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“पेपर दोबारा करा लोगे, मेरी बेटी को लौटा पाओगे क्या… NEET विवाद के बीच आकांक्षा की मौत से टूट गया परिवार”

रीवा: मऊगंज का एक घर आज भी उसी तरह खड़ा है, लेकिन उसके भीतर का माहौल पूरी तरह बदल चुका है। जहां कभी एक बेटी के डॉक्टर बनने के सपनों की आवाज गूंजती थी, वहां अब सिर्फ सन्नाटा और गहरी उदासी है। आकांक्षा चतुर्वेदी, वही नाम जो अब हर पल परिवार की आंखों में दर्द बनकर लौट आता है।

परिवार का कहना है कि आकांक्षा NEET परीक्षा देने के बाद बेहद खुश थी और उसे अच्छे परिणाम की पूरी उम्मीद थी। लेकिन इसके बाद परीक्षा से जुड़ी अनिश्चितता और पेपर लीक की खबरों ने माहौल बदल दिया। परिजनों का आरोप है कि इसी तनाव और मानसिक दबाव ने उनकी बेटी को भीतर से तोड़ दिया।

धीरे-धीरे बदलने लगी थी आकांक्षा की हालत

परिवार के मुताबिक परीक्षा के बाद से ही आकांक्षा के व्यवहार में बदलाव आने लगा था। वह पहले की तरह खुलकर बात नहीं करती थी, खाने-पीने में भी कमी आ गई थी और अधिकतर समय वह चुप रहने लगी थी। घरवालों ने कई बार उसे संभालने की कोशिश की, लेकिन स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई।

डॉक्टर बनने के सपने के साथ कर्ज में डूबा परिवार

आकांक्षा मध्य प्रदेश के मऊगंज की रहने वाली थी और पढ़ाई के लिए नागपुर में रह रही थी। उसके पिता किसान हैं और बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए उन्होंने लाखों रुपये का कर्ज लिया था। परिवार को पूरा भरोसा था कि एक दिन बेटी डॉक्टर बनकर उनकी सारी मुश्किलें खत्म कर देगी, लेकिन हालात ने सब कुछ बदल दिया।

पिता अस्पताल में भर्ती, मां लगातार सदमे में

परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। बेटी की मौत के बाद पिता की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। मां नीलम चतुर्वेदी गहरे सदमे में हैं और बार-बार यही सवाल दोहरा रही हैं कि पेपर तो दोबारा करा लोगे, लेकिन मेरी बेटी को लौटा पाओगे क्या। परिवार का कहना है कि पढ़ाई और कोचिंग के लिए 15 से 20 लाख रुपये तक का कर्ज हो चुका है। पिता पहले भी दो बार हार्ट अटैक झेल चुके हैं और लकवे के बाद भी उन्होंने बेटी के सपनों के लिए मेहनत जारी रखी थी।

राजनीतिक बयानबाजी भी तेज, मामला हुआ गर्म

इस घटना को लेकर अब राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। विपक्ष की ओर से केंद्र सरकार पर सवाल उठाते हुए इसे सिस्टम की विफलता बताया गया है। वहीं सत्ता पक्ष की ओर से इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक एजेंडा करार दिया गया है।

एक घर, एक खामोशी और अनगिनत सवाल

मऊगंज का यह घर आज भी उसी एक सवाल में उलझा है कि क्या मेहनत करने वाले छात्रों के सपने इसी तरह टूटते रहेंगे। वहां न कोई आवाज है, न कोई बहस, सिर्फ एक परिवार है जो अपनी बेटी की यादों के सहारे जीने की कोशिश कर रहा है और जवाब तलाश रहा है।

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