कर्नाटक सरकार ने जेंडर माइनॉरिटी सर्वे के दौरान ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की कपड़े उतरवाकर जांच करने स्ट्रिप-सर्चिंग के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। उच्च न्यायालय में दाखिल अपने विस्तृत हलफनामे में राज्य सरकार ने साफ शब्दों में कहा कि पूरा सर्वे अत्यधिक संवेदनशीलता और गरिमापूर्ण माहौल में आयोजित किया गया था। ऐसे में सरकार द्वारा सार्वजनिक रूप से माफी मांगने, मुआवजा देने या पुनर्वास कोष बनाने की मांग को स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता।
हलफनामे में सरकार का पक्ष और मुख्य बिंदु
आरोपों का पूर्ण खंडन: सरकार ने अदालत को सूचित किया कि सर्वे के दौरान अस्पतालों में किसी भी व्यक्ति के कपड़े उतरवाकर जांच नहीं की गई और न ही किसी को जबरन सत्यापन प्रक्रिया के लिए मजबूर किया गया।
गोपनीयता और गरिमा: सर्वे का आयोजन तालुका और जिला स्तरीय अस्पतालों के अलग-अलग निजी कमरों में किया गया था।
प्रशिक्षित प्रतिनिधियों द्वारा संचालन: इस प्रक्रिया को संपन्न कराने के लिए ट्रांसजेंडर समुदाय के ही प्रशिक्षित व्यक्तियों की सेवाएं ली गई थीं।
स्वेच्छा पर आधारित: सर्वे की प्रश्नावली का उत्तर देना पूरी तरह वॉलंटरी था; किसी को बाध्य नहीं किया गया।
सरकार ने स्पष्ट किया कि एकत्र किया गया डेटा पूरी तरह गोपनीय है और इसका उपयोग केवल सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं के निर्माण के लिए किया जाता है।
क्या है पूरा विवाद?
यह मामला ‘अनिता ह्यूमैनिटेरियन फाउंडेशन’ द्वारा अक्टूबर 2025 में दायर एक जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया था कि पहचान सत्यापन के नाम पर अस्पतालों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ अभद्र व्यवहार और स्ट्रिप-सर्चिंग की जा रही है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा दिए गए निजता और सम्मानजनक जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 16 अक्टूबर 2025 को एक अंतरिम आदेश पारित कर पहचान प्रक्रिया के नाम पर स्ट्रिप-सर्चिंग के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी।
नीतिगत प्रक्रिया और सरकार का तर्क
याचिकाकर्ताओं के इस दावे पर कि सर्वे बिना सामुदायिक परामर्श के शुरू किया गया, सरकार ने पलटवार करते हुए कहा कि इसकी घोषणा 2020-21 के बजट भाषण में ही की गई थी। इसे ‘कर्नाटक राज्य महिला विकास निगम’ के माध्यम से लागू किया गया और इसकी प्रश्नावली ट्रांसजेंडर समुदाय के कल्याण के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के सुझावों के आधार पर तैयार की गई थी। सरकार ने हाईकोर्ट से आग्रह किया है कि वह अपने अंतरिम आदेशों की समीक्षा करे और याचिका को खारिज करे, ताकि कल्याणकारी नीतियों को सुचारू रूप से आगे बढ़ाया जा सके।