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इश्क के जज्बात को अल्फाज देने वाले जादूगर ने कभी की थी सेना की नौकरी….दौर बदल गए लेकिन आज भी आनंद बख्शी का लिखा गुनगुनाता है दिल

Chaturvedi Shruti V.
Last updated: July 20, 2026 9:00 pm
Chaturvedi Shruti V.
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“मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू” – आराधना (1969)


एक हसीना थी, एक दीवाना था” – कर्ज़ (1980)


सोलह बरस की बाली उमर को सलाम – एक दूजे के लिए (1981)


कागज कलम दवात ला – हम (1991)


“ज़रा सा झूम लूं मैं” – दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995)

ये सिर्फ गाने नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग दौर की मोहब्बत, जुदाई, इंतजार और रिश्तों की वो भावनाएं हैं, जो आज भी हर पीढ़ी के दिलों में जिंदा हैं। 70 के दशक की सादगी भरी मोहब्बत हो, 80 के दशक की तड़प या फिर 90 के दशक का मासूम इश्क… वक्त बदलता गया, पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन एक कलाकार की कलम से निकले ये अल्फाज़ कभी पुराने नहीं हुए। आज भी प्यार का इज़हार करना हो, किसी की याद में खो जाना हो या जिंदगी के मायने समझने हों, उनके लिखे गीत बरबस सभी होंठों पर आ ही जाते हैं।

इन गानों को तो आपने हजारों बार सुना होगा, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अलग-अलग दौर की अलग-अलग पीढ़ियों की भावनाओं को इतने सहज और रूहानी शब्दों में पिरोने वाला यह गीतकार आखिर अपनी जिंदगी में किन संघर्षों और दर्द से गुजरा था!

21 जुलाई 1930 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में जन्मे आनंद बक्शी का असली नाम बक्शी आनंद प्रकाश वैद्य था। महज छह साल की उम्र में मां का साया सिर से उठ गया और बचपन सौतेली मां के साथ बीता। 1947 के विभाजन ने परिवार से घर-बार भी छीन लिया, जिसके बाद वे शरणार्थी बनकर भारत आए। परिवार की जिम्मेदारियों ने उन्हें पहले भारतीय नौसेना और फिर भारतीय सेना की वर्दी पहनने पर मजबूर किया, लेकिन उनके भीतर का शायर कभी शांत नहीं हुआ। बैरकों में ड्यूटी के बाद वे कविताएं और गीत लिखा करते थे। आखिरकार सपनों को सच करने की चाह उन्हें मुंबई ले आई, जहां शुरुआती दिनों में उन्होंने दादर स्टेशन के वेटिंग रूम में रातें बिताईं, गैराज में मैकेनिक का काम किया और लंबा संघर्ष झेला।

मुंबई में पहला मौका उन्हें भगवान दादा की बदौलत फिल्म ‘भला आदमी’ (1958) में मिला। शुरुआत छोटी थी, लेकिन शब्दों में ऐसा जादू था कि धीरे-धीरे पूरी फिल्म इंडस्ट्री उनकी कलम की मुरीद हो गई। असली पहचान 1965 में ‘हिमालय की गोद में’ और ‘जब जब फूल खिले’ जैसी फिल्मों से मिली। इसके बाद आनंद बक्शी ने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा।

70 का दशक आया तो राजेश खन्ना के स्टारडम के साथ आनंद बक्शी के गीत भी घर-घर गूंजने लगे। “मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू”, “कोरा कागज था ये मन मेरा”, “प्यार दीवाना होता है” और “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना” जैसे गीत सिर्फ फिल्मी गाने नहीं रहे, बल्कि उस दौर के युवाओं की भावनाओं की आवाज बन गए। उन्होंने प्यार को सादगी भी दी और समाज की बंदिशों से लड़ने का हौसला भी।

80 के दशक में भी उनकी कलम का जादू कम नहीं हुआ। “तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन” ने मोहब्बत की तड़प को शब्द दिए, तो “आदमी मुसाफिर है” ने जिंदगी का ऐसा दर्शन समझाया जो आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर कर देता है। इसी दौर में उन्होंने मां के रिश्ते को भी अमर शब्द दिए “तू कितनी अच्छी है, तू कितनी भोली है” और “ओ मां तुझे सलाम” जैसे गीत सुनते ही हर शख्स की आंखें नम हो जाती हैं। शायद इसलिए कि इन गीतों में उनकी अपनी अधूरी मां की ममता भी छिपी थी।

जब 90 का दौर आया और हिंदी सिनेमा पूरी तरह बदलने लगा, तब भी आनंद बक्शी ने खुद को वक्त के साथ बदल लिया। नई पीढ़ी के लिए उन्होंने “पहला पहला प्यार है”, “तुझे देखा तो ये जाना सनम”, “मेहंदी लगा के रखना” और “इश्क बिना क्या जीना यारा” जैसे गीत लिखे, जो आज भी शादियों, महफिलों और प्रेम कहानियों का अहम हिस्सा हैं। शायद यही वजह है कि तीन अलग-अलग पीढ़ियां उन्हें अपना गीतकार मानती हैं।

आनंद बक्शी के गीतों की सबसे बड़ी खूबी उनकी सरल भाषा थी। उन्होंने कभी कठिन उर्दू या भारी-भरकम शब्दों का सहारा नहीं लिया। आम आदमी जिस भाषा में सोचता और महसूस करता था, उसी भाषा में उन्होंने गीत लिखे। यही कारण है कि उनके लिखे शब्द सीधे दिल तक पहुंचते थे।

उनके छह हजार से ज्यादा गीतों में अगर कोई भावना सबसे ज्यादा दिखाई देती है तो वह है—इश्क और जिंदगी। कुछ तो लोग कहेंगे…” और “प्यार दीवाना होता है…” जैसे गीत बताते हैं कि वे प्यार को समाज की बंदिशों से कहीं बड़ा मानते थे। उनकी निजी जिंदगी बेहद सादगीभरी रही, लेकिन इंसानी रिश्तों और भावनाओं की गहरी समझ ने उनकी कलम को अमर बना दिया।

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन, कल्याणजी-आनंदजी और ए.आर. रहमान जैसे संगीतकारों के साथ उनकी जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को अनगिनत यादगार गीत दिए।

फिल्मफेयर पुरस्कारों के लिए सबसे ज्यादा रिकॉर्ड 40 बार नामांकित होने वाले आनंद बक्शी ने चार बार यह सम्मान अपने नाम किया। यह सिर्फ एक गीतकार की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि उस लेखक की जीत थी जिसने शब्दों को लोगों की जिंदगी का हिस्सा बना दिया।

20 मार्च 2002 को भले ही बक्शी साहब दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन जब भी कोई प्रेमी अपनी मोहब्बत का इज़हार करेगा या जिंदगी के दर्शन को समझेगा, उनकी कलम के शब्द हमेशा सभी के मन को छूते रहेंगे।

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