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क्या है मलबे का भूगोल और “Yellow Line”! जहाँ गाज़ा की ज़िंदगी और मौत का फैसला एक लकीर करती है

गाज़ा में महीनों से चल रही जंग ने न सिर्फ़ इमारतें गिराईं, बल्कि पूरे इलाके का नक्शा बदल दिया है। आजकल यहाँ के लोकल लोगों के बीच एक नया और डरावना टर्म चर्चा में है- ‘द येलो लाइन’ “The Yellow Line”।

यह कोई ऐसी बॉर्डर लाइन नहीं है जो आपको गूगल मैप्स पर दिख जाएगी। असल में यह सैन्य घेराबंदी, सुरक्षा चौकियों और ‘नो-गो ज़ोन्स’ को मिलाकर बनाई गई एक इनविज़िबल बाउंड्री है। सीधे शब्दों में कहें, तो इस लाइन को क्रॉस करने का मतलब है- ऑन-द-स्पॉट मौत आपको मौत के घाट उतार दिया जाएगा।

इस ‘येलो लाइन’ के आने के बाद गाज़ा में लाइफ एसी है जहाँ उम्मीदें रोज़ दम तोड़ रही हैं जिसके लिए एक इंग्लिश वर्ड इस्तेमाल किया जा रहा है “कंटीन्यूअस सर्वाइवल मोड”

जब जियोग्राफी ही विलेन बन जाए


गाज़ा के अंदर इस नई बाउंड्री के खिंचने से लाखों लोग, जो पहले से ही बेघर थे, अब बेहद छोटे और अमानवीय इलाकों में सिमटने को मजबूर हैं। लोकल लोगों का कहना है कि यह लाइन एक इनविजिबल जेल जैसी है। इसने लोगों को उनके खेतों, बिजनेस के बचे-कुचे साधनों और यहाँ तक कि उनके अपने टूटे हुए घरों के मलबे तक जाने से भी रोक दिया है।

जो लोग पहले ही 3 से 4 बार अपना घर बदल चुके थे, उन्हें इस नई लाइन की वजह से एक बार फिर अपने टेंट उखाड़कर भागना पड़ा है। अब वे ऐसी जगहों पर हैं जहाँ पीने का पानी तक नसीब नहीं है।

रोज़मर्रा का स्ट्रगल


एक हालिया मीडिया रिपोर्ट के अनुसार,इस नई व्यवस्था ने गाज़ा में आ रही ह्यूमैनिटेरियन एड की कमर तोड़ दी है। ज़मीनी हालात ऐसी है की कुछ कहा नही जा सकता।

भुखमरी की कगार पर: गाज़ा में मदद लेकर आ रहे ट्रकों के लिए इस ‘येलो लाइन’ को पार करना एक खतरनाक नाइटमेयर बन चुका है। कड़े मिलिट्री कट्स और चेकिंग की वजह से ग्राउंड पर खाने-पीने के सामान की सप्लाई पूरी तरह ठप हो गई है, जिससे इस ज़ोन में भुखमरी जैसे बदतर हालात पैदा हो रहे हैं।

मेडिकल इमरजेंसी: इस इनविजिबल दायरे के अंदर जितने भी हॉस्पिटल्स बचे हैं, वो अब केवल नाम के रह गए हैं और सिर्फ फर्स्ट-एड सेंटर की तरह काम कर रहे हैं। वहा के डॉक्टरों के पास बुनियादी मेडिकल सप्लाई तक नहीं है, जिसके कारण गंभीर रूप से घायलों के इलाज के लिए ज़रूरी लाइफ-सेविंग ड्रग्स पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं।

धमाकों के साये में भविष्य: यहाँ के बच्चों के लिए अब स्कूल जाना या खेल के मैदानों में दौड़ना एक सपना और बीती बात जैसा हो चुका है। इस डेंजर ज़ोन में कैद होकर रह गए बच्चों की पूरी दुनिया अब सिर्फ सायरन की गूँज और रॉकेट धमाकों की खौफनाक आवाज़ों के बीच सिमट कर रह गई है।

“हम सिर्फ सांस ले रहे हैं, जी नहीं रहे”


रिपोर्ट के मुताबिक खान यूनिस इलाके से डिसप्लेस्ड होकर एक टेंपरेरी टेंट में रह रहे लोगो से बात किया तो उन्होंने अपना दर्द बया करते हुए बताया की “पहले हमें आसमान से होने वाले हमलों का डर रहता था, लेकिन अब हमें डर लगता है कि कहीं गलती से हमारा पैर इस ‘येलो लाइन’ के पार न चला जाए। हमारे लिए ‘सेफ्टी’ जैसा शब्द अब बेमतलब हो चुका है। हमारा डेली रूटीन बस इतना है की सुबह उठो, पानी ढूंढो और रात को ज़िंदा सो जाने की दुआ करो।”

एक अनसुलझा मानवीय संकट


रिपोर्ट्स में बताया गया है की इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइजेशन्स की तमाम कोशिशों और अपीलों के बावजूद, ग्राउंड पर सिचुएशन बद से बदतर होती जा रही है। ‘येलो लाइन’ के बाद का गाज़ा इस बात का सबूत है कि आज के दौर में युद्ध सिर्फ मिसाइलों से नहीं, बल्कि सीमाओं और भूगोल को हथियार बनाकर भी लड़ा जाता है। यहाँ आम इंसान सिर्फ एक ‘नंबर’ बनकर रह गए हैं, जिनकी लाइफ इस अदृश्य लकीर के रहमत पर है।

Chaturvedi Shruti V.

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