पुरी। ओडिशा के पुरी में स्थित प्राचीन सप्तपुरियों में से एक पावन नगरी इस समय ‘जय जगन्नाथ’ के उद्घोष से गूंज रही है। हर साल की तरह इस बार भी आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि पर भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विशाल रथों पर सवार होकर अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर (Gundicha Temple) के लिए निकल चुके हैं।
इस विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा (Jagannath Rath Yatra 2026) में हर साल लाखों श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं, क्योंकि मान्यता है कि इन रथों को छूने या खींचने मात्र से जीवन के समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिन तीन रथों पर भगवान सवार होते हैं, उनके निर्माण से लेकर उनकी बनावट में कई ऐसे रहस्य और राज छिपे हैं, जो हैरान कर देने वाले हैं? आइए जानते हैं इन रथों की ए टू जेड अनसुनी बातें।
1. नंदीघोष: सबसे बड़ा रथ, जिसके रक्षक हैं स्वयं गरुड़ देव
रथयात्रा में सबसे पीछे चलने वाला रथ ‘सारे जगत के नाथ’ भगवान जगन्नाथ (श्री कृष्ण) का होता है। इसे नंदीघोष (Nandighosha) कहा जाता है।
- बनावट और रंग: यह रथ 44.2 फीट ऊंचा होता है और इसे सजाने के लिए लाल और पीले रंग के कपड़ों का इस्तेमाल किया जाता है।
- पहियों का राज: इस विशाल रथ में 16 पहिए होते हैं, जो धर्म और विजय का प्रतीक माने जाते हैं।
- सारथी और घोड़े: भगवान जगन्नाथ के रथ के सारथी का नाम ‘दारुक’ है और इसके रक्षक स्वयं पक्षीराज गरुड़ देव हैं। इस रथ को खींचने वाले चार सफेद घोड़ों के नाम शंख, बलाहक, श्वेत और हरिदश्व हैं। इसके ऊपर ‘त्रिलोक्यमोहिनी’ ध्वज लहराता है।
2. तालध्वज: सबसे आगे चलने वाला बल और शक्ति का प्रतीक
पुरी की रथयात्रा में सबसे आगे भगवान जगन्नाथ के बड़े भाई बलभद्र जी का रथ चलता है, जिसे तालध्वज (Taladhwaja) नाम से जाना जाता है।
- ऊंचाई और रंग: यह रथ लगभग 44 फीट ऊंचा होता है और इसे लाल व हरे रंग के कपड़ों से सजाया जाता है।
- पहिए और बनावट: इस रथ में 14 पहिए होते हैं। इस रथ को बनाने में विशेष रूप से 763 लकड़ियों के टुकड़ों का प्रयोग किया जाता है।
- विशेषता: यह रथ बल और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसमें नंद और सुनंद नाम के दो द्वारपाल होते हैं, जबकि 9 सहायक देवता और 7 ऋषि इस रथ में निवास करते हैं।
3. दर्पदलन: जहाँ स्वयं ‘अर्जुन’ बनते हैं सुभद्रा के सारथी
दोनों भाइयों के रथों के ठीक बीच में उनकी लाडली बहन देवी सुभद्रा का रथ चलता है। इस रथ को दर्पदलन, देवदलन या पद्मध्वज (Darpadalan) कहा जाता है। यह रथ अहंकार के दमन का प्रतीक है।
- पहिए और रंग: लाल और काले (या गहरे नीले) रंग के कपड़ों से सुसज्जित इस रथ की ऊंचाई 43 फीट होती है और इसमें 12 पहिए होते हैं।
- सारथी का अनोखा रहस्य: देवी सुभद्रा के रथ के सारथी कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि स्वयं उनके पति महाभारत के महानायक अर्जुन होते हैं।
- रक्षक और घोड़े: इस रथ की रक्षक स्वयं माता जयदुर्गा हैं और द्वारपाल के रूप में गंगा व यमुना नदी विराजमान रहती हैं। इसे रोचिका, मोचिका, जीता और अपराजिता नाम के चार लाल रंग के घोड़े खींचते हैं।
सरस्वती पूजा से शुरू होती है तैयारी, 59 दिनों की कड़ी मेहनत
इन भव्य रथों का निर्माण महापथ ‘बड़-दांड़’ पर किया जाता है। इनके निर्माण का गणित भी बेहद अनोखा है:
- इन तीनों रथों को बनाने के लिए 2 साल पहले से ही दासापल्ला और बानापुर के जंगलों से ‘साल’ और ‘सखुआ’ की लकड़ी के 1072 टुकड़े जुटाए जाते हैं।
- रथ बनाने का यह पवित्र कार्य रथोत्सव से ठीक 5 महीने पहले सरस्वती पूजा के दिन से शुरू होता है।
- सैकड़ों कुशल शिल्पकार लगातार 53 से 59 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद बिना किसी आधुनिक मशीन के इन भव्य रथों को तैयार करते हैं।
रथ खींचने का क्या है धार्मिक महत्व?
सनातन परंपरा में जगन्नाथ रथयात्रा के दौरान रथ खींचने को महापुण्य का काम माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, जो भी श्रद्धालु सच्ची श्रद्धा के साथ हरि नाम का संकीर्तन करते हुए इन रथों को खींचता है, उसे 100 अश्वमेध यज्ञ करने के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है। यह रथयात्रा पूरे 9 दिनों तक चलती है, और भगवान की मुख्य मंदिर में वापसी को ‘बहुदा यात्रा’ (Bahuda Yatra) कहा जाता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. https://indianpresshouse.com/ इसकी पुष्टि नहीं करता है.)