नई दिल्ली। हर साल 6 अगस्त को दुनिया हिरोशिमा दिवस (Hiroshima Day) के रूप में याद करती है। मानव इतिहास के सबसे भयावह अध्यायों में से एक 6 अगस्त 1945 को अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा शहर पर गिराया गया ‘लिटिल बॉय’ (Little Boy) परमाणु बम और उसके तीन दिन बाद 9 अगस्त को नागासाकी पर हुआ ‘फैट मैन’ (Fat Man) हमला। इन दो हमलों में लगभग 1.40 लाख से अधिक लोगों की जान गई।
आम तौर पर इतिहास में यही पढ़ाया और माना जाता है कि इन दो परमाणु हमलों से डरकर ही जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) में बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया था। लेकिन इतिहास के पन्नों को गहराई से टटोलें, तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। आखिर जापान के सरेंडर करने के पीछे की असली कूटनीतिक और सैन्य वजह क्या थी?
पॉट्सडैम घोषणा और जापान की रणनीतिक चूक
26 जुलाई 1945 को अमेरिका, ब्रिटेन और चीन ने पॉट्सडैम घोषणा पत्र (Potsdam Declaration) के जरिए जापान से बिना शर्त सरेंडर की मांग की थी, जिसे जापान ने ठुकरा दिया था। उस वक्त जापानी नेतृत्व के दो गुट थे—एक जो आखिरी सांस तक लड़ना चाहता था, और दूसरा जो सोवियत संघ (USSR) के माध्यम से अमेरिका के साथ शांति वार्ता की उम्मीद लगाए बैठा था।
जापान की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल यही थी कि उसने सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन को अपना मध्यस्थ मान लिया था, जबकि सोवियत संघ अंदर ही अंदर कुछ और रणनीति बना रहा था।
हिरोशिमा बमबारी के बाद भी क्यों नहीं झुका जापान?
6 अगस्त 1945 की सुबह जब अमेरिकी बी-29 विमान ‘एनोला गे’ ने हिरोशिमा को राख के ढेर में बदला, तब भी जापानी सरकार ने तुरंत हार नहीं मानी। संचार व्यवस्था ध्वस्त होने के कारण टोक्यो तक सही जानकारी देर से पहुंची।
जापान की सुप्रीम वॉर काउंसिल (Supreme War Council) को लगा कि अमेरिका के पास शायद एक ही दो ऐसे बम होंगे। सैन्य नेताओं का मानना था कि अगर अमेरिकी सेना जापान की मुख्य भूमि पर कदम रखती है, तो वे अमेरिका को भारी नुकसान पहुंचाकर बेहतर शर्तों पर बातचीत के लिए मजबूर कर देंगे।
सोवियत संघ का प्रवेश: जापान की आखिरी उम्मीद का टूटना
जापान के लिए असली रणनीतिक झटका परमाणु बम से ज्यादा 8 अगस्त 1945 को लगा, जब सोवियत संघ ने जापान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। 9 अगस्त को सोवियत सेना ने मंचूरिया में जापानी ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए।
- दोतरफा संकट: जापान अब केवल प्रशांत महासागर में अमेरिका से नहीं लड़ रहा था, बल्कि उत्तर से एक विशाल सोवियत सेना उसके दरवाजे पर खड़ी थी।
- कम्युनिस्ट कब्जे का डर: जापानी सम्राट और सेना को डर था कि सोवियत संघ पूरे जापान पर कब्जा कर उनकी राजशाही व्यवस्था को खत्म कर देगा।
इसी दिन (9 अगस्त) अमेरिका ने नागासाकी पर भी दूसरा परमाणु बम गिरा दिया।
सम्राट हिरोहितो का हस्तक्षेप और अंतिम फैसला
सैन्य परिषद में सरेंडर को लेकर जारी मतभेदों के बीच सम्राट हिरोहितो (Emperor Hirohito) ने खुद हस्तक्षेप किया। उन्होंने देश की भलाई और मानव जाति के विनाश को रोकने के लिए युद्ध खत्म करने का फैसला सुनाया।
- 15 अगस्त 1945: सम्राट हिरोहितो ने पहली बार रेडियो प्रसारण के जरिए देशवासियों को युद्ध समाप्ति की घोषणा की।
- 2 सितंबर 1945: अमेरिकी युद्धपोत ‘यूएसएस मिसौरी’ (USS Missouri) पर जापान ने औपचारिक आत्मसमर्पण पत्र पर हस्ताक्षर किए।
क्या था सरेंडर का सबसे बड़ा कारण?
इतिहासकारों के बीच आज भी इस बात पर बहस जारी है कि जापान का सरेंडर एटमी तबाही की वजह से हुआ या सोवियत संघ के युद्ध में उतरने से। ऐतिहासिक तथ्यों का विश्लेषण यही दिखाता है कि परमाणु बमों के खौफ और सोवियत संघ के अचानक हमले के दोहरे दबाव ने मिलकर जापान की बची-कुची उम्मीदों को पूरी तरह खत्म कर दिया था।