नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की दुनिया में अमेरिका और चीन के बीच मुकाबला अब सिर्फ बेहतर चैटबॉट या तेज चिप बनाने तक सीमित नहीं रह गया है। इस दौड़ में अब बिजली, डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स, निवेश और औद्योगिक ढांचा भी निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। अमेरिका के पास बड़ी टेक कंपनियों, उन्नत AI मॉडल और निजी निवेश की मजबूत ताकत है, जबकि चीन AI को अपनी पूरी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक व्यवस्था में फैलाने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में सवाल है कि आने वाले वर्षों में AI की अगली महाशक्ति कौन बनेगा?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत में भी AI का महत्व बढ़ा है। यह तकनीक अब कारोबार और अर्थव्यवस्था के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, सैन्य क्षमताओं और वैश्विक प्रभाव से जुड़ गई है। दोनों देश AI के क्षेत्र में एक-दूसरे से आगे निकलना चाहते हैं, लेकिन अनियंत्रित प्रतिस्पर्धा से पैदा होने वाले जोखिमों को लेकर संवाद की जरूरत भी महसूस कर रहे हैं।
AI मॉडल की दौड़ में अमेरिका आगे, लेकिन चीन ने घटाई दूरी
कुछ साल पहले तक AI के क्षेत्र में अमेरिका की बढ़त काफी बड़ी मानी जाती थी। OpenAI, Google, Anthropic, Meta, Microsoft, Amazon और Nvidia जैसी कंपनियों ने मॉडल, चिप और क्लाउड कंप्यूटिंग के क्षेत्र में अमेरिकी तकनीकी ताकत को मजबूत किया है। हालांकि, चीन की प्रगति ने इस तस्वीर को बदलना शुरू कर दिया है।
स्टैनफोर्ड AI इंडेक्स 2026 के मुताबिक, 2025 में अमेरिकी संस्थानों ने 59 उल्लेखनीय AI मॉडल विकसित किए, जबकि चीन की ओर से ऐसे 35 मॉडल पेश किए गए। लेकिन केवल मॉडल की संख्या से दोनों देशों के बीच तकनीकी अंतर का पूरा अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2025 में DeepSeek-R1 ने कुछ मूल्यांकनों में शीर्ष अमेरिकी मॉडल के बराबर प्रदर्शन किया। मार्च 2026 तक शीर्ष अमेरिकी और चीनी मॉडलों के बीच मापा गया प्रदर्शन अंतर घटकर 2.7 प्रतिशत रह गया था। यह संकेत देता है कि AI मॉडल विकसित करने के मामले में चीन तेजी से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।
फिर भी, मॉडल की गुणवत्ता, उन्हें बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने की क्षमता और वास्तविक दुनिया में उनके प्रदर्शन को अलग-अलग देखना जरूरी है। अमेरिका के पास अब भी उन्नत AI तकनीक और बड़े निजी निवेश का मजबूत आधार है, जबकि चीन इस अंतर को कम करने में जुटा है।
निवेश में अमेरिका की बड़ी बढ़त, चीन का सरकारी फंडिंग मॉडल अलग
AI की दौड़ में पूंजी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। स्टैनफोर्ड AI इंडेक्स के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में अमेरिका में निजी AI निवेश लगभग 27.30 लाख करोड़ रुपये रहा। इसके मुकाबले चीन में निजी निवेश करीब 1.18 लाख करोड़ रुपये था। यानी इस श्रेणी में अमेरिकी निवेश चीन से लगभग 23 गुना अधिक था।
अमेरिका में जनरेटिव AI के क्षेत्र में निजी निवेश भी लगभग 15.62 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। इसी साल अमेरिका में 1,953 नई वित्तपोषित AI कंपनियां थीं, जबकि चीन में इनकी संख्या 161 बताई गई।
हालांकि, इन आंकड़ों से चीन की AI अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। वहां सरकार समर्थित निवेश और औद्योगिक नीतियों की भी बड़ी भूमिका है। स्टैनफोर्ड के अनुसार, चीनी सरकारी मार्गदर्शन वाले फंडों ने 2000 से 2023 के बीच AI कंपनियों में अनुमानित 17.57 लाख करोड़ रुपये लगाए थे।
इसलिए अमेरिका और चीन की तुलना करते समय केवल निजी निवेश को आधार बनाना पर्याप्त नहीं होगा। अमेरिका का मॉडल बड़े निजी निवेश और टेक कंपनियों पर अधिक निर्भर है, जबकि चीन सरकारी फंडिंग, औद्योगिक रणनीति और निजी कंपनियों को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
AI की असली ताकत सिर्फ चिप नहीं, बिजली और डेटा सेंटर भी
AI मॉडल को विकसित करने और बड़े पैमाने पर चलाने के लिए शक्तिशाली प्रोसेसर के साथ विशाल डेटा सेंटर, बिजली, कूलिंग सिस्टम और हाई-स्पीड नेटवर्क की जरूरत होती है। यही वजह है कि इस तकनीकी मुकाबले में अब बुनियादी ढांचे का महत्व तेजी से बढ़ रहा है।
गोल्डमैन सैक्स के अनुमान के मुताबिक, चीन के डेटा सेंटरों की बिजली क्षमता 2025 में लगभग 30 गीगावॉट तक पहुंचने की दिशा में थी। इसी दौरान चीनी क्लाउड सेवा प्रदाताओं के पूंजीगत खर्च में करीब 65 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया था।
शीर्ष चीनी इंटरनेट कंपनियों के 2026 में AI से जुड़े बुनियादी ढांचे पर 6.68 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने का अनुमान भी सामने आया था। हालांकि, यह खर्च उस समय अमेरिकी हाइपरस्केलर कंपनियों के अनुमानित निवेश का केवल 15 से 20 प्रतिशत बताया गया था।
रॉयटर्स और ब्लूमबर्ग की रिपोर्टों के मुताबिक, चीन करीब 2 ट्रिलियन युआन यानी लगभग 28.2 लाख करोड़ रुपये की लागत वाला पांच वर्षीय राष्ट्रीय डेटा सेंटर कार्यक्रम तैयार कर रहा था। प्रस्तावित योजना में अलग-अलग कंप्यूटिंग केंद्रों को जोड़ने और महत्वपूर्ण तकनीकों में कम से कम 80 प्रतिशत घरेलू हार्डवेयर इस्तेमाल करने का लक्ष्य बताया गया था।
यह योजना विकास के चरण में बताई गई थी, इसलिए इसे पूरा हो चुका निवेश नहीं माना जा सकता। फिर भी, इससे चीन की उस रणनीति का संकेत मिलता है, जिसके तहत वह AI के लिए जरूरी तकनीकी ढांचे को देश के भीतर मजबूत करना चाहता है।
बिजली की क्षमता में चीन की बढ़त क्यों है अहम?
AI कंप्यूटिंग की मांग बढ़ने के साथ बिजली की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। बड़ी संख्या में प्रोसेसर चलाने वाले डेटा सेंटरों को लगातार बिजली की जरूरत होती है। ऐसे में पर्याप्त उत्पादन क्षमता और बिजली नेटवर्क AI के विस्तार को प्रभावित कर सकते हैं।
ब्लूमबर्गNEF के अनुमानों के मुताबिक, चीन अगले पांच वर्षों में 3.4 टेरावॉट से अधिक बिजली उत्पादन क्षमता जोड़ सकता है। यह अनुमानित अमेरिकी बढ़ोतरी से लगभग छह गुना बताया गया था। वर्ष 2025 में चीन ने करीब 543 गीगावॉट नई बिजली उत्पादन क्षमता जोड़ी थी।
अमेरिका भी डेटा सेंटर और बिजली व्यवस्था के विस्तार पर काम कर रहा है, लेकिन वहां बिजली कनेक्शन, ट्रांसफॉर्मर, मंजूरी और नई उत्पादन क्षमता विकसित करने से जुड़ी चुनौतियां सामने आ रही हैं।
ब्लूमबर्गNEF ने जुलाई 2026 में अनुमान लगाया था कि अमेरिका में डेटा सेंटरों की स्थापित क्षमता 2030 तक 118 गीगावॉट और 2035 तक 194 गीगावॉट पहुंच सकती है। गोल्डमैन सैक्स का अनुमान था कि अमेरिकी डेटा सेंटरों की बिजली मांग 2025 के 31 गीगावॉट से बढ़कर 2027 में 66 गीगावॉट हो सकती है।
इन अनुमानों से स्पष्ट होता है कि AI की अगली प्रतिस्पर्धा केवल चिप बनाने की क्षमता पर निर्भर नहीं करेगी। तकनीक को लगातार चलाने के लिए पर्याप्त बिजली और मजबूत बुनियादी ढांचा भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
चीन की रणनीति: AI को फैक्ट्रियों और रोबोटिक्स तक पहुंचाना
अमेरिका का ध्यान लंबे समय से सबसे उन्नत AI मॉडल बनाने पर रहा है। दूसरी ओर, चीन AI को उद्योग, विनिर्माण और ऑटोमेशन में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने की क्षमता विकसित कर रहा है।
इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रोबोटिक्स के अनुसार, 2024 में दुनिया में लगाए गए नए औद्योगिक रोबोटों में 54 प्रतिशत चीन में स्थापित किए गए। उस साल चीन में करीब 2.95 लाख औद्योगिक रोबोट लगाए गए और वहां इस्तेमाल हो रहे औद्योगिक रोबोटों की कुल संख्या 20 लाख से अधिक हो गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, पहली बार चीनी रोबोट निर्माताओं ने अपने घरेलू बाजार में विदेशी आपूर्तिकर्ताओं को पीछे छोड़ दिया। हालांकि, औद्योगिक रोबोटों की स्थापना को सीधे AI के इस्तेमाल के बराबर नहीं माना जा सकता, लेकिन यह चीन की विनिर्माण क्षमता और ऑटोमेशन के विस्तार का महत्वपूर्ण संकेत है।
चीन का ‘ईस्ट डेटा, वेस्ट कंप्यूटिंग’ कार्यक्रम भी इसी दिशा में उठाया गया कदम है। इसके तहत पूर्वी क्षेत्रों की डिजिटल मांग को पश्चिमी प्रांतों की जमीन, ऊर्जा और कंप्यूटिंग सुविधाओं से जोड़ने की योजना बनाई जा रही है। देश के आठ राष्ट्रीय कंप्यूटिंग केंद्रों में से पांच पश्चिमी क्षेत्रों में बताए गए हैं।
इस रणनीति का उद्देश्य AI और डेटा सेवाओं के लिए देशभर में जुड़ा हुआ कंप्यूटिंग नेटवर्क तैयार करना है। चीन AI को केवल सॉफ्टवेयर सेवा नहीं, बल्कि बिजली, परिवहन और दूसरे राष्ट्रीय बुनियादी ढांचों की तरह महत्वपूर्ण व्यवस्था के रूप में विकसित करना चाहता है।
अमेरिका के चिप प्रतिबंधों से चीन की रणनीति पर क्या असर पड़ा?
अमेरिका ने 2022 से चीन को उन्नत AI चिप और सेमीकंडक्टर निर्माण तकनीक की आपूर्ति सीमित करने के लिए कई निर्यात नियंत्रण लागू किए हैं। दिसंबर 2024 में अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने सेमीकंडक्टर निर्माण उपकरणों की 24 श्रेणियों, चिप विकास से जुड़े सॉफ्टवेयर की तीन श्रेणियों और हाई बैंडविड्थ मेमोरी यानी HBM पर नए नियंत्रण लगाए थे। इसी दौरान 140 चीनी संस्थाओं को अमेरिकी एंटिटी लिस्ट में भी जोड़ा गया था।
अमेरिकी सरकार ने इन कदमों का उद्देश्य चीन की उन्नत सेमीकंडक्टर और सैन्य AI क्षमताओं को सीमित करना बताया था। लेकिन इन प्रतिबंधों का एक दूसरा संभावित असर भी है। विदेशी तकनीक तक पहुंच सीमित होने पर चीन के लिए अपने घरेलू चिप उद्योग को मजबूत करना और अधिक जरूरी हो जाता है।
Huawei, SMIC और अन्य चीनी कंपनियां इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। हालांकि, घरेलू चिप विकसित कर लेना और सबसे उन्नत विदेशी चिपों के बराबर प्रदर्शन, उत्पादन और दक्षता हासिल करना अलग-अलग चुनौतियां हैं।
जून 2026 में Meituan ने दावा किया था कि उसके LongCat-2.0 मॉडल को 50,000 चीन में बने प्रोसेसर वाले क्लस्टर पर प्रशिक्षित किया गया। कंपनी के मुताबिक, यह ट्रिलियन-पैरामीटर स्तर पर पूरी तरह घरेलू प्रोसेसर इस्तेमाल करने वाला पहला सिस्टम था। हालांकि, चिप आपूर्तिकर्ता की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई थी, इसलिए इस दावे के तकनीकी विवरणों को कंपनी के बयान के रूप में ही देखना चाहिए।
सितंबर में Alibaba ने अपना नया Zhenwu V900 AI चिप पेश किया और कहा कि वह 2032 तक अपनी क्लाउड डेटा सेंटर क्षमता 20 गीगावॉट से अधिक करने का लक्ष्य रखता है। ये कदम चीन के घरेलू AI हार्डवेयर और कंप्यूटिंग ढांचे को मजबूत करने की कोशिशों को दिखाते हैं।
AI की जंग में राष्ट्रीय सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा
अमेरिका और चीन के बीच AI का मुकाबला केवल कारोबार या तकनीकी उत्पादों तक सीमित नहीं है। AI का इस्तेमाल सैन्य खुफिया, साइबर सुरक्षा, ड्रोन, निगरानी, स्वचालित प्रणालियों और वैज्ञानिक अनुसंधान में भी बढ़ रहा है। इस वजह से दोनों देशों के लिए AI में बढ़त हासिल करना रणनीतिक महत्व रखता है।
अमेरिका अपने AI इकोसिस्टम को दूसरे देशों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। उसकी रणनीति में चिप, सर्वर, क्लाउड सेवाएं, डेटा सिस्टम, साइबर सुरक्षा और AI अनुप्रयोगों को एक साथ उपलब्ध कराना शामिल है।
दूसरी ओर, चीन भी घरेलू हार्डवेयर, AI मॉडल और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए अपनी तकनीकी निर्भरता कम करने और वैश्विक बाजारों में जगह बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
आने वाले वर्षों में एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका के देश AI इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करेंगे। ऐसे में वे किस देश की तकनीक, क्लाउड सेवाओं और हार्डवेयर को अपनाते हैं, यह वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकता है।
ट्रंप-शी की AI बातचीत के पीछे क्या है बड़ा सवाल?
अमेरिका और चीन के बीच AI पर संवाद का एक उद्देश्य तकनीक से जुड़े गंभीर जोखिमों को समझना और संभावित संकटों के दौरान संपर्क बनाए रखना भी है। सितंबर 2026 की वार्ता से पहले दोनों देशों के अधिकारियों के बीच AI पर अलग बातचीत शुरू होने की जानकारी सामने आई थी। अमेरिका ने गंभीर AI घटनाओं की स्थिति में एक-दूसरे को सूचना देने की व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव भी रखा था।
मई 2026 में ट्रंप की चीन यात्रा के बाद बीजिंग ने कहा था कि दोनों नेताओं के बीच AI पर रचनात्मक बातचीत हुई और सरकार-से-सरकार संवाद शुरू करने पर सहमति बनी। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इससे कोई व्यापक AI संधि, चिप साझा करने का समझौता या बड़ा तकनीकी समझौता नहीं हुआ था।
इस पूरी प्रतिस्पर्धा का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि दोनों देश AI में एक-दूसरे से आगे निकलना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह भी समझना है कि बेकाबू तकनीकी प्रतिस्पर्धा साइबर सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
फिलहाल AI की अगली महाशक्ति कौन बनेगा, इसका निश्चित जवाब देना जल्दबाजी होगी। अमेरिका के पास उन्नत मॉडल, बड़ी टेक कंपनियां और निजी निवेश की मजबूत बढ़त है। चीन बिजली, औद्योगिक क्षमता, रोबोटिक्स और घरेलू तकनीकी ढांचे को तेजी से विस्तार देने की कोशिश कर रहा है। आने वाले वर्षों में मुकाबले का फैसला इस बात से भी होगा कि कौन बेहतर AI बनाने के साथ उसे बड़े पैमाने पर, कम लागत में और भरोसेमंद तरीके से दुनिया तक पहुंचा पाता है।