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BLOs की बढ़ती मौतें… सर्वर डाउन… कागज़ों के ढेर… SIR में आखिर गड़बड़ क्या है? आरोपों पर चुनाव आयोग की चुप्पी डराने वाली है

चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया — जिसे वोटर लिस्ट अपडेट करने की “तेज़ और सटीक” पहल कहा जा रहा है — अब विवादों से घिर गई है. कांग्रेस के राहुल गांधी, TMC की ममता बनर्जी, SP के अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेता इसे “वोट चोरी की साजिश” करार दे रहे हैं. सबसे बड़ा आरोप: BLOs की मौतें, जो विपक्ष के मुताबिक SIR की जल्दबाजी का सीधा नतीजा हैं. लेकिन सवाल यह है—क्या ये मौतें वाकई दबाव में हुईं या ये अलग-अलग घटनाएं हैं? और क्या चुनाव आयोग की चुप्पी संदेह को और गहरा कर रही है?

आइए, पूरी कहानी समझते हैं.

SIR शुरू कैसे हुआ और झगड़ा कहां से बढ़ा?

28 अक्टूबर 2025 से SIR 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहा है. EC का दावा है कि इस दौरान 50 करोड़ से ज्यादा फॉर्म बांटे जा चुके हैं और 33% से ज्यादा डेटा डिजिटाइज भी हो चुका है — यानी काम तेजी से चल रहा है.

लेकिन विपक्ष कहता है कि इसी “तेज़ी” ने BLOs पर जबरदस्त दबाव डाल दिया है. आरोप है कि सिर्फ 30 दिनों की इस भागदौड़ में 16 से लेकर 28 तक मौतें हो चुकी हैं (राज्यों के हिसाब से आंकड़े अलग). हालांकि अभी तक 5–6 मौतें ही आधिकारिक रूप से कन्फर्म हैं — जैसे केरल में अनीश जॉर्ज की आत्महत्या और राजस्थान में मुकेशचंद जांगिड़ का ट्रेन हादसा. बाकी मामलों में परिवारों के बयान तो हैं, लेकिन जांच रिपोर्ट का इंतजार है.

अब बड़ा सवाल: क्या चुनाव आयोग ने BLOs की सुरक्षा और उनकी सीमाओं को ध्यान में रखा, या ये सब “कॉलेटरल डैमेज” समझकर नजर अंदाज कर दिया गया?

राहुल गांधी का हमला: “ये लोकतंत्र की बलि है”

22 नवंबर को राहुल गांधी ने X पर पोस्ट डाला और SIR पर सीधा वार किया. उन्होंने लिखा कि तीन हफ्तों में 16 BLOs की जान चली गई और इसे “वोट चोरी का औजार” बताया. राहुल का तर्क है—डिजिटल इंडिया में 22 साल पुरानी स्कैन की हुई वोटर लिस्ट क्यों? सर्चेबल और मशीन-रीडेबल लिस्ट क्यों नहीं बनाई गई?

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी आयोग की खामोशी पर सीधा निशाना साधा। आयोग कहता है कि ये “अलग-थलग मामले” हैं, लेकिन विपक्ष पूछ रहा है—अगर दबाव नहीं था तो मौतों की संख्या क्यों बढ़ रही है?

ममता बनर्जी की चेतावनी: “28 मौतें… SIR अभी रोकें”

पश्चिम बंगाल में तो माहौल सबसे गरम है. ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर SIR रोकने की मांग की. उनका दावा है—28 BLO मर चुके हैं, और ये सब डर, तनाव और दबाव से हुआ है. उन्होंने दो आत्महत्याओं का जिक्र किया और कहा कि एक BLO ने सुसाइड नोट में सीधे ECI को जिम्मेदार बताया.

TMC का आरोप है कि EC “BJP को खुश करने” के लिए इतनी जल्दबाजी कर रहा है. जबकि BJP का कहना है कि ये सब राज्य सरकार की नाकामी है. ममता ने ट्रेनिंग की कमी, सर्वर डाउन और डेटा मिसमैच की भी शिकायत की.

राजस्थान के चुनाव अधिकारी नवीन महाजन ने कहा कि “1.6 लाख BLOs में से ये घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण जरूर हैं, लेकिन अलग-थलग हैं.”

लेकिन सवाल वही — अगर ट्रेनिंग और तैयारी पूरी थी, तो फिर आत्महत्याएँ क्यों?

अखिलेश यादव का बड़ा आरोप: “प्रति विधानसभा 50,000 वोट काटने की साजिश”

उत्तर प्रदेश से अखिलेश यादव ने तो सीधा बम फोड़ दिया. उन्होंने कहा कि BJP और EC मिलकर INDIA गठबंधन की जीती सीटों पर 50,000 वोट काटने की प्लानिंग कर रहे हैं. उन्होंने UP में SIR को तीन महीने बढ़ाने की मांग की और कहा कि BLOs को न तो सही ट्रेनिंग दी गई और न ही पर्याप्त संसाधन.

उन्होंने आरोप लगाया कि शादी-ब्याह के सीजन में SIR शुरू करना ही एक चाल है ताकि लोग घर पर न मिलें और वोटर लिस्ट में गड़बड़ी आसान हो जाए.

अखिलेश ने X पर “PPTV” नाम से एक नई पहल का ऐलान भी किया — यानी जनता CCTV की तरह निगरानी रखे और SIR की अनियमितताओं को रिकॉर्ड करे.

BJP ने इन आरोपों को “बेबुनियाद और चुनावी डर” बताया. लेकिन सवाल ये भी उठ रहा है कि कन्नौज SDM का वायरल ऑडियो क्या वाकई महज अफवाह है जिसमे कथित तौर पर SDM स्वीकार करते सुनाई दे रहे हैं कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) और बूथ लेवल एजेंट (BLA) को SIR प्रक्रिया के लिए उचित प्रशिक्षण नहीं दिया गया.

देशभर में गूंज: केरल, गुजरात, MP… हर जगह विरोध

केरल में CPI(M), कांग्रेस और IUML ने SIR को रोकने की मांग की है. IUML तो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. मध्य प्रदेश और गुजरात में भी 2-2 मौतों की रिपोर्ट है — परिवारों का कहना है कि काम का बोझ असहनीय था.

कई BLOs उम्रदराज शिक्षक हैं, जिनकी पहले से हेल्थ समस्याएं हैं — ऐसे में सवाल उठता है कि आयोग ने पहले से हेल्थ स्क्रीनिंग क्यों नहीं कराई?

ECI की खामोशी: क्या यही सबसे बड़ा जवाब है?

चुनाव आयोग ने अब तक विपक्ष के आरोपों पर कुछ नहीं कहा. सिर्फ इतना कि राज्यों से रिपोर्ट मांगी गई है और SIR संवैधानिक कर्तव्य है.

लेकिन जनता और विपक्ष दोनों पूछ रहे हैं:

  • डिजिटल इंडिया में कागजी जंगल क्यों?
  • ट्रेनिंग और सर्वर सपोर्ट क्यों कमजोर?
  • BLOs का भत्ता काफी है या सिर्फ दिखावा है?
  • क्या SIR 2026 चुनावों से पहले स्थगित होकर सुधारा जाना चाहिए?

ग्रेटर नोएडा में 60 BLOs पर FIR दर्ज हुई — सवाल ये है कि इससे समस्या हल होगी या बढ़ेगी?

जवाबदेही की घड़ी आ गई है

BLOs की मौतें दुखद हैं, और SIR की जल्दबाजी पर सवाल बिल्कुल वाजिब हैं. विपक्ष के आरोप गंभीर हैं, लेकिन आंकड़ों की पूरी पुष्टि जरूरी है. ये मामला राजनीति से ज़्यादा सिस्टम की जिम्मेदारी का है.

लोकतंत्र वोटर लिस्ट से मजबूत होता है — लेकिन किसी की जान की कीमत पर नहीं.

अब पूरी नज़र चुनाव आयोग पर है..

क्या वो जवाब देगा, या खामोशी ही उसका अंतिम जवाब है?

news desk

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