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Indian Press House > Blog > Trending News > पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव से क्यों कांप जाती है भारत की तेल व्यवस्था? जानिए कैसे आपकी जेब तक पहुंचता है इसका सीधा असर
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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव से क्यों कांप जाती है भारत की तेल व्यवस्था? जानिए कैसे आपकी जेब तक पहुंचता है इसका सीधा असर

vineet verma
Last updated: July 17, 2026 1:41 am
vineet verma
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नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में युद्ध, सैन्य कार्रवाई या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ते ही भारत की सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की आपूर्ति और उसकी कीमतें बन जाती हैं। हजारों किलोमीटर दूर होने वाली घटनाओं का असर भारत के ऊर्जा बाजार से लेकर आम लोगों की जेब तक महसूस किया जाता है। इसकी वजह यह है कि देश अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है और उसमें भी पश्चिम एशिया की हिस्सेदारी सबसे अधिक है।

Contents
पश्चिम एशिया भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है सबसे अहम?तेल महंगा होने पर आम लोगों पर क्या असर पड़ता है?क्या भारत के पास संकट से निपटने की तैयारी है?ईंधन कीमतों पर भी दिखने लगा असर

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता और आयातक है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 के पहले 10 महीनों में देश की कच्चे तेल पर आयात निर्भरता 88.6 प्रतिशत रही। ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति प्रभावित होने या कीमतों में उछाल आने का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

पश्चिम एशिया भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

भारत अपने कुल कच्चे तेल का लगभग 55 प्रतिशत पश्चिम एशिया के देशों से खरीदता है। इसके अलावा एलएनजी की बड़ी आपूर्ति भी कतर, यूएई और ओमान जैसे देशों से होती है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य तनाव या अस्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है।

होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है सबसे अहम?

पश्चिम एशिया से दुनिया के विभिन्न देशों तक जाने वाला अधिकांश कच्चा तेल होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते गुजरता है। यदि इस समुद्री मार्ग पर किसी तरह का संकट पैदा होता है या आवाजाही प्रभावित होती है, तो वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती है। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है।

हाल के समय में इस मार्ग पर तनाव बढ़ने के बाद आपूर्ति को लेकर चिंताएं भी तेज हुई हैं। हालांकि फिलहाल रास्ता खुला है, लेकिन क्षेत्रीय हालात बिगड़ने की स्थिति में जोखिम लगातार बना हुआ है।

तेल महंगा होने पर आम लोगों पर क्या असर पड़ता है?

कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। इसकी वजह से परिवहन लागत बढ़ जाती है, जिससे रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं की ढुलाई महंगी हो जाती है। परिणामस्वरूप खाद्य पदार्थों और अन्य उपभोक्ता सामानों की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है।

इसके अलावा विमान ईंधन महंगा होने से हवाई किराए बढ़ सकते हैं। ऊर्जा लागत बढ़ने का असर विभिन्न सेवाओं और उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ता है, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।

क्या भारत के पास संकट से निपटने की तैयारी है?

ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए भारत ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार तैयार किए हैं। देश में विशाखापट्टनम, मंगलूरु और पाडुर में रणनीतिक तेल भंडारण सुविधाएं मौजूद हैं।

इन तीनों भंडारों की कुल क्षमता लगभग 5.33 मिलियन टन है। सरकार के अनुसार, यदि ये पूरी क्षमता तक भरे हों तो देश की करीब 9.5 दिनों की कच्चे तेल की आवश्यकता केवल इन भंडारों से पूरी की जा सकती है।

ईंधन कीमतों पर भी दिखने लगा असर

पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सरकारी तेल कंपनियां मई 2026 में तीसरी बार ईंधन के दाम बढ़ा चुकी हैं। दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 99.51 रुपये प्रति लीटर और डीजल 92.49 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच चुकी है। ऐसे में विशेषज्ञों की नजर अब पश्चिम एशिया के हालात और वैश्विक तेल बाजार की अगली चाल पर बनी हुई है।

 

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