सरायकेला-खरसावां: हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है। 25 अक्टूबर, रविवार को सरायकेला-खरसावां समेत कई क्षेत्रों में यह पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा, चंद्रमा के दर्शन और रात में खुले आसमान के नीचे खीर रखने की परंपरा है। इस बार 30 साल बाद दुर्लभ शुभ संयोग बनने की चर्चा ने भी शरद पूर्णिमा को खास बना दिया है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होकर अमृत जैसी शीतल किरणें बरसाता है।
शरद पूर्णिमा पर लक्ष्मी-नारायण की पूजा क्यों होती है?
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। हिंदू मान्यताओं में इस दिन को बेहद शुभ माना गया है। ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और भगवान विष्णु की आराधना से परिवार में खुशहाली बनी रहती है।
इस अवसर पर कई मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। घरों में भी मां लक्ष्मी की पूजा के साथ सत्यनारायण व्रत कथा का आयोजन किया जाता है। कई श्रद्धालु धन-समृद्धि की कामना से व्रत रखते हैं और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद भोजन ग्रहण करते हैं।
30 साल बाद दुर्लभ संयोग की क्यों हो रही चर्चा?
इस बार शरद पूर्णिमा पर 30 साल बाद दुर्लभ शुभ संयोग बनने की चर्चा हो रही है। हालांकि, इस संयोग से जुड़े विशिष्ट ज्योतिषीय योगों का विवरण उपलब्ध जानकारी में नहीं दिया गया है। धार्मिक दृष्टि से शरद पूर्णिमा को हर साल ही खास माना जाता है, लेकिन शुभ संयोग की चर्चा के कारण इस बार श्रद्धालुओं की दिलचस्पी और बढ़ गई है।
मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है। इसीलिए इस रात चंद्र दर्शन, पूजा-पाठ और जागरण का विशेष महत्व बताया जाता है।
आसमान में खीर रखने की क्या है परंपरा?
शरद पूर्णिमा पर खीर बनाकर उसे रात में खुले आसमान के नीचे रखने की परंपरा काफी प्रचलित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस रात चंद्रमा की किरणों में अमृत जैसा गुण होता है। माना जाता है कि चांदनी में रखी खीर सुबह प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से लाभ मिलता है।
कई परिवार रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पूजा करते हैं और खीर का भोग लगाते हैं। इसके बाद सुबह खीर को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और शरद पूर्णिमा के प्रमुख धार्मिक रीति-रिवाजों में शामिल है।
क्या चांदनी में सचमुच होते हैं औषधीय गुण?
धार्मिक मान्यताओं में शरद पूर्णिमा की चांदनी को औषधीय गुणों से युक्त बताया गया है। ऐसी आस्था है कि चंद्रमा की शीतल किरणें शरीर को लाभ पहुंचाती हैं और चांदनी में रखी खीर स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होती है।
हालांकि, चांदनी में खीर रखने से उसके औषधीय गुण बढ़ने, रोगों का इलाज होने या रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने के दावों की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी हैं। इसलिए इस परंपरा को धार्मिक आस्था के रूप में देखना चाहिए, किसी बीमारी के उपचार का प्रमाणित विकल्प नहीं मानना चाहिए।
भगवान कृष्ण के महारास से भी जुड़ी है मान्यता
शरद पूर्णिमा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी रात भगवान कृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया था। इसी वजह से वैष्णव परंपरा में भी इस पूर्णिमा का विशेष महत्व है।
इस दिन कई श्रद्धालु रात में जागरण करते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और भगवान की आराधना में समय बिताते हैं। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक पूजा और व्रत करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए भी कई लोग इस दिन विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
शरद पूर्णिमा पर किन परंपराओं का किया जाता है पालन?
शरद पूर्णिमा पर श्रद्धालु अपनी पारिवारिक और धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा करते हैं। आम तौर पर इस दिन ये रीति-रिवाज प्रचलित हैं:
- मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करना।
- सत्यनारायण व्रत कथा का आयोजन करना।
- रात में चंद्रमा को अर्घ्य देना।
- खीर बनाकर चंद्रमा की रोशनी में रखना और सुबह प्रसाद के रूप में ग्रहण करना।
- व्रत रखना, सात्विक भोजन करना और रात में भजन-कीर्तन या जागरण करना।
शरद पूर्णिमा आस्था, पूजा-पाठ और पारंपरिक रीति-रिवाजों से जुड़ा पर्व है। चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने से लेकर मां लक्ष्मी की आराधना तक, इस दिन की परंपराएं आज भी लोगों के धार्मिक जीवन का अहम हिस्सा बनी हुई हैं।