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Indian Press House > Blog > Trending News > मोकामा में अनंत सिंह बनाम सूरजभान होने से बढ़ी चुनावी तपिश? लोगों के जेहन में आज भी ताजा है 25 साल पुराने टकराव की गूंज!
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मोकामा में अनंत सिंह बनाम सूरजभान होने से बढ़ी चुनावी तपिश? लोगों के जेहन में आज भी ताजा है 25 साल पुराने टकराव की गूंज!

Sandeep pandey
Last updated: October 17, 2025 1:38 pm
Sandeep pandey
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अनंत सिंह बनाम सूरजभान
अनंत सिंह बनाम सूरजभान
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बिहार की राजधानी पटना से करीब 90 किमी दूर गंगा के किनारे फैला हुआ लंबा इलाका जिसे स्थानीय भाषा में ‘टाल’ कहा जाता है, वहीं पर स्थित है मोकामा विधानसभा. एक ऐसी विधानसभा सीट जिस पर आज पूरे देश की नजरें टिक गईं हैं. जितना पेंचिदा यहां का भूगोल है उतनी ही उलझी हुई यहां की सियासत भी है. कभी चमड़ा और दूसरे उद्योग के लिए मशहूर रहा मोकामा 80 के दशक में अपनी पहचान बदलने लगा. दाल का कटोरा कहा जाने वाला मोकामा बाहुबलियों के गैंगवार के लिए कुख्यात हो गया. यहां की सियासत से मुद्दे गायब होने लगे और उनकी जगह एके 47 और एके 56 से चुनाव तय होने लगे.

बिहार में बाहुबलियों का द्वंद्व हर तरफ से सियासत की चाशनी में लिपटा नजर आता है. यही कारण है कि मोकामा भी इससे अछूता नहीं है. बिहार के 2025 विधानसभा चुनावों की गरमाहट के बीच मोकामा सीट इस बार राजनीतिक हलचलों की सुर्खियों में आ गई है. क्योंकि आशंका है कि इस बार मोकामा फिर दो बाहुबलियों के युद्ध का मैदान बन सकता है.

जेडीयू के उम्मीदवार अनंत सिंह ऊर्फ छोटे सरकार यहां की पहचान बन चुके हैं तो आरजेडी में शामिल हुए दूसरे बाहुबली सूरजभान जिन्हे लोग प्यार से ‘दादा’ कहते हैं वो कहीं से भी कम नहीं है. सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी यहां से अनंत सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ेंगी. इस चर्चा के होते ही लोगों के जेहन में साल 2000 के उस चुनाव की यादें ताजा हो गईं जब पहली बार इन दोनों बाहुबलियों का आमना सामना हुआ था.

2000 का चुनाव जिसकी गूंज अब भी कायम है!

साल 2000 के विधानसभा चुनाव में अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह के सामने सूरजभान चुनाव लड़े थे. तब मोकामा दिलीप सिंह का गढ़ माना जाता था. वो 1990 से ही यहां के विधायक थे और आरजेडी सरकार में मंत्री भी थे. तब जेल में रहते हुए निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सूरजभान ने उन्हे चुनाव हरा दिया था. उस चुनाव की यादें सिर्फ इस उलटफेर तक सीमित नहीं है. बल्कि चुनाव के दौरान दोनों बाहुबलियों के टकराव की गूंज लंबे समय तक टाल क्षेत्र के लोगों के जेहन में जिंदा रही थीं. चुनाव के दौरान दोनों के समर्थकों के बीच कई बार गोलीबारी हुई थी. मोकामा विधानसभा को उस साल हुए चुनावों में सबसे हिंसक माना गया था. यही आशंका इस बार भी जताई जा रही है.

मोकामा के जातीय समीकरण का पेंच

मोकामा को भूमिहार बहुल सीट माना जाता है. यहां लगभग 80 हजार भूमिहार मतदाता है. धानुक मतदाताओं की संख्या करीब 50 हजार, यादव 25 हजार, दलित लगभग 43 हजार हैं. राजपूत लगभग 18 और ब्राह्मण लगभग 21 हजार. राजनीतिक विश्लेषक अतुल शंकर राय कहते हैं कि ‘मुंगेर लोकसभा के अन्तर्गत आने वाली बिहार की सबसे चर्चित सीटों में से एक मोकामा, दो हैविवेट उम्मीदवारों के चलते सबकी नजर में आ गई है. करीब 3 दशक से अनंत सिंह के परिवार का यहां एकछत्र दबदबा दिखता है. इस दौरान सिर्फ सूरजभान ही हैं जो 2000 में इस परिवार को हरा पाने में सफल रहे थे. चूकि दोनों उम्मीदवार बाहुबली और भूमिहार जाति से हैं लिहाजा धानुक और दलित मतदाता यहां निर्णायक रहेंगे. किसी के लिए भी जीत आसान नहीं होगी. मुकाबला करीबी, रोमांचक और धड़कने बढ़ाने वाला रहेगा’.

कौन हैं सूरजभान सिंह ‘दादा’

90 के दशक में सूरजभान का नाम बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल तक के अंडरवर्ल्ड में गूंज रहा था. 90 के दशक के शुरूआती सालों में सूरजभान का टकराव कुख्यात अशोक सम्राट के साथ हुआ. लेकिन अशोक सम्राट की मौत के बाद सूरजभान का दबदबा बिहार में बोलने लगा. गोरखपुर के कुख्यात अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ला के कई आरोपों में सूरजभान फाइली थे. कहा जाता है कि सूरजभान ने ही श्रीप्रकाश शुक्ला को एके 47 मुहैया करवाई थी. हत्याओं के कई मामलों में अभियुक्त रहे सूरजभान आज ज्यादातर मामलों में बरी हैं और साल 2000 से सियासी पारी शुरू कर चुके हैं.

एके 47 रखने के आरोप में अनंत सिंह को सजा हुई थी. जिसके बाद उनकी विधायकी चली गई थी. लेकिन 2022 के उपचुनाव में उनकी पत्नी नीलम सिंह ने सीट जीत कर परिवार की विरासत को बचाए रखा. अब जेल से छूटे अनंत सिंह खुद मैदान में उतरे हैं और सामने है सूरजभान. इस बार अनंत सिंह लंबे समय से अपने विरोधी रहे विवेका पहलवान को साथ लाने में कामयाब रहे तो वहीं पार्टी में उन्हे विरोध झेलना पड़ रहा है.

जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने अनंत सिंह का चुनाव प्रचार करने से साफ इनकार कर दिया है. नीरज कुमार ने कहा कि ‘जिनकी पृष्ठभूमि आपराधिक रही है और जिनकी पूंजी अपराध है, वे ऐसे किसी भी व्यक्ति या प्रत्याशी के लिए चुनाव प्रचार में नहीं जाएंगे. ऐसे प्रत्याशी के लिए प्रचार करके अपने माथे पर ‘कलंक का टीका’ नहीं लगाना चाहते हैं’. लेकिन मुंगेर से सांसद लल्लन सिंह, अनंत सिंह का समर्थन कर रहे हैं.

इस चुनाव में जीत किसकी होगी ये तो मतदाता तय करेंगे लेकिन चुनाव दांवपेंच से भरपूर और गैंगवार की आहट के बीच ही संपन्न होगा, इसकी संभावना भी पुरजोर है.

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