कन्नूर: भारत में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जिनकी परंपराएं और मान्यताएं उन्हें बाकी धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती हैं। केरल के कन्नूर जिले में स्थित कोट्टियूर शिव मंदिर भी ऐसा ही एक अनोखा तीर्थ है, जो साल के अधिकांश समय बंद रहता है और केवल 28 दिनों के लिए श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोला जाता है। अपनी विशिष्ट परंपरा और धार्मिक महत्व के कारण इसे दक्षिण भारत का काशी भी कहा जाता है।
शांत पहाड़ियों, घने जंगलों और बावली नदी के किनारे स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का केंद्र माना जाता है। यहां हर वर्ष हजारों भक्त विशेष धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने पहुंचते हैं।
दो भागों में बंटा है पूरा तीर्थ क्षेत्र
कोट्टियूर तीर्थ क्षेत्र बावली नदी के दोनों किनारों पर स्थित दो अलग-अलग मंदिरों से मिलकर बना है। इनमें एक अक्करे कोट्टियूर और दूसरा इक्करे कोट्टियूर कहलाता है।
अक्करे कोट्टियूर मंदिर वर्ष में केवल वैशाख महोत्सव के दौरान 28 दिनों के लिए खुलता है, जबकि बाकी समय यह पूरी तरह बंद रहता है। दूसरी ओर इक्करे कोट्टियूर मंदिर सामान्य समय में धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहता है।
दक्ष यज्ञ से जुड़ी है मंदिर की पौराणिक मान्यता
मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति भगवान शिव और माता सती के विवाह से प्रसन्न नहीं थे। कहा जाता है कि उन्होंने बिना शिव और सती को आमंत्रित किए एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया।
जब माता सती वहां पहुंचीं तो उनका अपमान किया गया। पिता के व्यवहार से आहत होकर उन्होंने योगशक्ति के माध्यम से स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया। इस घटना से क्रोधित भगवान शिव ने वीरभद्र रूप धारण कर दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया।
बाद में भगवान विष्णु और ब्रह्मा के हस्तक्षेप पर शिव शांत हुए और दक्ष को बकरी का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया। इसी कारण इस स्थान को ब्रह्मा, विष्णु और महेश की दिव्य उपस्थिति वाला पवित्र स्थल माना जाता है।
खुले आसमान के नीचे विराजते हैं महादेव
कोट्टियूर मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी संरचना है। इक्करे कोट्टियूर एक पारंपरिक मंदिर परिसर की तरह दिखाई देता है, लेकिन अक्करे कोट्टियूर पूरी तरह अलग है।
यह मंदिर किसी भव्य इमारत में नहीं, बल्कि एक जलाशय के मध्य स्थित स्वयंभू शिवलिंग के रूप में पूजित है। शिवलिंग नदी के पत्थरों से बने ऊंचे चबूतरे पर स्थापित है। यहां न तो स्थायी दीवारें हैं, न छत और न ही किसी प्रकार की धातु संरचना। पूरा परिसर खुले वातावरण में स्थापित किया जाता है।
जंगल ही बन जाता है अस्थायी मंदिर
वैशाख महोत्सव के दौरान जंगल के बीच अस्थायी रूप से मंदिर का स्वरूप तैयार किया जाता है। इसके निर्माण में बांस, लकड़ी और पत्तों जैसी प्राकृतिक सामग्री का उपयोग होता है।
श्रद्धालु यहां विशेष धार्मिक परंपरा के तहत ‘ओरापो’ नामक वस्तु भी लेकर आते हैं। बांस से निर्मित यह सामग्री धार्मिक अनुष्ठानों का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
महोत्सव समाप्त होते ही प्रकृति में विलीन हो जाता है मंदिर
मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा यह है कि 28 दिवसीय उत्सव समाप्त होने के बाद अस्थायी रूप से बनाई गई सभी संरचनाओं को हटा दिया जाता है।
इसके बाद पूरा क्षेत्र फिर से अपने प्राकृतिक स्वरूप में लौट जाता है और घना जंगल इस पवित्र स्थल को अपने भीतर समेट लेता है। अगले वर्ष वैशाख महोत्सव आने तक यह स्थान सामान्य रूप से बंद रहता है।
दक्षिण भारत का काशी क्यों कहलाता है यह धाम?
धार्मिक मान्यताओं, प्राचीन इतिहास, त्रिदेव से जुड़े पौराणिक प्रसंग और अद्वितीय पूजा पद्धति के कारण कोट्टियूर शिव मंदिर को दक्षिण भारत का काशी कहा जाता है। यहां होने वाला वार्षिक महोत्सव केरल के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है और दूर-दूर से श्रद्धालु इस दुर्लभ दर्शन के लिए पहुंचते हैं।