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Indian Press House > Blog > Latest News > 31 अक्टूबर को क्यों मनाया जाता है हैलोवीन? आखिर क्यों डरावने कपड़े पहनते हैं लोग, 2000 साल पुरानी है इसकी कहानी
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31 अक्टूबर को क्यों मनाया जाता है हैलोवीन? आखिर क्यों डरावने कपड़े पहनते हैं लोग, 2000 साल पुरानी है इसकी कहानी

vineet verma
Last updated: October 30, 2026 11:34 pm
vineet verma
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नई दिल्ली: हर साल 31 अक्टूबर को दुनिया के कई देशों में हैलोवीन मनाया जाता है। इस दिन लोग भूतों, चुड़ैलों और डरावने किरदारों की तरह तैयार होते हैं। घरों को कद्दू, कंकाल और मकड़ी के जालों से सजाया जाता है। बच्चे अलग-अलग वेशभूषा में घर-घर जाकर मिठाइयां और टॉफियां मांगते हैं। पश्चिमी देशों में लोकप्रिय यह त्योहार अब भारत के बड़े शहरों में भी अपनी जगह बना रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर हैलोवीन पर लोग डरावने कपड़े क्यों पहनते हैं? कद्दू को इस त्योहार से क्यों जोड़ा गया और इसकी शुरुआत कैसे हुई? इसके पीछे करीब 2000 साल पुरानी परंपरा की कहानी है।

Contents
प्राचीन केल्टिक सभ्यता से जुड़ी है हैलोवीन की शुरुआतआत्माओं से बचने के लिए डरावने कपड़े क्यों पहनते थे लोग?आग जलाने और जानवरों की बलि देने की भी थी परंपराकैसे पड़ा हैलोवीन नाम?कद्दू पर डरावना चेहरा बनाने की कहानी क्या है?आज डर का नहीं, मनोरंजन का त्योहार बन चुका है हैलोवीन

प्राचीन केल्टिक सभ्यता से जुड़ी है हैलोवीन की शुरुआत

हैलोवीन का इतिहास प्राचीन केल्टिक सभ्यता से जुड़ा माना जाता है। यह सभ्यता मुख्य रूप से आयरलैंड, फ्रांस और ब्रिटेन के कुछ हिस्सों में फैली हुई थी। उस दौर में केल्टिक समुदाय के लोग एक नवंबर से नए साल की शुरुआत मानते थे। उनके लिए यह दिन गर्मियों के अंत और सर्दियों के आगमन का प्रतीक था।

इस मौके से एक रात पहले यानी 31 अक्टूबर को वे सोविन या सामहिन नाम का उत्सव मनाते थे। उनकी मान्यता थी कि इस रात जीवित लोगों और मृतकों की दुनिया के बीच की दूरी कम हो जाती है और दूसरी दुनिया की आत्माएं धरती पर लौट आती हैं। इसी विश्वास ने आगे चलकर हैलोवीन की परंपराओं को जन्म दिया।

आत्माओं से बचने के लिए डरावने कपड़े क्यों पहनते थे लोग?

प्राचीन केल्टिक लोगों का मानना था कि 31 अक्टूबर की रात भटकती आत्माएं धरती पर आ सकती हैं। उन्हें डर था कि ये आत्माएं उनकी फसलों को नुकसान पहुंचा सकती हैं और परिवारों के लिए परेशानी खड़ी कर सकती हैं।

इसी डर से बचने के लिए लोग जानवरों की खाल से बने कपड़े और डरावने मुखौटे पहनते थे। उनका विश्वास था कि ऐसा करने से आत्माएं उन्हें पहचान नहीं पाएंगी और नुकसान पहुंचाने से बचेंगी। समय के साथ यह परंपरा बदलती गई और डरावने मुखौटे तथा वेशभूषा हैलोवीन के सबसे चर्चित हिस्सों में शामिल हो गए।

आग जलाने और जानवरों की बलि देने की भी थी परंपरा

सोविन उत्सव के दौरान केल्टिक समुदाय के लोग बड़े-बड़े अलाव जलाते थे। इन आग को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता था। लोग अपनी फसलों का कुछ हिस्सा और जानवरों की बलि चढ़ाकर देवताओं को प्रसन्न करने की कोशिश करते थे।

उनकी मान्यता थी कि इन अनुष्ठानों से सर्दियों के कठिन मौसम में उनके परिवार और समुदाय की रक्षा होगी। साथ ही बुरी आत्माओं और नकारात्मक शक्तियों का खतरा भी कम होगा।

कैसे पड़ा हैलोवीन नाम?

हैलोवीन के मौजूदा नाम के पीछे ईसाई धर्म का भी प्रभाव रहा है। आठवीं शताब्दी के दौरान कैथोलिक चर्च ने एक नवंबर को सभी संतों की याद में ऑल सेंट्स डे मनाने की परंपरा को बढ़ावा दिया। इसे ऑल हैलोज डे भी कहा जाता था।

इसके ठीक एक दिन पहले यानी 31 अक्टूबर की शाम को ऑल हैलोज ईव कहा जाने लगा। समय के साथ ऑल हैलोज ईव का नाम छोटा होकर हैलोवीन बन गया। इस तरह प्राचीन लोक परंपराओं और ईसाई धार्मिक मान्यताओं के मेल से इस त्योहार का मौजूदा स्वरूप विकसित हुआ।

कद्दू पर डरावना चेहरा बनाने की कहानी क्या है?

हैलोवीन की सबसे खास पहचान कद्दू पर डरावने चेहरे बनाकर उसके अंदर रोशनी करने की परंपरा है। इसे जैक-ओ-लैंटर्न कहा जाता है। हालांकि, शुरुआत में कद्दू का इस्तेमाल नहीं होता था।

आयरलैंड में लोग शलजम और आलू को खोखला करके उन पर डरावने चेहरे बनाते थे और उनके अंदर दीपक जलाते थे। माना जाता था कि इससे बुरी आत्माओं को दूर रखा जा सकता है।

उन्नीसवीं शताब्दी में जब बड़ी संख्या में आयरिश लोग अमेरिका पहुंचे, तो वहां उन्हें शलजम की तुलना में कद्दू आसानी से मिलने लगे। कद्दू आकार में बड़ा था और उस पर नक्काशी करना भी आसान था। इसके बाद कद्दू पर डरावने चेहरे बनाने की परंपरा लोकप्रिय होती गई और धीरे-धीरे यह हैलोवीन की पहचान बन गई।

आज डर का नहीं, मनोरंजन का त्योहार बन चुका है हैलोवीन

समय के साथ हैलोवीन का स्वरूप काफी बदल गया है। कभी आत्माओं और बुरी शक्तियों से बचने के लिए मनाया जाने वाला यह उत्सव अब मनोरंजन, सजावट और अलग-अलग वेशभूषा का बड़ा अवसर बन चुका है।

आज इस दिन लोग डरावने किरदारों के कपड़े पहनते हैं, घरों और बाजारों को सजाते हैं और विशेष पार्टियों का आयोजन करते हैं। बच्चे घर-घर जाकर टॉफियां और मिठाइयां मांगते हैं। इसे ट्रिक ऑर ट्रीट कहा जाता है।

पश्चिमी देशों से शुरू हुई यह लोकप्रिय परंपरा अब दुनिया के कई हिस्सों में पहुंच चुकी है। भारत में भी खासकर महानगरों में हैलोवीन पार्टियों और थीम आधारित आयोजनों का चलन बढ़ रहा है।

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