नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर जुलाई में हुए छात्र आंदोलन के दौरान दिल्ली पुलिस के इस्तेमाल किए गए फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया था कि प्रदर्शन स्थल पर FRS के जरिए 2,873 ऐसे लोगों की पहचान हुई, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड से मिलान हुआ था। लेकिन द इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में सामने आया कि इनमें से कम से कम 25 लोग उस वक्त जेल में बंद थे, जब सिस्टम ने कथित तौर पर उनकी पहचान प्रदर्शन स्थल पर की।
यह खुलासा ऐसे समय हुआ है, जब सुप्रीम कोर्ट ने छात्र आंदोलन से जुड़ी सभी FIR रद्द कर दी हैं और दिल्ली पुलिस को इन 2,873 लोगों के संबंध में निर्धारित प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ने की अनुमति दी है। ऐसे में FRS से हुई पहचान और उसकी विश्वसनीयता का सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।
2873 लोगों की पहचान, लेकिन 25 जेल में कैसे?
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, 20 से 26 जुलाई के बीच जंतर-मंतर के मुख्य प्रदर्शन स्थल पर लगाए गए फेशियल रिकग्निशन सिस्टम ने 2,873 ऐसे लोगों को चिन्हित किया, जिनकी तस्वीरें पुलिस के आधिकारिक डेटाबेस में मौजूद रिकॉर्ड से मैच हुईं।
पुलिस के 17 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे के मुताबिक, इनमें से 2,402 लोगों की पहचान दिल्ली पुलिस के बायोमेट्रिक डेटाबेस ‘Crime Kundli’ से हुई, जबकि 471 लोगों की पहचान आपराधिक रिकॉर्ड से जुड़े डेटाबेस के आधार पर किए जाने की बात कही गई।
लेकिन अब इस सूची की जांच में एक चौंकाने वाली बात सामने आई है। गंभीर अपराधों से जुड़े 205 लोगों के रिकॉर्ड की पड़ताल में कम से कम 25 ऐसे व्यक्ति मिले, जो पहचान किए जाने की तारीख पर दिल्ली की तिहाड़, मंडोली या रोहिणी जेल में बंद थे।
हत्या, रेप और हत्या के प्रयास के आरोपी भी सूची में
द इंडियन एक्सप्रेस ने पुलिस के हलफनामे में शामिल गंभीर आपराधिक मामलों वाले लोगों की पड़ताल की। इस समूह में हत्या, रेप, POCSO और हत्या के प्रयास जैसे मामलों से जुड़े लोग शामिल थे।
इनमें से 25 लोगों के जेल में होने की बात सामने आई। इनमें:
- 17 लोग हत्या के मामलों में जेल में थे
- 4 लोग रेप के मामलों में जेल में थे
- 4 लोग हत्या के प्रयास के मामलों में जेल में थे
यानी सवाल सिर्फ FRS की तकनीकी क्षमता का नहीं है, बल्कि यह भी है कि अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरी जगह जेल में बंद था, तो सिस्टम ने उसे जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल पर मौजूद व्यक्ति के तौर पर कैसे चिन्हित किया?
17 हत्या के आरोपी भी FRS की सूची में
जेल रिकॉर्ड के मुताबिक, 17 ऐसे लोग पुलिस की FRS पहचान सूची में शामिल थे, जो हत्या के मामलों में जेल में बंद थे। इनमें किशन, मुस्ताक, अंकित कुमार, योगेश, प्रताप सिंह सिसोदिया, अर्जुन, सोनू कुमार, विजय, राकेश, भोला उर्फ श्याम कुमार, राजा, विक्की उर्फ मनोज ठाकुर, मोहम्मद फराज, मनीष, धर्मेंद्र यादव, सोनू और रॉयल मैसी के नाम बताए गए हैं।
इनमें योगेश उर्फ राजू का नाम दक्षिण दिल्ली के ग्रेटर कैलाश-1 में जिम मालिक नादिर शाह की हत्या के मामले से भी जुड़ा बताया गया है।
रेप और POCSO मामलों से जुड़े लोग भी सामने आए
FRS की सूची में ऐसे चार लोग भी पाए गए, जो रेप या POCSO से जुड़े मामलों में जेल में थे। इनमें अंकित उर्फ मोगली, सुनील कुमार, हीरा सिंह और कुंदन के नाम शामिल हैं।
रिकॉर्ड के मुताबिक, हीरा सिंह 11 जुलाई 2023 से जेल में बंद था। इसके बावजूद उसका चेहरा जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान FRS द्वारा पहचाने गए लोगों की सूची में शामिल होना सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।
हत्या के प्रयास के चार आरोपी भी जेल में थे
इसी तरह हत्या के प्रयास के चार मामलों में आरोपी लोग भी FRS की पहचान सूची में पाए गए। इनमें महेश, बॉबी, जीशान अहमद इदरीशी और अन्नू गिलोडिया उर्फ पहलवाल के नाम शामिल हैं।
दिल्ली पुलिस का क्या कहना है?
दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में कहा है कि 2,873 लोगों को प्रथम दृष्टया आपराधिक पृष्ठभूमि वाला माना गया है, लेकिन इस आधार पर सीधे किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी।
पुलिस के मुताबिक, FRS पहचान की प्रक्रिया का सिर्फ पहला चरण है। सिस्टम द्वारा किसी चेहरे का मिलान किए जाने के बाद फील्ड वेरिफिकेशन किया जाता है। यदि मौके पर सत्यापन से यह पुष्टि होती है कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में प्रदर्शन स्थल पर मौजूद था, तभी उसके खिलाफ आगे की कार्रवाई की जा सकती है।
पुलिस का यह भी कहना है कि सिर्फ FRS के नतीजे को किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई का अंतिम आधार नहीं बनाया जाता।
80% मैच को ‘पॉजिटिव’ मानता है सिस्टम?
FRS की सटीकता को लेकर भी पहले सवाल उठ चुके हैं। 2022 में एक RTI के जवाब में दिल्ली पुलिस ने बताया था कि सिस्टम में 80 फीसदी सटीकता वाला मैच ‘पॉजिटिव’ माना जाता है।
लेकिन किसी चेहरे का डेटाबेस में मौजूद तस्वीर से मिलान होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह व्यक्ति उसी समय और उसी जगह मौजूद था। FRS की क्षमता कैमरे का एंगल, रोशनी, तस्वीर की गुणवत्ता, चेहरे की स्थिति, डेटाबेस की गुणवत्ता और इस्तेमाल किए गए एल्गोरिदम जैसे कई कारकों पर निर्भर कर सकती है।
‘आरोपी’, ‘दोषी’ या सिर्फ रिकॉर्ड में नाम?
इस पूरे मामले में एक और अहम सवाल यह है कि पुलिस ने 2,873 लोगों को किस आधार पर ‘आपराधिक पृष्ठभूमि’ वाला माना।
पुलिस के हलफनामे में यह साफ नहीं किया गया कि इन सभी 2,873 लोगों को किसी अपराध में दोषी ठहराया जा चुका था, वे आरोपी थे या सिर्फ किसी आपराधिक मामले में नामित थे।
यही वजह है कि FRS से हुई पहचान को लेकर कानूनी और तकनीकी दोनों स्तरों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
तकनीक पर भरोसा या मानवीय सत्यापन जरूरी?
जंतर-मंतर मामले ने एक बड़ा सवाल सामने ला दिया है—क्या किसी प्रदर्शन में शामिल लोगों की पहचान के लिए इस्तेमाल की जाने वाली फेशियल रिकग्निशन तकनीक को अकेले भरोसेमंद आधार माना जा सकता है?
दिल्ली पुलिस खुद कह रही है कि FRS सिर्फ शुरुआती पहचान करता है और उसके बाद फील्ड वेरिफिकेशन जरूरी है। लेकिन जेल में बंद 25 लोगों का कथित तौर पर प्रदर्शन स्थल की पहचान सूची में शामिल होना यह दिखाता है कि तकनीकी मैच और वास्तविक मौजूदगी के बीच अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ऐसे में 2,873 लोगों की सूची की दोबारा जांच और हर पहचान के स्वतंत्र सत्यापन का सवाल अब और महत्वपूर्ण हो गया है।