नई दिल्ली: अजा एकादशी का व्रत आज 7 सितंबर 2026 को रखा जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत अनजाने में हुए पापों से मुक्ति और पुण्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस एकादशी से जुड़ी राजा हरिश्चंद्र की कथा बेहद खास मानी जाती है। मान्यता है कि पूजा के दौरान अजा एकादशी व्रत कथा सुनने या पढ़ने से व्रत का पूरा फल प्राप्त होता है। यही वजह है कि आज की पूजा में कथा के साथ भगवान विष्णु और एकादशी माता की आरती करने की भी परंपरा है।
एकादशी तिथि 6 सितंबर की शाम 7:29 बजे शुरू हुई और 7 सितंबर की शाम 5:03 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर अजा एकादशी का व्रत 7 सितंबर को रखा जा रहा है। व्रत का पारण 8 सितंबर को सुबह 6:02 बजे से 8:33 बजे तक किया जाएगा। पूजा के लिए अभिजीत मुहूर्त दोपहर 1:22 बजे से 2:14 बजे तक रहेगा।
राजा हरिश्चंद्र को क्यों छोड़ना पड़ा राजपाट?
पौराणिक कथा के अनुसार, युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा था। तब भगवान कृष्ण ने इसे अजा एकादशी बताया और कहा कि यह पापों का नाश करने वाली मानी जाती है।
इसी से जुड़ी कथा राजा हरिश्चंद्र की है, जिन्हें सत्य और अपने वचन के लिए जाना जाता था। कथा के अनुसार, एक समय उन्हें अपने कर्मों का फल भोगना पड़ा और राजपाट छोड़ने की स्थिति आ गई। मान्यता है कि एक रात सपने में विश्वामित्र मुनि दिखाई दिए और राजा ने अपना पूरा राज्य उन्हें दान कर दिया। अगले दिन विश्वामित्र ने उनसे राज्य मांग लिया।
राजा ने अपना वचन निभाते हुए राजपाट सौंप दिया। इसके बाद उन्हें पत्नी और पुत्र तक को बेचने की स्थिति का सामना करना पड़ा। अंत में उन्हें चांडाल की दासता करनी पड़ी और मुर्दों के कफन लेकर जीवन चलाना पड़ा। इतनी कठिन परिस्थितियों के बावजूद कथा के अनुसार हरिश्चंद्र सत्य के मार्ग से नहीं हटे।
दुख में डूबे राजा को मिला अजा एकादशी का रास्ता
लंबे समय तक चांडाल की दासता करने के बाद राजा हरिश्चंद्र बेहद दुखी रहने लगे। वह सोचने लगे कि इस संकट से बाहर निकलने का रास्ता क्या है और उनका दुख कब खत्म होगा।
राजा को इस तरह परेशान देखकर महर्षि गौतम उनके पास पहुंचे। हरिश्चंद्र ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी पूरी पीड़ा बताई। उनकी स्थिति सुनने के बाद महर्षि गौतम ने उन्हें भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी के बारे में बताया।
महर्षि ने कहा कि यह एकादशी पुण्य देने वाली मानी जाती है और इसके व्रत से पापों का अंत होता है। इसके बाद राजा ने विधि-विधान से अजा एकादशी का व्रत किया और रात में जागरण किया।
व्रत के प्रभाव से वापस मिला परिवार और राजपाट
कथा के अनुसार, अजा एकादशी का व्रत करने के बाद राजा हरिश्चंद्र के जीवन के संकट दूर होने लगे। उन्हें अपनी पत्नी और पुत्र फिर से मिल गए। इसके बाद उन्हें अपना राज्य भी वापस प्राप्त हुआ।
मान्यता है कि अंत में राजा हरिश्चंद्र स्वर्गलोक गए। भगवान श्रीहरि ने कहा कि जो व्यक्ति अजा एकादशी की कथा का महात्म्य सुनता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। इसी धार्मिक मान्यता के कारण अजा एकादशी पर व्रत कथा पढ़ने और सुनने को विशेष महत्व दिया जाता है।
पूजा के बाद करें एकादशी माता और भगवान विष्णु की आरती
अजा एकादशी की पूजा में व्रत कथा के साथ आरती करने की भी परंपरा है। मान्यता के अनुसार, इस दिन एकादशी माता और भगवान विष्णु की आरती की जाती है।
एकादशी माता की आरती में साल की अलग-अलग एकादशियों का वर्णन करते हुए देवी की महिमा का गुणगान किया जाता है। वहीं भगवान विष्णु की आरती ‘ॐ जय जगदीश हरे’ के साथ की जाती है। श्रद्धालु पूजा के बाद आरती करके भगवान विष्णु से सुख, शांति और कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।