के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का हिस्सा बनने आए थे। इस दौरान अन्य गंभीर रूप से घायल मरीजों (जिनमें एक 15 वर्ष का किशोर और ICU में भर्ती 21 वर्षीय युवती शामिल हैं) का इलाज जारी है।
दिल्ली पुलिस की सफाई: “हमारे पास पेलेट गन नहीं हैं”
विवाद और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के बाद नई दिल्ली के पुलिस उपायुक्त (DCP) ने दिल्ली पुलिस के आधिकारिक ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) हैंडल पर फैक्ट-चेक जारी करते हुए स्थिति स्पष्ट की।
दिल्ली पुलिस का बयान: “शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दिल्ली पुलिस बल द्वारा पेलेट गन का इस्तेमाल किए जाने का दावा करने वाली खबरें पूरी तरह से झूठी और भ्रामक हैं। दिल्ली पुलिस के पास न तो पेलेट गन हैं और न ही इनका इस्तेमाल किया गया है।”
पुलिस ने आम जनता से किसी भी प्रकार की असत्यापित या भ्रामक खबरों को न फैलाने की अपील की है। हालांकि, मामले में रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) या सीआरपीएफ की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
गृह मंत्रालय के नियम: कब और कैसे चलाई जा सकती है पेलेट गन?
भारत सरकार ने 2016 में पेलेट गन के गैर-घातक विकल्पों की तलाश के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। संसद में दिए गए गृह मंत्रालय के बयानों के अनुसार, पेलेट गन के इस्तेमाल के स्पष्ट दिशा-निर्देश तय हैं:
- प्राथमिक उपाय: दंगाइयों या हिंसक भीड़ को हटाने के लिए सुरक्षाबल सबसे पहले PAWA-Chilli (मिर्च के गोले/ग्रेनेड), STUN-LAC और आंसू गैस के गोलों (Tear Smoke Shells) का इस्तेमाल करेंगे।
- अंतिम विकल्प: पेलेट गन का इस्तेमाल केवल तभी और एक अंतिम विकल्प (Last Resort) के रूप में किया जा सकता है, जब अन्य सभी गैर-घातक उपाय भीड़ को रोकने में पूरी तरह विफल साबित हो जाएं।
भारत में पेलेट गन के इस्तेमाल का इतिहास
भीड़ नियंत्रण के लिए पेलेट गन का इस्तेमाल भारत में हमेशा से विवादों के घेरे में रहा है:
- 2010 और 2016 (जम्मू-कश्मीर): घाटी में अशांति के दौरान बड़े पैमाने पर पेलेट गन का इस्तेमाल हुआ था, जिसके कारण कई लोगों की आंखों की रोशनी प्रभावित हुई थी।
- 2023 (मणिपुर हिंसा): जातीय संघर्ष के दौरान प्रदर्शनकारियों पर इसके इस्तेमाल से जन आक्रोश बढ़ा था।
- 2024 (किसान आंदोलन): शंभू और खनौरी बॉर्डर पर प्रदर्शनकारी किसानों ने पेलेट गन से घायल होने का दावा किया था।