थिम्पू: हिमालय में भारत और चीन के बीच स्थित भूटान अपनी सुरक्षा, राष्ट्रीय पहचान और अस्तित्व से जुड़ी चुनौतियों के बीच बौद्ध धर्म को कूटनीति के एक अहम माध्यम के तौर पर आगे बढ़ा रहा है। इसे बौद्ध कूटनीति के रूप में देखा जा रहा है। देश के भीतर बदलती आबादी, युवाओं का विदेश पलायन और तिब्बती बौद्ध धर्म को लेकर क्षेत्रीय राजनीति के बीच भूटान अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
अगस्त-सितंबर 2026 में श्रीलंका की प्रधानमंत्री हारिणी अमरासूर्या का थिम्पू दौरा भी इसी बदलते कूटनीतिक परिदृश्य के बीच हुआ। पांच दिन के इस दौरे में उन्होंने एक वैश्विक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया। यह यात्रा भूटान की उस नीति का उदाहरण मानी जा रही है, जिसमें वह धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्तों के जरिए अपने कूटनीतिक दायरे को विस्तार दे रहा है।
भूटान के लिए बौद्ध पहचान इतनी अहम क्यों?
भूटान में बौद्ध धर्म महज धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय पहचान, शासन व्यवस्था और सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्ष 2008 के संविधान में बौद्ध धर्म को देश की आध्यात्मिक विरासत बताया गया है और इसके संरक्षण की जिम्मेदारी सरकार को दी गई है।
भूटान के राजा का बौद्ध होना भी जरूरी है। अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने के लिए भूटान ने लंबे समय तक खुद को बाहरी दुनिया से काफी हद तक अलग रखा। बाद में उसने धीरे-धीरे दुनिया के लिए अपने दरवाजे खोले और विकास के लिए सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता यानी ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस का मॉडल दुनिया के सामने रखा।
युवाओं का पलायन बना बड़ी चुनौती
भूटान की बौद्ध कूटनीति के विस्तार के पीछे सामाजिक और आर्थिक बदलाव भी अहम बताए जाते हैं। करीब 8 लाख की आबादी वाले इस देश से बेहतर अवसरों की तलाश में लगभग 71 हजार नागरिक विदेश जा चुके हैं।
युवाओं के विदेश जाने, बढ़ती महंगाई और परिवार में पति-पत्नी दोनों के कमाने जैसी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का असर जनसंख्या पर भी पड़ रहा है। देश में प्रजनन दर घटकर प्रति महिला 1.4 बच्चे रह गई है। इसके साथ नई पीढ़ी के पारंपरिक मान्यताओं से दूर होने की चिंता भी बढ़ी है।
तिब्बती बौद्ध धर्म और क्षेत्रीय राजनीति का असर
भूटान का वज्रयान बौद्ध धर्म ऐतिहासिक रूप से तिब्बत से प्रभावित रहा है। 1950 के दशक में चीन के तिब्बत पर नियंत्रण के बाद भूटान भारत के और करीब आया।
अब दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर अनिश्चितता, चीन की ओर से तिब्बती बौद्ध धर्म के ‘चीनीकरण’ और अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते तनाव ने धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर भूटान की चिंताएं बढ़ाई हैं। ऐसे में वह अपनी धार्मिक विरासत और सांस्कृतिक संप्रभुता को बनाए रखने के लिए कूटनीतिक स्तर पर खुद सक्रिय भूमिका बढ़ा रहा है।
गेलेफू से शुरू हुई नई रणनीति
भूटान की नई रणनीति में गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी परियोजना को सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में गिना जा रहा है। यह एक विशेष प्रशासनिक क्षेत्र है, जिसे आर्थिक विकास के साथ आध्यात्मिक ध्यान, माइंडफुलनेस और मानव कल्याण से जोड़कर विकसित किया जा रहा है।
इस परियोजना का उद्देश्य विदेशी निवेश आकर्षित करने के साथ युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना और उनके विदेश पलायन को रोकना भी है। नवंबर 2026 में गेलेफू में एक ही दिन 108 स्तूपों के निर्माण का अभियान आयोजित किया जाना है।
मंदिरों और शाही दौरों से मजबूत हो रहे रिश्ते
भूटान ने बौद्ध कूटनीति को आगे बढ़ाने के लिए धार्मिक गतिविधियों के साथ उच्चस्तरीय शाही दौरों पर भी जोर दिया है। इसके तहत कई देशों के साथ सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को विस्तार दिया गया है।
जुलाई 2024 में भूटान नरेश ने मंगोलिया की पहली राजकीय यात्रा की। दिसंबर 2024 में उन्होंने नेपाल की अनौपचारिक यात्रा की, जिससे दोनों देशों के संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश हुई।
अप्रैल 2025 में म्यांमार में आपदा राहत के लिए भूटान ने 87 सदस्यीय दल भेजा। इसी वर्ष अप्रैल में थाई सम्राट ने भूटान का दौरा किया और दिसंबर 2025 में भूटानी राजा-रानी थाईलैंड गए। अगस्त 2025 में भूटान नरेश ने वियतनाम की पहली राजकीय यात्रा की।
सितंबर 2025 में बिहार के राजगीर में बौद्ध मंदिर का उद्घाटन किया गया। नवंबर 2025 में गेलेफू में ग्लोबल पीस प्रेयर फेस्टिवल आयोजित हुआ, जिसमें भारत से पिप्रहवा-कपिलवस्तु के अवशेष लाए गए।
नवंबर 2025 में वाराणसी में भूटानी मंदिर और गेस्ट हाउस के लिए जमीन की घोषणा हुई। जून 2026 में नेपाल के लुम्बिनी में मंदिर परिसर का भूमि पूजन किया गया। अगस्त-सितंबर 2026 में जापान की राजकुमारी अकीको और विदेश राज्य मंत्री डॉ. कुनिमित्सु अकीको ने भूटान का दौरा किया। सितंबर 2026 में भूटान ने नेपाल को बाढ़ राहत के लिए 100 मिलियन रुपये का योगदान भी दिया।
दक्षिण एशिया में बढ़ रहा सांस्कृतिक जुड़ाव
बोधगया, राजगीर, लुम्बिनी और वाराणसी जैसे बौद्ध महत्व वाले स्थलों पर भूटान की मौजूदगी बढ़ने से वह दक्षिण एशिया के बौद्ध पर्यटन सर्किट से और गहराई से जुड़ रहा है। इसके साथ पड़ोसी देशों के साथ सांस्कृतिक और धार्मिक रिश्तों को भी विस्तार मिल रहा है।
इन प्रयासों को गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी के जरिए विदेशी निवेश आकर्षित करने की कोशिश से भी जोड़ा जा रहा है। हालांकि यह रणनीति भारत के साथ भूटान के मौजूदा मजबूत रिश्तों की जगह लेने वाली नहीं है, लेकिन इससे भूटान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने कूटनीतिक संपर्कों में विविधता लाने का अवसर मिलता है।
भूटान के सामने अस्तित्व से जुड़ी चुनौती
भूटान ब्रॉडकास्टिंग एजेंसी के मुताबिक, भूटानी प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे ने स्वीकार किया है कि उनका देश इस समय अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। यह चुनौती सैन्य युद्ध के रूप में नहीं है, बल्कि आर्थिक, जनसंख्या और भू-राजनीतिक मोर्चों पर है।
ऐसे में बौद्ध पहचान को विदेश नीति के साथ जोड़ना भूटान के लिए केवल धार्मिक विस्तार का सवाल नहीं है। इसके जरिए वह अपनी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने, दूसरे बौद्ध देशों से संबंध बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी को विस्तार देने की कोशिश कर रहा है।
दुनिया का पहला कार्बन नेगेटिव देश
भूटान की पहचान पर्यावरण संरक्षण के लिए भी अलग रही है। उसे दुनिया का पहला कार्बन नेगेटिव देश बताया जाता है। इसका अर्थ है कि देश जितनी कार्बन डाईऑक्साइड पैदा करता है, उससे अधिक मात्रा में उसके घने जंगल कार्बन सोख लेते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, भूटान हर साल करीब 22 लाख टन कार्बन डाईऑक्साइड पैदा करता है, जबकि उसके जंगल सालाना 90 लाख टन से ज्यादा कार्बन डाईऑक्साइड सोखते हैं। भूटान के संविधान के अनुच्छेद 5 में यह भी प्रावधान है कि देश की कुल भूमि का कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा हमेशा जंगलों से ढका रहेगा।