वॉशिंगटन/नई दिल्ली।अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जेनेरिक दवाओं के आयात पर सख्त टैरिफ नीति का ऐलान किया है, जो आने वाले वर्षों में वैश्विक फार्मा बाजार, खासकर भारत के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है। इस नई नीति के तहत 2028 के बाद टैरिफ 100% से बढ़ाकर 200% तक किया जाएगा।
क्या है नया टैरिफ प्लान?
ट्रंप ने अपने सोशल प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर बताया कि यह नीति चरणबद्ध तरीके से लागू होगी-
- 1 अगस्त 2026 से 2028 तक: जेनेरिक दवाओं पर 0% टैरिफ
- 2028-2029 (तीसरा साल): टैरिफ बढ़कर 100%
- इसके बाद: टैरिफ 200% तक पहुंचेगा
ट्रंप का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरिंग को अमेरिका में वापस लाना और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है।
ट्रंप का तर्क क्या है?
ट्रंप के मुताबिक
- जो कंपनियां तय समय में अमेरिका में प्लांट नहीं लगाएंगी, उन पर जुर्माना लगाया जाएगा
- यह नीति राष्ट्रीय सुरक्षा और हेल्थ सेक्टर की मजबूती के लिए जरूरी है
- पेटेंटेड और ब्रांडेड दवाओं पर मौजूदा नीति में कोई बदलाव नहीं होगा
भारत पर कितना पड़ेगा असर?
भारत को “दुनिया की फार्मेसी” कहा जाता है, और अमेरिका इसका सबसे बड़ा बाजार है।
प्रमुख आंकड़े
- अमेरिका में जेनेरिक दवाओं के वॉल्यूम का करीब 40% हिस्सा भारत से आता है
- FY 2024-25 में भारत ने अमेरिका को 9.7 बिलियन डॉलर की दवाएं निर्यात कीं
- यह भारत के कुल फार्मा एक्सपोर्ट (25.8 बिलियन डॉलर) का लगभग 38% है
विशेष रूप से हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, कैंसर, डिप्रेशन और इंफेक्शन जैसी बीमारियों के इलाज में भारतीय जेनेरिक दवाओं की बड़ी भूमिका है।
कौन सी कंपनियां होंगी प्रभावित?
अमेरिकी बाजार में भारतीय कंपनियों की मजबूत मौजूदगी है।
- ग्लेनमार्क फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड
- ल्यूपिन लिमिटेड
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2024 में अमेरिका में गर्भनिरोधक गोलियों के लगभग 65% प्रिस्क्रिप्शन इन्हीं कंपनियों की दवाओं से जुड़े थे।
ट्रेड एग्रीमेंट के बावजूद अनिश्चितता
फरवरी 2026 में भारत और अमेरिका के बीच हुए ट्रेड एग्रीमेंट में जेनेरिक दवाओं पर बातचीत के जरिए समाधान की बात कही गई थी। लेकिन ट्रंप की नई टैरिफ नीति से यह स्पष्ट नहीं है कि भारतीय कंपनियों को कितनी राहत मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय कंपनियां अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने पर विचार कर सकती हैं
- वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव देखने को मिल सकता है
- दवाओं की कीमतें बढ़ने से अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी असर पड़ सकता है