राजनीति के सबसे बड़े आंधियों और आरोपों के चक्रव्यूह में फंसे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर आखिरकार कानून की सबसे बड़ी अदालत ने अंतिम मुहर लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने 2015 के उस समन को खारिज कर दिया, जिसने देश के एक अर्थशास्त्री-प्रधानमंत्री की ईमानदारी पर सवाल खड़े किए थे। मनमोहन सिंह को उनके निधन के 19 महीने बाद क्लीन चिट मिली है, पढ़िए, इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे की पूरी इनसाइड स्टोरी।
1. जब सुप्रीम कोर्ट ने सुधारा 10 साल पुराना आदेश
भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के इतिहास में 29 जुलाई का दिन एक भावुक और ऐतिहासिक पड़ाव के रूप में दर्ज हो गया।
सुप्रीम कोर्ट ने देश के पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ कोयला ब्लॉक आवंटन (कोल आवंटन) मामले में जारी 2015 के विशेष सीबीआई अदालत के समन को पूरी तरह से रद्द कर दिया।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सीबीआई की उस ‘क्लोजर रिपोर्ट’ को स्वीकार कर लिया, जिसमें जांच एजेंसी ने बार-बार कहा था कि डॉ. सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार या साजिश का कोई सबूत नहीं है।
अदालत का यह फैसला तब आया है, जब डॉ. मनमोहन सिंह के निधन को 19 महीने बीत चुके हैं। भले ही वे आज इस न्याय को देखने के लिए हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अदालत के इस रुख ने उनके सार्वजनिक जीवन और उनकी बेदाग छवि पर लगे सबसे बड़े दाग को धो दिया है।
2. आखिर क्या था वह ‘कोलगेट’ मामला, जिसने देश हिला दिया था?
इस पूरे विवाद की जड़ें साल 2004 से 2009 के उस दौर में हैं, जब देश में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-1 सरकार सत्ता में थी। उस वक्त कोयला मंत्रालय का प्रभार भी खुद प्रधानमंत्री के पास था।
- CAG का धमाका: साल 2012 में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने एक रिपोर्ट सार्वजनिक की। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि सरकार ने कोयला खदानों का आवंटन खुली और पारदर्शी नीलामी (Competitive Bidding) से करने के बजाय एक प्रशासनिक ‘स्क्रीनिंग कमेटी’ के जरिए मनमाने ढंग से किया।
- लाखों करोड़ का कथित नुकसान: सीएजी ने शुरुआत में अनुमान लगाया कि इस अपारदर्शी प्रक्रिया से निजी कंपनियों को करीब 10.67 लाख करोड़ रुपये का अनुचित लाभ हुआ, जिसे अंतिम रिपोर्ट में घटाकर 1.86 लाख करोड़ रुपये का संभावित नुकसान बताया गया।
- सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (2014): मामले की गंभीरता को देखते हुए 2014 में शीर्ष अदालत ने 1993 से 2010 के बीच आवंटित किए गए 218 में से 214 कोयला ब्लॉकों को पूरी तरह से रद्द (Cancel) कर दिया था।
3. मनमोहन सिंह पर क्या थे आरोप और क्यों कसा गया था शिकंजा?
चूंकि उस वक्त कोयला मंत्रालय सीधे पीएमओ (PMO) के अधीन था, इसलिए आरोपों की तीर सीधे मनमोहन सिंह की तरफ मुड़ गए:
- तालाबिरा-II खदान विवाद: मुख्य विवाद ओडिशा के ‘तालाबिरा-II’ कोयला ब्लॉक को लेकर था, जिसे एक सार्वजनिक उपक्रम (PSU) के बजाय निजी क्षेत्र की कंपनी ‘हिंडाल्को’ को आवंटित किया गया था।
- नीलामी की अनदेखी का आरोप: तत्कालीन कोयला सचिव पी.सी. पारेख ने दावा किया था कि उन्होंने खुली नीलामी की सिफारिश की थी, लेकिन सरकार ने इसे नजरअंदाज कर दिया।
- सीबीआई कोर्ट का कड़ा रुख: सीबीआई ने अपनी जांच के बाद दो बार अदालत को बताया कि मनमोहन सिंह की इसमें कोई आपराधिक भूमिका नहीं थी और केस बंद (Closure Report) किया जाना चाहिए। लेकिन मार्च 2015 में विशेष सीबीआई अदालत ने जांच एजेंसी की क्लोजर रिपोर्ट को ठुकराते हुए डॉ. मनमोहन सिंह, पी.सी. पारेख और उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला को बतौर आरोपी समन जारी कर दिया था।
4. सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? कानूनी बारीकियों से समझें
ट्रायल कोर्ट के उसी 2015 के आदेश के खिलाफ सीबीआई और डॉ. सिंह का पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। अब सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अदालत के रवैये पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया:
- तर्कहीन था निचली अदालत का फैसला: शीर्ष अदालत ने माना कि जब देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी (CBI) ने दो-दो बार जांच करके यह साबित कर दिया था कि कोई आपराधिक साक्ष्य नहीं हैं, तो ट्रायल कोर्ट द्वारा सीबीआई रिपोर्ट को खारिज करना और पूर्व पीएम को समन भेजना कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ था।
- छवि की रक्षा जरूरी: डॉ. मनमोहन सिंह के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कोर्ट में तर्क दिया कि भले ही पूर्व प्रधानमंत्री का निधन हो चुका हो, लेकिन उनकी बेदाग छवि पर लगे इस झूठे आरोप और निचली अदालत की प्रतिकूल टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाया जाना बेहद जरूरी है।
- अंतिम न्याय: सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए न केवल केस बंद किया, बल्कि मरणोपरांत उनके सम्मान और ईमानदारी को कानूनी रूप से पुनर्स्थापित कर दिया।
5. निष्पक्षता और ईमानदारी की जीत
यह फैसला भारतीय राजनीति के उस दौर की याद दिलाता है, जब देश के सबसे पढ़े-लिखे अर्थशास्त्री-प्रधानमंत्री पर उंगलियां उठाई गई थीं। डॉ. मनमोहन सिंह ने तब संसद में कहा था-“इतिहास मेरे प्रति आज के मीडिया या विरोधी दलों की तुलना में अधिक दयालु रहेगा।”
आज सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने साबित कर दिया है कि वक्त और कानून भले ही देर लगाए, लेकिन वह सच के साथ ही खड़ा होता है। डॉ. मनमोहन सिंह को मिला यह फैसला सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया का अंत नहीं, बल्कि एक निष्कलंक सार्वजनिक जीवन की अंतिम विजय है।