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प्रेग्नेंसी कब हो जाती है हाई-रिस्क? उम्र ही नहीं, ये वजहें भी बढ़ाती हैं खतरा; जानिए किन महिलाओं को चाहिए Extra Monitoring

लखनऊ: हर प्रेग्नेंसी एक जैसी नहीं होती। कुछ महिलाओं में उम्र या पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के कारण गर्भावस्था को हाई-रिस्क माना जा सकता है। हालांकि, हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का मतलब यह नहीं है कि महिला या बच्चे के साथ कोई बड़ी परेशानी होना तय है। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि मां और बच्चे की सेहत पर सामान्य से ज्यादा सावधानी और नियमित निगरानी की जरूरत होती है।

गोरखपुर के रीजेंसी हॉस्पिटल की प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. सौम्या के मुताबिक, अतिरिक्त निगरानी का मकसद किसी संभावित समस्या की समय रहते पहचान करना और जरूरत पड़ने पर सही इलाज या डिलीवरी की योजना बनाना है।

प्रेग्नेंसी कब मानी जाती है हाई-रिस्क?

उम्र या पहले से मौजूद कुछ स्वास्थ्य समस्याएं प्रेग्नेंसी को हाई-रिस्क बना सकती हैं। इनमें हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और ऑटोइम्यून बीमारियां शामिल हैं। हालांकि, केवल उम्र के आधार पर किसी प्रेग्नेंसी को खतरनाक नहीं माना जाता है।

कई बार महिला को गर्भधारण के समय कोई बड़ी स्वास्थ्य समस्या नहीं होती, लेकिन प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या प्री-एक्लेम्पसिया जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं। ऐसी स्थिति में अतिरिक्त निगरानी की जरूरत पड़ सकती है।

ट्विन्स प्रेग्नेंसी में क्यों बढ़ जाती है मॉनिटरिंग?

ट्विन्स या इससे ज्यादा बच्चों की प्रेग्नेंसी में मां और बच्चों दोनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसलिए ऐसी गर्भावस्था में डॉक्टर बच्चे की ग्रोथ, प्लेसेंटा और ब्लड फ्लो के साथ-साथ मां के ब्लड प्रेशर जैसी चीजों पर नियमित नजर रखते हैं।

मल्टीपल प्रेग्नेंसी में आमतौर पर सामान्य प्रेग्नेंसी की तुलना में ज्यादा मॉनिटरिंग की जरूरत होती है।

हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी में कैसे होती है एक्स्ट्रा मॉनिटरिंग?

हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी में जांच कितनी बार और किस समय होगी, यह महिला की स्थिति पर निर्भर करता है। डॉक्टर जरूरत के अनुसार ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर की नियमित जांच करा सकते हैं।

इसके अलावा ब्लड टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और जरूरत पड़ने पर बच्चे की हार्टबीट और ग्रोथ की भी निगरानी की जा सकती है। इन जांचों का मकसद मां और बच्चे में किसी संभावित समस्या का समय रहते पता लगाना होता है।

हाई-रिस्क सुनकर घबराने की जरूरत नहीं

हाई-रिस्क शब्द सुनकर घबराने के बजाय इसे अतिरिक्त सावधानी के संकेत के तौर पर समझना चाहिए। समय पर प्रेग्नेंसी की जांच कराना, डॉक्टर की सलाह का पालन करना और बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाएं बंद न करना जरूरी है।

ब्लड प्रेशर या ब्लड शुगर जैसी समस्याएं हैं तो उन्हें नियंत्रित रखना भी महत्वपूर्ण है। तेज सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना, अचानक ज्यादा सूजन, ब्लीडिंग, पेट में तेज दर्द या बच्चे की मूवमेंट कम महसूस होने जैसे असामान्य लक्षण नजर आएं तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

समय पर समस्या की पहचान और नियमित मॉनिटरिंग से प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली कई जटिलताओं को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

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