नई दिल्ली।देशव्यापी NEET आंदोलन और जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुए पुलिस बल प्रयोग का मामला अब देश की शीर्ष अदालत पहुंच गया है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने जंतर-मंतर और देशभर में प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
चीफ जस्टिस ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन होते रहते हैं, लेकिन अगर पुलिस प्रशासन की ओर से ज्यादती हुई है, तो कानून अपना काम करेगा और अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी जरूरी है।
CJI सूर्यकांत ने गिनाईं गंभीर घटनाएं: पेलेट गन से लेकर ICU में भर्ती छात्रा तक
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने याचिकाओं में लगाए गए गंभीर आरोपों पर चिंता जताते हुए कई घटनाओं का विशेष उल्लेख किया:
- पेलेट गन का इस्तेमाल: “एक आरोप पेलेट गन के इस्तेमाल का है, जिसकी वजह से एक 19 साल के छात्र की आंखों की रोशनी चली गई।”
- घातक हथियार: पुलिस द्वारा इलेक्ट्रिक बैटन और कील वाली लाठियों के इस्तेमाल के आरोप, जिससे जान को गंभीर खतरा पैदा हुआ।
- गंभीर चोटें: प्रदर्शन में शामिल एक युवती को गंभीर हालत में ICU में भर्ती कराना पड़ा।
- सिविल ड्रेस में पुलिस की हिंसा: सादे कपड़ों (Civil Clothes) में पुलिसकर्मियों द्वारा प्रदर्शनकारियों और एक मीडियाकर्मी पर बेरहमी से हमला।
- बिना उकसावे के थप्पड़: बिना किसी उकसावे के एक महिला प्रदर्शनकारी को पुलिसकर्मी द्वारा थप्पड़ मारे जाने का मामला।
बिहार में 150 से अधिक नाबालिग कस्टडी में: वकीलों ने उठाया सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन और शादान फरासत ने कोर्ट को बताया कि यह केवल दिल्ली तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश, नागपुर और बिहार सहित पूरे देश में छात्रों पर अत्याचार हुआ है।
- बिहार में गैर-कानूनी हिरासत: एडवोकेट शादान फरासत ने कोर्ट को बताया कि भले ही बिहार सरकार मुकदमे वापस लेने की बात कह रही है, लेकिन 150 से अधिक नाबालिग अभी भी हिरासत में हैं।
- 48 घंटे से ज्यादा कस्टडी: प्रदर्शनकारियों को 40 से 48 घंटे तक हिरासत में रखने के बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। कस्टडी में मौजूद एक बच्चे की उम्र महज 13 साल है।
“जवाबदेही तय नहीं हुई तो जांच बेमानी”-सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच (Independent Probe) के संकेत दिए हैं। पीठ ने दोहराया कि अगर इस पूरे घटनाक्रम में दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी (Accountability) तय नहीं की जाती, तो किसी भी जांच का कोई औचित्य नहीं रह जाता।